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Thursday, May 18, 2017

#28#साप्ताहिक चयन: 'मुझे लगता है जल्द ही प्रेम कर लेना चाहिए '/ नीतेश मिश्र

नीतेश मिश्र
प्रेम...! 
पीढियां गुजरती हैं, लोग आते-जाते हैं. प्रेम बना रहता है । इसके बस कायदे उलट-पुलट होते रहते हैं पर ये बना रहता है पुरी शिद्दत के साथ।  नीतेश मिश्र जी की कविता एक अल्हड़ अलहदे अंदाज की कविता है। नीतेश जी सतना, मध्य प्रदेश में  पंचायतीराज विभाग में सरकारी सेवारत हैं  पर फाइलों की ढेर से दबा हुआ कोमल मन अभी जीवित है  , जो कविता के रूप में  सजीवता के निशान  हर रोज़ अंकित करता जान पड़ता  है । इस कविता पर अपनी सजग और सहज टीप  कर रहे हैं  विविध आयामों से समाज, समय और कविता को समझने वाले  डॉ.कमलाकांत यादव जी. 

आइये गुजरते हैं इस मोहक और सजीव रचनाकर्म से ...!

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साभार:सद्गुरु.org 
मुझे लगता है जल्द ही प्रेम कर लेना चाहिए

मुझे लगता है जल्द ही प्रेम कर लेना चाहिए
उम्र बढ़ती जा रही है तक़रीबन तीस के आसपास
स्त्रियां कहती है बुढ़ापे का मिला प्रेम
प्रेम नहीं सांत्वना का रूपक है
मैं जब इस बारे में सोचता हूँ
तब लगता है मेरे पैर जिम्मेदारियों से इतने भारी हैं कि
चार कदम चलना एक युग पार करना है
और मेरी मान्यता है कि प्रेम (में)इतना लंबा इंतजार अब
किसी भी प्रेम के लिए दुरूह है

एक स्त्री ने मुझे प्रेम का फूल दिया था
जिसे मैंने इतिहास की किताबों में छुपा कर रख दिया था
जो उसके भारीपन से टूट टूट कर बिखर गया था
और मेरी माँ ने उसे बुहार कर बहार फेंक दिया
उस वाकये के बाद उस स्त्री ने लगभग झुंझलाते हुए कहा था
शायद अगर तुम उसे प्रेम की किताबों में रखते तो
वह बच जाता और आज हम तुम मिल पाते
इतिहास प्रेम का बचपना नहीं बुढ़ापा लिखता है
हम तुम अभी खिल रहे थे

लगभग नौकरी की तरह प्रेम को यहाँ वहाँ तलाशता रहा
नौकरी भला कहाँ किसी को मुकम्मल मिली है
वैसे ही प्रेम भी मुझे नहीं मिला
इधर कुछ अच्छी स्त्रियों के प्रस्ताव आये हैं
लेकिन उनकी संशयी आँखों को देख डर घर जाता है
संशय और प्रेम भला कहाँ साथ रह पाते है
काश की कोई अब बिना शंशयी आँखों के साथ आये
जिसे मैं प्रेम कविता सुना पाऊँ और प्रेम कर बैठूँ
फ़िलहाल नौकरी भी अच्छी नहीं मिली है
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नीतेश मिश्रा*

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आदरणीय गौरव कबीर जी,
सादर अभिवादन !

                        कविताएं पढ़ना और उन पर देर तक सोचना अकेलेपन से लड़कर बाहर निकलने का सबसे बेहतरीन जरिया है । मैं जिस पीढ़ी का हूँ वह बेहद संक्रमण काल की है । हालांकि, यह बहुत सरलीकृत बयान है । समय जब ठहरा हुआ नहीं है तो सभी पीढ़ियाँ संक्रमण की शिकार (?) होती होंगी ! नवोत्पल के दो सदस्य सुशील और श्रीश जहां खड़े होकर सोचते जीते हैं मेरी भी जमीन उसी के आस-पास है । ब्लॉग के बाकियों को पढ़ता हूँ, व्यक्तिगत परिचय न होते हुए भी बहुत अपनापन लगता है । नीतेश मिश्रा की कविता पढ़कर देर तक अपने बारे में सोचा अपने परिवेश की समग्रता के साथ ।

