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Wednesday, January 17, 2018

'नोखा ईआ' : अर्चना मिश्रा

फोटोग्राफी में गोल्ड मेडलिस्ट रही अर्चना मिश्रा जी ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में परास्नातक की डिग्री हासिल की है ।  पेशे से अध्यापिका रहीं हैं और इत्तेफाक़ से उस स्कूल में भी पढ़ाया है जहां उनके मामाजी, मौसीजी आदि भी अपने बचपने मे पढ़ा करते थे । लेखन और पढ़ने में आप की सदैव ही रुचि रही है पर पिछले दस – पंद्रह सालों में पारिवारिक जिम्मेदारियाँ इतनी थीं कि पढ़ना जारी रहा पर लिखने पर लगाम सी लग गयी थी। सालों बाद अर्चना जी पूर्वी उत्तर प्रदेश के अपने गाँव का एक क़िस्सा आज नवोत्पल परिवार को सुना रही हैं।                                                                                                                 (टीम नवोत्पल )


अर्चना मिश्रा


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वर्तमान समय में कामवाली का नाम सुनते ही जो तस्वीर हमारे मन-मस्तिष्क में उभर कर आती है, वह एक नखरेवाली स्त्री के रूप में ही आती है।  क्योंकि आजकल हम अच्छे से अच्छी वस्तुबड़े से बड़ी कीमत देकर खरीद सकते हैं और हम आश्वस्त भी  रहते हैं कि वह वस्तु, हमारी कसौटी पर खरी उतरेगी। लेकिन कामवाली के मामले में तो, यह भी असंभव सा लगता है। परंतु सभी लोग एक जैसे नहीं होते हैं ,विशेषकर गाँव में आप को अब भी बहुत अच्छे लोग मिल जाते हैं । भले ही वो  हमारे यहाँ काम करते हों पर  हम उन्हें कभी कामवाली  ( या दाई,आया,महरिन,धाय,माँ आदि) कहते भी नहीं बल्कि चाची , बुआ , मामी काकी आदि   किसी न किसी रिश्ते से ही पुकारते है । ऐसे ही थीं हमारे गाँव की नोखा ईआ। 

साभार: rapidiq.wordpress.com


       लगभग पच्चीस वर्ष बीतने के बाद भी, उस सरल स्वभाव वाली, साधारण सी दिखाई देने वाली, गरीब (धन से, मन से नहीं), अनपढ़, बुजुर्ग महिला की याद बार-बार आती है.... वह हमारे घर की सदस्या नहीं थीं बल्कि गाँव में, सभी के घरों में काम किया करती थीं, और सभी घरों की सदस्या थींसब के साथ शामिल थीं पर किसी एक परिवार की नहीं थीं। बहुत दिनों से कुछ लिखने की इच्छा हो रही थी। बार-बार मन में यह  विचार  आ रहा है  कि मैं उनके बारे में अपने भावों को व्यक्त करूँ, उनके के बारे में कुछ लिखूँ.......अगर आप पूछते हैं क्यों?.... तो इसका जवाब सिर्फ इतना है कि  पता नहींइस पता नहीं मे बहुत कुछ बताने लायक होता है , पर वो बातें फिर कभी।

       उस साधारण सी महिला के साथ मेरा  खून का संबंध तो था नहीं, शायद दिल का रिश्ता ही है जो बार-बार मुझे  याद आती है उनकी। मैं ही क्या, गाँव के वह सभी लोग  जो उनके समय में थेआज भी उनकी बात करते हैं। बचपन मे,छुट्टियाँ हम अक्सर अपने  गाँव मे बिताया करते थे। गाँव जाने पर हमारे आकर्षण का केंद्र होती थी नोखा ईआ(ईआ दादी को कहते हैं )। वह इतनी भोली और सरल स्वभाव की थीं  कि खुशबू वाला तेल,(संभवतः  चमेली का रहा हो ) भी उन्हें   किसी टोना- टोटके का हिस्सा जैसा  लगता था। 