            भारत विविधताओं से भरा देश है । कुछ लोग इतनी तेज और ऊंची जीवन शैली के साथ जीते हैं कि अमेरिका,यूरोप के तथाकथित संभ्रांत लोगों के मन में भी हीन भावना आ जाए और कुछ आज भी तेल के डिब्बे को काटकर बनाए गए लोटे में पानी भरकर सड़क के किनारे बबूल की छाया में शौच करने जाते हैं । मेरी पीढ़ी दोनों से प्यार करती है । दोनों रूपों में स्वयं को ढाल लेती है । यह कविता मेरी पीढ़ी के प्यार की कविता है ।उसके मद्धिम जीवन और मुस्कुराहट की कविता है । 90 के बाद की पीढ़ी ऑटो चलाते/बैठे हुए लीन होती है ,मुसकुराती है बस एक सनम चाहिए आशिक़ी के लिए- जैसे गाने पर । और जीती है इस सोच के साथ -

कि ज़िन्दा रहने के पीछे
अगर सही तर्क नहीं है
तो रामनामी बेंचकर या रण्डियों की
दलाली करके रोज़ी कमाने में
कोई फर्क नहीं है ।(धूमिल)

किसानी जीवन की सहजता,बाजार और भूमंडलीकरण की दस्तक और फिर तकनीक और पूंजी के सहारे उसका वर्चस्व । इसे मेरी पीढ़ी ने देखा,भोगा और जिया है । लोकतन्त्र की कल्पना स्वतंत्रा के बिना संभव नहीं है । स्वतन्त्रता इतिहास की जकड़नों से मुक्त होकर ही हासिल की जा सकती है ।लेकिन इस पवित्र भारत भूमि की जातीय विशिष्टता है कि उसके नागरिक अन्तरिक्ष में जाने वाले विमान पर भी नारियल फोड़कर तिलक लगाते हैं ।इसलिए एक ऐसी स्थिति का सामना करना विलक्षण नहीं है जब –


एक स्त्री ने मुझे प्रेम का फूल दिया था
जिसे मैंने इतिहास की किताबों में छुपा कर रख दिया था
जो उसके भारीपन से टूट टूट कर बिखर गया था
और मेरी माँ ने उसे बुहार कर बहार फेंक दिया ।

इतिहास,परंपरा,भारतीयता और संस्कार का बोझ बहुत जबर होता है । उठने नहीं देता ।लेकिन प्रेमिकाएँ बहुत तेज (चालू नहीं) होती थीं/हैं ।(अगर अभी उस उम्र की किसी रूपसी का विवाह न हुआ हो।जिसकी संभावना बहुत क्षीण है !!) –


उस वाकये के बाद उस स्त्री ने लगभग झुंझलाते हुए कहा था
शायद अगर तुम उसे प्रेम की किताबों में रखते तो
वह बच जाता और आज हम तुम मिल पाते
इतिहास प्रेम का बचपना नहीं बुढ़ापा लिखता है
हम तुम अभी खिल रहे थे ।

प्रेमिकाएँ कितनी अच्छी होती थीं ।प्रेम करती थीं । ज्यादा स्वतंत्र होती थीं प्रेम करने के लिए इसलिए ऐसा कह जाती थीं ।और,माएँ ,वो तो हमेशा से बूढ़ी रहती आई हैं । संतानों के अरमानों पर  झाड़ू ऐसे मारती हैं जैसे उन्हे किसी ने प्रेम करने से वंचित कर दिया हो जिसके कारण वे  उसकी तासीर और स्वाद से वञ्चित हों ।समझ जाती माँ और सम्हाल ली जाती प्रेमिका लेकिन बड़ी समस्या यह थी कि –

लगभग नौकरी की तरह प्रेम को यहाँ वहाँ तलाशता रहा
नौकरी भला कहाँ किसी को मुकम्मल मिली है
वैसे ही प्रेम भी मुझे नहीं मिला ।

सन् 47 का दुष्प्रभाव है ।उस मोटी किताब के द्वारा फैलाया गया भ्रम है ।जिसने गरिमामय जीवन का कीड़ा दिमाग में डाला ।रोजगार चाहिए ।बिना नौकरी के सामाजिक पहचान अधूरी है । (आज की पीढ़ी उस किताब को पढ़ती ही नहीं /जरूरत नहीं है ।) इसलिए यह संकट है –


तब लगता है मेरे पैर जिम्मेदारियों से इतने भारी हैं कि
चार कदम चलना एक युग पार करना है ।

घुट-घुट कर जीने की आदत डाल लेने वाले अपने भीतर एक जीवटता को सिरीज लेते हैं । जो उन्हे मरने से रोकती है ।आत्महत्या नहीं करने देती । रोमांस से भर देती है ।कुछ अंकुरित होता है भीतर –


मुझे लगता है जल्द ही प्रेम कर लेना चाहिए
उम्र बढ़ती जा रही है तक़रीबन तीस के आसपास ।

यह रोमांस हास्य भी उत्पन्न करता है स्वयं पर । संशय भी -

स्त्रियां कहती है बुढ़ापे का मिला प्रेम
प्रेम नहीं सांत्वना का रूपक है ।

ध्यान रहे कि इस तरह के चेतावनी वाले वाक्य देने वाली स्त्रियाँ माँ और दादी के जमाने की हैं ।और, प्रेम और विवाह करने वाली डोनाल्ड ट्रम्प के ! इसलिए यह बात त्रिशंकू के मन में आना लाजिमी है कि –


कुछ अच्छी स्त्रियों के प्रस्ताव आये हैं
लेकिन उनकी संशयी आँखों को देख डर घर जाता है
संशय और प्रेम भला कहाँ साथ रह पाते है ।

लेकिन समस्या यह नहीं है ।बल्कि ये है कि –


काश की कोई अब बिना शंशयी आँखों के साथ आये
जिसे मैं प्रेम कविता सुना पाऊँ और प्रेम कर बैठु
फ़िलहाल नौकरी भी अच्छी नहीं मिली है ।

ऐसे में सबसे बेहतर सलाह (स्वयं) को यही दी जा सकती है –


और मेरी मान्यता है कि प्रेम (में)इतना लंबा इंतजार अब
किसी भी प्रेम के लिए दुरूह है ।

बस इतना ही । लेख के आरंभ में धूमिल की कविता उद्धृत किया था । अंत भी धूमिल की ही कुछ पंक्तियों से -

जो जिन्दगी को किताब से नापता है
जो असलियत और अनुभव के बीच
खून के किसी कमजा़त मौके पर कायर है
वह बड़ी आसानी से कह सकता है
कि यार! तू मोची नहीं ,शायर है ।






Saturday, May 13, 2017

#६# दिल की डायरी: मन्नत अरोड़ा

दिल की डायरी: मन्नत अरोड़ा 



बेटी स्कूल जाने लगी थी। तो सोचा कि दूसरे बच्चे के बारे में कुछ सोचते हैं पर बेटा ही भगवान् देगा इसका तो कुछ पक्का नहीं।तो या तो एबॉर्शन या फिर बेटा। अब एक और बेटी इस माहौल में। पर test करवाने पे बेटी होने का पता चला। डाक्टर से मैं पहले ही बात कर चुकी थी।पति यूँ ही पूछने लगा कि क्या मर्ज़ी है? मैंने कहा आगे पहले बेटी पे पूरा महीना सदमा ही नहीं गया था तुम्हारा अब जब पहले से ही पता चल गया है तो एक ऐसी जिंदगी को जन्म देना जिसे कोई चाहता ही नहीं,मेरे बस की बात नहीं। मुझे बाकी किसी की सोच का फर्क नहीं पड़ता था पर मेरे पति की सोच ही जब ऐसी थी।तो अकेले बस एक ही की जिम्मेवारी उठा सकती थी,दूसरा मैं इन सब के प्रभाव से बेटी को बचाना भी चाहती थी।

तो एबॉर्शन ही मेरा फैसला था जिसको किसी ने मना भी नहीं किया। अज़ीब था मेरी सास डॉक्टर से एबॉर्शन के बाद कन्फर्म कर रही थी कि बेटी ही थी या बेटा।तो डॉक्टर चिल्लाई कि हम भगवान् नहीं हैं।रिपोर्ट आप खुद लाए हो।हम दवाई पहले ही दे देते हैं।अब यह नहीं देखते कि बेटा था या बेटी।