       एक बार की घटना बताऊँ मैं आप सबको, गाँव के सबसे प्रतिष्ठित और सम्पन्न घर में काम करते हुए उन्होंने सिर में दर्द की बात कही तो उसी प्रतिष्ठित घर की बेटी ने, जो पढी-लिखी, सुंदर और एक बैंक अधिकारी की पत्नी थी, अपने हाथ से ही कोई बढ़िया तेल, बिना किसी नफासत के, उनके सिर पर डाल दिया (आज के युग मे शायद ही कोई ऐसा करे )। फिर क्या था उस घर से निकलते ही उनका ड्रामा शुरू हो गया। .... पूरे गांव में घूम घूम कर उस प्रतिष्ठित महिला और अपने ही  गांव की बेटी के टोटके का गुणगान करने में उन्होंने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी....... गाँववाले  उनके गुणगान का भरपूर आनंद लेते थे ....लेकिन वह बेचारी  सबसे बड़े बुझे मन से कहतीं "....फलां ..बहिनी का जाने कौन टोना कर देहली "।......गांव वालों के लिए नोखा ईआ  मनोरंजन का माध्यम  बन गई थीं ...... गाँव की कोई महिला यदि कहीं जाते समय उनसे कह कर जाती कि “पतोहिया आज अकेल बा , तनी ध्यान दिहल जाई   (घर में बहू अकेली है जरा ध्यान दीजियेगा, देखभाल की जिम्मेदारी आपकी ही है ) ..... फिर तो बहू को एक मिनट भी चैन से रहने नहीं देतीं।..... बहू का हालचाल जानने के लिए.... ना जाने कितनी बार उसे आवाज लगातीं....... इतनी बार कि जवाब देते देते ही बहू थक जाए और सोचती कि क्यों सासू माँ ने इन्हें मेरी देखभाल के लिए कहा।

एक बार की बात हैबहू ने घर की जैसे ही साफ सफाई की, बाहर से उस सरल महिला ने आवाज लगाईबहू से  कुछ पूछा.... भीतर से बहू ने कुछ  जवाब दिया..... उस सरल स्वभाव वाली, थोड़ा ऊँचा सुनने वाली,...... दुबली पतली काया वाली,...... बुजुर्ग महिला ने न जाने क्या सुना और क्या  समझा कि..... लगभग आधे घंटे बाद, एक टोकरे मेंमिट्टी लगी छोटी -छोटी लकडियाँ लाकर उस, थोड़ी देर पहले साफ किए गए बाहर के कमरे,...... (जिसे गांव में दालान कहते हैं)..... में ला कर झम्म्म की आवाज़ के साथ पटक दिया........... बहू  बेचारी समझ नहीं पा रही थी कि उस निश्छल महिला पर गुस्सा करे या हंसे।

       चूँकि पहले से ही उनका  रोजगारसबके घर का काम करना ही था इसलिए  बुजुर्ग होने के बाद भी उन्हें लगता था कि सारे काम वह अब भी  कर सकती हैं।........ लोग उनकी तसल्ली के लिए,उनके करने योग्य  कोई काम उन्हें बता देते, जिससे वह बहुत खुश हो जाया करती थीं  और पूरी जिम्मेदारी से उसे पूरा करने की कोशिश करती थीं। जिस उम्र मे लोग दूसरों पर आश्रित हो जाते हैं , उस समय भी काम करना ही पसंद था उनको। लोगों को लगता था कि ईया मानसिक संतुलन खो चुकी हैं। अकेले बुजुर्ग इंसान , वो भी गरीब को बुल्ली (धौंसीयाना) करना लोगों कि फितरत मे तब भी आज जितना ही था। पर आत्मसम्मान से भरी हुई नोखा ईया अपना वजूद कायम रखे हुए थीं।

जिस दिन वो मरीं उस दिन पूरे गाँव मे शोक था , कोई उनकी मृत्यु को उनकी मुक्ति कह रहा था , तो कोई उनके जल्दी चले जाने कि शिकायत ईश्वर से कर रहा था । पर गाँव का हर बच्चा और जवान जो उनकी गोद मे खेला था बस शून्य मे निहार रहा था और एक खालीपन जी रहा था। गाँव कि वो बहुएँ भी दुखी थीं , जिन को अपनी बहू मान कर नोखा ईया ने हुकुम चलाये थे ।  ये इस गाँव की  दादी, बुआ, सास  , काकी  सब कुछ थीं । ये एक ऐसी अर्थी  जिस पर लेती हुई औरत हर एक घर की सदस्य थी , जिसे सब घाट तक छोड़ कर आना चाहते थे।  