मुझे रह-रह कर अपने कॉलेज के वो दिन याद आते जब मेरा पति रोज़-रोज़ मेरे पीछे आ जाया करता था जबकि मैं जानती ही नहीं थी कि कौन है। मुझे बस अपने रास्ते से मतलब होता था या कॉलेज से।पता नहीं कितनी बार मैंने अपना आने-जाने का वक़्त भी बदला। बात करना चाहता था।यूँ ही अजनबी से क्या बात करती मैं।फिर किसी सहेली से मैसेज भिजवाया।तो भी मैंने इंकार कर दिया।कॉलेज के रास्ते पे खुद का एक्सीडेंट ही करवा लिया कि मैं उसे देखने आ जाऊं।मैं नहीं गयी। आखिर एक दिन मैंने रुक के पूछा तो उसने कहा कि बहुत पसंद हो शादी करना चाहता हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि पसंद क्या है इसको। पूछा तो बोला कि तुम्हारी फैमिली के बारे में सब जानता हूँ। बस तुम हाँ कर दो। एक बार तो खून से लिख के तक दे दिया।
आखिर मैंने बिना कुछ ज्यादा सोचे कह दिया कि अगर मेरे पेरेंट्स को मंजूर होगा तो ठीक है। बाद में पता चला कि कितनी बार इसकी तरफ़ से रिश्ते की बात की गयी थी और पापा इंकार कर देते थे क्योंकि उनको कुछ इसकी फैमिली के बारे में सही सुनने को नहीं मिला था। पर फिर भी बार-2 इसकी तरफ से प्रपोजल आते जा रहे थे।बात मेरी माँ तक भी इसने पहुंचा दी थी कि बहुत प्यार करता है मुझे।माँ को पता नहीं क्या हो गया वो पापा को मनाने लग गयी कि फैमिली कैसी भी हो लड़का तो अच्छा है न।मुझे भी पूछने पर मैंने हाँ कह दिया था।

साभार: नांदीपाठ 


माँ को तो जितने भी रिश्ते आए सभी लड़के पसंद थे मेरे लिए। इसका भी पसंद आना कुछ हैरानी जैसा न था।
मैंने सोचा भी नहीँ था कि प्यार ऐसा होता है जिंदगी का।कुछ ऐसे जिंदगी गुज़रेगी मेरी।मंगनी के बाद से ही कुछ बर्ताव बदलता सा जा रहा था।हर रिक्वेस्ट हुकुम होता जा रहा था जिसे न मानने पे रवैया ही बदल जाता था और लहज़ा भी। मेरी इक हाँ मुझे यहाँ तक ले आएगी मालूम न था। अगर मेरी हाँ के बाद मुझे कोई पसंद आ भी गया तो भी मैंने इंकार नहीं किया इस शादी से क्योंकि मुझे तब लगा कि इक बेनाम चाहत के चलते इसके साथ ग़लत नहीं करना चाहिए। आज समझ नहीं आ रहा था कि इस शादी के पीछे इसका क्या मतलब छुपा रहा होगा। कुछ दिल समझ भी रहा है पर फ़िलहाल कुछ कहना नहीं चाहती।

बेटा तो कुछ पल का भी नहीं बन पाया मेरा पति पर हाँ जवायीं का गुरूर बस हाथ थामने की देर थी,पल में सिर पे सवार था। सब कुछ जानते हुए भी जवायीं को गलत भी तो नहीं कहा जा सकता।हिंदुस्तानियों की रीत जो ठहरी। यही हर माँ-बाप और भाइयों का सच भी है। बहुत कुछ जानते हुए भी मेरी माँ का यही कहना होता था।कि औरत को सब सहना ही पड़ता है।आदमी सब एक से ही होते हैं।तू अगर वापिस आई तो सब सवाल करेंगे,बातें बनाएंगे।कल को भाइयों के रिश्ते नहीं आते कि बहिन शादी के बाद भी घर पे बैठी है। बड़े ताया जी की बेटी भी घर वापिस आ गयी थी।ताया जी पता नहीं क्या कुछ दे चुके थे पर मांगें ही थमती नहीं थी।आखिर एक बेटी के साथ मायके वापिस आ गयी थी।वो शायद मेरे से भी ज्यादा बुरे हालातों से गुजरी थी। मेरी माँ को अब यह भी था कि लोग क्या कहेंगे कि इनके घर की बेटियां ससुराल में टिकती ही नहीं। कूड़ा माँ-बहनों के रूप में सब को कबूल है।रात भी कूड़े के बिना नहीं कटती पर बेटी के रूप में कूड़ा नहीं चाहिए किसी को भी।यही हमारे समाज की कहानी है।

जरूरतों का पूरा होना ही प्यार है शायद।


एबॉर्शन के लगभग एक साल बाद फिर से उसी मोड़ पे थी।इस बार टेस्ट करवाने पे बेटा होने का पता चला।
मुझे सुकूँ था कि फिर से एबॉर्शन करवाने नहीं जाना पड़ेगा। बाकी पति और सास बहुत खुश कि बेटा आने वाला है।एक दम से मुझे क्या अच्छा लगता है और क्या नहीं सब कुछ जादू सा पता चल गया था जैसे;जिनका मुझे लगता भी नहीं था कि कुछ ध्यान भी होगा इनको।यानी मेरा बहुत ख़्याल रखा जाने लगा था।मैं किसी बात से भी परेशां न हूँ।इसका भी ख़्याल था। चलो वक़्त आने पे बेटा भी आ गया। वैसे भी मेरी सास को मेरे से कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि उनको अगर घर अपनी मर्ज़ी से चलाना था तो मुझे कोई ऐतराज़ नहीं था।सारे काम या हर छोटा-बड़ा फैसला वोही लेती थी।मेरे गहने मायके और ससुराल दोनों के सब उन्हीं के पास थे क्योंकि उनको अच्छा लगता था कि पूछ के लूँ और उन्हीं को दूँ।सो मेरा-तेरा था नहीं हम लोगों में।उनको मेरा साथ अच्छा लगता था।

बस इसी वजह से कहीं वो जो कुछ उनके पास था कहीं मुझे न दे दें दोनों बेटियों और बड़े बेटे-बहु में टेंशन थी।
मेरा बड़ा भाई भी तब तक वकालत कर चुका था तो यह भी था उन सब को कि सब अपने नाम करवा लेगी यह। वक़्त के साथ-2 बड़ी बेटी और सास के बीच झगड़े भी बड़ने लगे।बात ज्यादा बड़ने पे सास ने उसको बुलाना भी छोड़ दिया। जेठ-जेठानी जो बुआ-सासों के चले जाने से अकेला सा महसूस कर रहे थे।अब बड़ी बहिन भी उनकी पार्टी में थी।

मेरे आगे जिंदगी जैसे एक कड़वी सच्चाई के रूप और आने बाकी थे।शायद तभी कोई किताब पढ़ नहीं पाती अब।किताबी बातों पे विश्वास नहीं रहा। बड़ी को देख छोटी कहीं किसी बात में पीछे न रह जाए–अब माँ को छोड़ बड़े भाई की प्यारी बन गयी। माँ को यह सब देख के बहुत दुःख होता था पर क्या किया जाए।वो बीमार भी रहने लगी थी। काफ़ी बीमार रहने पे डॉक्टर ने लास्ट स्टेज कैंसर बताया। ज्यादा वक़्त नहीं था उनके पास।बस इलाज ही था। सभी रिश्तेदार ख़बर लेने आते रहते थे। आखिर बड़ा बेटा-बहु,बड़ी और छोटी बेटी भी आने लगे।काफ़ी माफियों के बाद कि वो बहुत प्यार करते है माँ से।रात-दिन बारी-2 माँ के आस-पास ही रहने लगे।

माँ खुश भी थी पर कभी कभार मुझे यह भी पूछती थी कि यह आ तो जाते हैं पर मुझसे मेरी सब चीजों को बांटने के बारे में क्यों कहते रहते हैं।मैंने भी कहा कि सबको एक साथ बैठाकर जिसको भी जिनके बच्चों का जो-जो देना है आप दे दो।नहीं तो मेरे को सब खा गयी कहेंगे।पर उनका कहना होता था कि मेरे बच्चे ऐसे नहीं हैं।तू बेकार में परेशान होती है।


जाने क्यों मुझे सब नाटक सा लग रहा था।समझने वाला कोई था नहीं तो पति से इतना कहा कि मेरे गहने बैंक लाकर में हैं तो बस चाबी अपने पास रख ले माँ से लेकर।और सारे कानूनी कागज़ separation और बाकी प्रॉपर्टी के पूरे कर ले।अगर कोई हस्ताक्षर किसी का रह गया हो तो करवा ले क्योंकि मुझे आगे आने वाले वक़्त से डर लग रहा है।

(क्रमशः)

Friday, May 12, 2017

दिल्ली की किताब / शचीन्द्र आर्य

किसी अज़ीम शायर ने क्या खूब कहा है-

मीलों तक पसरी दिल्ली का यह भी एक तवारुफ़ है,
कुछ अफसानों की कब्रें हैं कुछ कब्रों के अफसाने हैं. 