ऐसे ही पता नहीं कितने किस्से समेटे इस संसार से विदा होने बाद भी, बार बार उस सरल, बुजुर्ग महिला की याद आ जाती है।  शायद कुछ अनोखी थी इसीलिए ..पूरे गांव की  नोखा (अनोखा) ईआ थीं।


Sunday, January 14, 2018

बरसात, कृषि और भावुकता से जुड़ा हुआ बिहारी लोकनृत्य जाट-जाटिन

जयकृष्ण मिश्र 'अमन' जी का शोधपरक आलेख: 

चित्र साभार: http://gktopic.blogspot.in

भारत परम्पराओं का देश है, सांस्कृतिक विविधताओं का देश। इसके विभिन्न प्रदेश न जाने कितनी सांस्कृतिक विशिष्टताओं को समेटे हुए हैं। प्रत्येक प्रदेश स्वयं में अनगिनत नृत्य, संगीत और कलाओं से समृद्ध है। ये कलाएं प्रतीक हैं हमारी गौरवशाली विरासत और परम्परा की। बिहार ऐसे ही कलात्मक समृद्ध प्रदेशों में से एक है।

बिहार प्रदेश है, किसानों का, ग्रामीण संस्कृति का। बिहार का ग्राम-लोक है; अनपढ़, तथाकथित गंवार, किन्तु भोले-भाले लोगों का। उनका, कि जिनके कार्य कठिन हैं लेकिन मन मिठास से भरा हुआ है। उनकी लोक-कलाएं भी ऐसी ही हैं; सहज, मधुर और सौम्य।

जाट-जाटिन, उत्तरी बिहार का अत्यन्त प्रसिद्ध और प्रचलित लोकनृत्य है। कोशी और मिथिला क्षेत्र में इसकी विशिष्ट ख्याति है। यह नृत्य एक किंवदन्ति कथा पर आधारित है। कहते हैं कि एक जाट और जाटिन थे। एक-दूसरे से अत्यन्त प्रेम करते थे; सच्चा, हार्दिक और आनुभूतिक। परन्तु तथाकथित सामाजिक सिद्धांतों ने उन्हें अलग कर दिया। वे एक-दूसरे से दूर होकर अत्यन्त विपरीत परिस्थितियों में; बेहद दुःख में, पीड़ा में, वंचना में किसी तरह जिए। इस नृत्य का मूल आधार उनके पवित्र प्रेम की स्मृति को प्रस्तुत करना तथा व्याख्यायित करना है। मूलतः जोड़े में किया जाने वाला यह नृत्य जाट-जाटिन के उसी रूहानी प्रेम की कलात्मक प्रस्तुति है, उन्हें श्रद्धांजलि है।

प्रारम्भ में तो यह नृत्य इस प्रेम की कलात्मक प्रस्तुति मात्र ही था, परन्तु धीरे-धीरे उसका दायरा बढ़ता गया। प्रेमानुभूति के साथ ही यह सामाजिक समस्याओं और लौकिक घटनाओं से भी जुड़ता गया। सूखा, बाढ़, गरीबी, प्रेम, दुःख, पति-पत्नी/प्रेमी-प्रेमिका की आपसी बातचीत, तू-तू-मैं-मैं, मान-मनौव्वल आदि सामाजिक परिस्थितियां और प्राकृतिक आपदाएं इस नृत्य को विस्तार देतीं गईं। इस वैविध्य के कारण इस नृत्य के कई संस्करण भी विकसित हुए।

मूलतः नवयुवतियों और कम आयु की गृहणियों द्वारा जोड़े में किया जाने वाला यह नृत्य बरसात के मौसम में, आधी रात को, चाँद की रोशनी में किया जाता है। बरसात की रातों में लड़कियां किसी घर के बड़े से आँगन में इकट्ठी होती हैं। कुछ लड़कियां पुरुष वेश धारण कर जाट बनती हैं तो कुछ स्त्रीवेश में जाटनी। ग्रामीण वेश-भूषा धोती, गमछा, साड़ी पहने हुए नर्तक अपनी भूमिका को वास्तविक रूप के और ज़्यादा निकट लाने के प्रयास में कभी-कभी चेहरे पर मुखौटा भी लगाते हैं। फिर क्या.....! जोड़े बनाकर ये युवतियाँ, गले में ढोल लटकाकर आधी रात से सुबह तक नृत्य करती हैं। मानो चाँद-तारे सब ज़मीन पर ही उतर आये हों। जाट-जाटनी के इस मनोरम नृत्य को यकहा नृत्य भी कहते हैं।