ग्यारह बार उजड़ी और हर बार और उम्दा बसी देहली अपने आप में बोलती तारीख है. शहर की शाम औ सहर बस अव्वलों से नहीं बनती, यह मुकम्मल होती है आम से. इसी दिल्ली के हवाले से लोकप्रिय ब्लॉगर श्री शचीन्द्र आर्य नवोत्पल के लिए नियमित स्तम्भ की शुरुआत कर रहे हैं, उन्वान रखा है, "दिल्ली की किताब ".  

बेहद करीने से एहसास तह कर रखते जाते हैं, शचीन्द्र. इनके ब्लॉग पर वे सभी तहें छुई जा सकती हैं. अनुभव के रंगीन फाहे वे उड़ेलते जाते हैं, हर्फ़ मुस्कुराते जाते हैं.                                                                      (डॉ. श्रीश)


किश्त (एक)

कमरा


शचीन्द्र आर्य
मैंने तय किया है, मैं दिल्ली पर लिखूंगा. हो सकता है, किसी को लगने लगे, यह दिल्ली नहीं उनके शहर की कहानी है, तब उन्हें लगने दूंगा. शायद शहर ऐसे ही होते हैं. वह सबको अपने जैसे लगने लगते हैं. जिन जगहों से छूट कर हम सब इन शहरों की अनजान गलियों में गुम हो जाते हैं, वहाँ कोई ऐसा मिलना सुख से भर देता है, वह मेरे गाँव का है. यह शहर के साथ इस गाँव की तलाश भी है. वह गुम नहीं हुआ है. ओझल हो गया है. जो ओझल हो गया है, दिल वहीं अटका रह गया है. अटक जाने में कोई गम नहीं है. एक ख़ुशी है, इस उलझन भरी दुनिया में कहीं तो हम वापस जाना चाहते हैं. यह इच्छा ही हमें इस जगह से बचा ले जाती है.

***
1.

यह किसी सपनों के पेड़ की कहानी नहीं है. यह हमारे घर की कहानी है. घर. जब हम नहीं थे, घर तब भी था. नहीं होंगे, घर तब भी होगा. इसी घर से शुरू कर रहा हूँ. यह घर ही हमारी पहली दिल्ली है. सबसे पहली याद में याद आता है, गद्दों के पहाड़ पर चढ़कर वहाँ बीचे हुए पलंग पर धम्म से कूद जाना. हम बहुत छोटे रहे होंगे. शायद इतने छोटे कि कूदने के बाद भी वह लगातार कई सालों तक कूदने लायक जगह बनी रही. यही हमारी दिल्ली की सबसे पहली यादों में से एक याद है. यहीं से, इस पलंग वाले कमरे से हमारी दिल्ली शुरू होती है.

हमने चाचा की शादियों की तस्वीरें देखी हैं. बारात के बैलगाड़ी पर जाने के किस्से सुने हैं. तीन-तीन दिन बरात के रुके रहने का इत्मिनान उनकी आँखों में देखा है. पर पापा-मम्मी की शादी की कोई कहानी बाबा से हमें नहीं सुनी. हमारी स्मृतियों में सबसे पहले मम्मी-पापा की वह तस्वीर है, जिसमें दोनों शादी के बाद बहराइच के किसी नामी फोटो स्टूडियो गए हैं. दादी भी वहीँ सामने कहीं खड़ी होंगी. फोटोग्राफ़र ने दो तस्वीरें उतारी हैं. एक रंगीन. एक सादी. जिसे सब आज 'ब्लैक एंड वाइट' कहते हैं. बाद में किसी ने कहा रंगीन वाली उसने ख़ुद रंगी है. मेरा दिल उसी में कहीं अरझा रह गया है.
2.

हम तब पैदा नहीं हुए हैं. या इतने छोटे हैं कि स्मृति में वह तस्वीर ही हमारी पहली याद है. नीचे वाले कमरे का दरवाज़ा खोल कर मम्मी अन्दर आ रही हैं. पापा ने उस दरवाज़े को अपने हाथों से खोलते हुए मम्मी की तस्वीर खींची है. कमरा बहुत बड़ा नहीं है. एक बड़ी सी खिड़की है. एक दिवार में चुनी हुई अलमारी है, जिस पर लकड़ी का दरवाज़ा है. उसी अलमारी के एक ताखे की दिवार पर पापा ने बाबा-दादी की फ़ोटो चिपका रखी है. दो तीन और फ़ोटो हैं. पर अब याद नहीं कौन-कौन उनमें रहे होंगे. शायद एक आजी की तस्वीर रही होगी और एक उनके बड़के मामा की फोटो होगी.

मम्मी के दिल्ली और दिल्ली में भी इस कमरे में आने से पहले यह लकड़ी के दरवाज़े वाली अलमारी ही पापा का सारा सामान समेटे हुए रखती. सामान रहा ही कितना होगा. एक स्टोव, दो चार जोड़ी कपड़े, और थोड़ी सी दाल, चावल, एक डिब्बे में चीनी. एक चायपत्ती की डिबिया. सब सामन अलमारी में. अलमारी में ताला लगाया. सब बंद.

बचपन में जितना पीछे जा सकता था, जाकर यही ला पाया हूँ. खैर. उसी खिड़की के पास एक नल था, जिससे नगर निगम का पानी रोज़ सुबह पांच बजे अलारम की तरह सही वक़्त पर आ जाया करता. टंकी में पानी भरने की ज़रूरत नहीं थी. वहीँ एक बन्दर छाप लोहे की बाल्टी टंगी रहती. शाम पानी चार बजे आएगा, उससे बर्तन धुल जायेंगे. कमरे में जो एक खिड़की थी वह आदमकद थी. सामने आम का पेड़ और बहुत बाद में पता चला उसी के बगल के पेड़ में जो फूल आते हैं, उन्हें गुलमोहर कहते हैं. अमलतास खिड़की के बायीं तरफ झुकने पर दिखाई देता. उसी पर एक पर्दा और परदे के पार गर्मी से राहत देता डेजर्ट कूलरमौसम चाहे कोई भी रहे. खिड़की से कूलर हटाने की कोशिश भी नहीं की जाती

3.

Source: Google Image

यह एक कमरे का हमारा घर. जिसे कब घर बोलना शुरू किया, याद नहीं. पर एक दिन रहा होगा, हमारे इस दुनिया में आने से पहले जब पापा मम्मी को यहाँ लाये होंगे. शादी के बाद सपनों के घर. उन उम्रों का रुमान मम्मी पापा ने साथ मिलकर बुनना शुरू किया होगा. सारी व्यवस्थाएं इसी चारदीवारी में कर के इसे मम्मी के लिए बनाया होगा. कुछ बर्तन लाये होंगे. वो बाबा वाला डिब्बाआटे का कनस्तर, बत्ती वाला स्टोव. सब तभी दाखिल हुए होंगे. कुछ पापा अपने मन से लायें होंगे. कुछ को मम्मी ने कहा होगा. साथ में चली आई होंगी दोनों के हिस्सों की खाली जगहें. जिसे हमारे आने की आहटों ने भरा होगा. भर गए होंगे उन सपनों से पहले पहल आने की दस्तक से. उसमें गूंजती होंगी आने वाले कल की आवाजें, शरारतें, इतराना, इठलाना. जैसे इतने सालों से थमा है, इस शहर में एक कमरे का अस्तित्व. हमारी बनावट बुनावट में इसकी हिस्सेदारी सबसे जादा है.  

पापा दिनभर नीचे ऑफिस में रहते. वहीँ से बिन बताये पहाड़ी धीरज चले जाते. वहाँ कभी कोई प्रेस रही होगी. जब-जब पापा वहाँ जाते मम्मी अकेले रह जातीं. उनके अकेलेपन में इंतज़ार की घड़ियाँ और पतीली में चुरती दाल रही होगी. सायकिल बहुत बाद में आई. पैदल ही जाना और पैदल ही आना. आर्य प्रतिनिधि सभा का 'आर्य जगत' वहीं छपता. उसकी कॉपी देखना पापा के जिम्मे था. चश्मा तभी लग जाना चाहिए था. बहुत दिन बाद, हमारे सामने लगा. पड़ोस में कौन रहा होगा? कमरा इतना बड़ा नहीं था कि जान पहचान में ज्यादा वक़्त लगने वाला था. उससे पहचान ही उन दिनों की ऊब से बचने का एक ही रास्ता थी. कोई नहीं. अकेले रहना शायद तभी से मम्मी ने सीखना शुरू कर दिया होगा. यह उनका इन दिनों का पूर्वाभ्यास था.

***
(क्रमशः)