इस नृत्य के साथ गाये जाने वाले गीत मूलतः बरसात पर आधारित होते हैं। नृत्य की शुरुआत में सबसे पहले यक्ष का आह्वान और बरसात की प्रार्थना  की जाती है। प्रेमी यक्ष बादलों पर सवार हो कर आएगा और फ़िर बरसात अपनी रिमझिम से न केवल खेत और फसलों को बल्कि किसान के मन को भी हरा-भरा कर देगी। इसके बाद वास्तविक नृत्य की शुरुआत होती है।

नृत्य की भंगिमाएं गीत के भावों के आधार पर निर्धारित की जाती हैं। सुकुमार शारीरिक गति के साथ होने वाली इसकी मुद्राएं सजीव और ऊर्जावान होती हैं। नृत्य करते समय प्रत्येक गति के दौरान शरीर चार कदम आगे और फ़िर चार कदम पीछे जाता है। ऐसा करते समय पैरों की चाल बहुत जटिल नहीं होती, बल्कि बाँहों और पैरों की चाल बेहद शान्तिप्रिय और ऊर्जावान होती हैं। इसकी लय में 6, 7 या 8 ताल होते हैं। जैसे:- दादरा, कहरवा, तीवता आदि! 

बरसात, कृषि और भावुकता से जुड़ा हुआ यह नृत्य न केवल उन वैज्ञानिक-संचार-साधनों से विहीन ग्राम बालिकाओं के मनोरंजन से जुड़ा हुआ है, बल्कि निज-विचार-प्रस्तुतीकरण और सामाजिक सन्दर्भों एवं समस्याओं के विषय में जागरूकता फैलाने वाला भी है। भूमण्डलीकरण, गांवों के शहरीकरण एवं तेज़ी से बदलती आधुनिकीकरण की हवा में यह नृत्य लुप्तप्राय हो गया था, पर संचार के साधनों एवं मानव के सांगीतिक प्रेम ने कमोबेश कुछ परिवर्तनों और नवीन संस्करणों के साथ इस नृत्य को पुनर्जीवित करने का अत्यन्त सुन्दर प्रयास किया।


आप हिंदी साहित्य के समर्पित अध्येता एवं नीर क्षीर विवेकी रचनाकार भी हैं. साहित्य के साथ-साथ अन्य सभी विभागों एवं विधाओं में लेखन.
 jaykrishnaaman@gmail.com 

Thursday, September 21, 2017

#45 # साप्ताहिक विशिष्ट चयन: "एक झूठ बनाम हैप्पी एंडिंग" /रश्मि भारद्वाज


रश्मि भारद्वाज
भाषा भाव का दामन पकड़ हिलोर ले सरस सलिला रहती है. उसके अनायास प्रवाह को  समक्ष के असमतल उच्चावच रोक नहीं पाते. एक समय था जब हिंदी साहित्य में यथार्थपरक लेखन की परम्परा ने जोर पकड़ा और नयी कहानी, नयी कविता का जन्म हुआ. आन्दोलन ने अपनी छाप छोड़ी और हिंदी साहित्य की यात्रा में एक उम्दा मील का पत्थर बनी. वैश्वीकरण और उदारीकरण का भारत जहाँ दुनिया के फ़्लैट होने की बात कही जाती हो, हिंदी में समयोचित बदलाव अपेक्षित ही हैं. 

एक रुचिकर विडंबना यह भी है कि जिन पुरोधाओं ने कभी पारम्परिक धारा को चुनौती देने की कोशिश की थी और समयोचित परिवर्तन की महक से साहित्य को गुलज़ार किया था उन परम्परा में से ही दीक्षित कई अब इस नए समय के मुताबिक अपेक्षित परिवर्तनों पर कुंडली मारे बैठे हुए हैं. पर भाषा वह हवा है जो हौले से दरिया पार कर लेती है, दरख्तों पर झूलती है और पहाड़ों से गलबहियां करते हुए सौरभ बन जाती है. आज 'नयी हिंदी' की चर्चा अकारण नहीं है. 'नयी हिंदी' इस पीढ़ी की आवाज है, नयी हिंदी हवा का वह झोंका है जिसका आना रोका नहीं जा सकेगा, यह कभी परिवर्तन के पैरोकार रहे मूर्धन्यों का जवाब है, यह परम्परा और आधुनिकता के सिंथेसिस के कमाल से पैदा होती नयी धुन है. इस सिम्फोनी में यों तो कई नाम है, पर आदरणीया रश्मि भारद्वाज एक सशक्त हस्ताक्षर हैं. आपकी कृति 'एक अतिरिक्त अ' को 'ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. 

४५वीं साप्ताहिक प्रविष्टि नवोत्पल की विशिष्ट प्रविष्टि है. रश्मि भारद्वाज जी ने अँग्रेजी साहित्य से एम.फिल और पत्रकारिता में डिप्लोमा  की  उपाधि प्राप्त की है। आप को जागरण, आज आदि प्रमुख समाचार पत्रों में रिपोर्टर और सब - एडिटर के तौर पर कार्य का चार वर्षों का अनुभव भी है। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य तथा  गलगोटिया यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।

आप कि कविता पर टीप कर रही हैं  कवयित्री राजलक्ष्मी शर्मा जी ने , जो कि अपने अनुवाद कार्य के लिए भी बहुत प्रसिद्ध हैं।  

(टीम नवोत्पल)


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एक झूठ बनाम हैप्पी एंडिंग

बचपन में हमें ठगने के लिए सुनाई जाने वाली कहानी में
हुआ करते थे एक राजा-रानी भी
दोनों मिले लो ख़त्म हुई कहानी
इन काल्पनिक कहानियों के नकली राजा-रानी
अब अक्सर राह चलते टकराते हैं
रानी के पैरों की फटी है बिवाई
राजा के जूते घिसे हुए हैं
खाली कनस्तरों सा अक्सर ढनमनाता है उनका प्रेम
दीवारों की झरती परतों से गिरते हैं सपने

हम मिलने को अक्सर मरने से बदलकर खिलखिलाते थे
आज़ अख़बारों के लाल पन्ने देख सहम जाते हैं
नींद के मीठे देश में ले जाने वाली वो कहानियाँ
आज़ नींदें ही ले गईं है अपने साथ
तब सो पाते थे बेफ़िक्र हम
जब तक नहीं था पता
कि राजा रानी के मिलने के बाद कहानी ख़त्म नहीं
बल्कि शुरू ही हुआ करती है
बीच के कई गुम पन्नें बाद में हमें मिलते
नजरें छुपाते हैं
उनका अंत लिखता कथाकार
ठीक अंतिम पंक्ति से पहले ही भूल गया है अपनी कहानी
यह सब हमने बहुत बाद में जाना

हम तो कहानी में जीते-जागते –सोते हैं
जब तक नहीं जानते
कि दरअसल कहानियाँ हमें जी रहीं होती हैं।


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साहित्य समाज के लिये परम आवश्यक है इसकी कई विधा अलग अलग रूप में अपना अस्तित्व बनाये हुए है गद्य  में निबंध  वृतांत , उपन्यास  ,कहानी लघु कथा समिलित हैं वही पद्य में दोहा, सोरठा कवितायें है ।

ये दौर अकविता का है  कम शब्दों में मन का/व्यवस्था का  प्रकटीकरण  ही कविता के रूप में हमारे सामने आता है सामयिकता का बोल बाला कविता लेखन में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है ।

वर्तमान में जब ढेर सारे साहसी कवि-कवियत्री तर्कपूर्ण ढंग से नये आयामों प्रतिबिम्बो के सहारे अपनी बात रखते है तब नवोत्पल की चयनित कवियत्री रश्मि जी अतीत की एक लोक कथा का चुनाव करती हैं ।  रश्मि एक चली आ रही बात पर रोशनी डालती हैं जो कमोबेश सबने सुनी होगी ,सुनते समय कल्पना की होगी और एक अवस्था के बाद सत्यता भी महसूस  की होगी बस कहने का साहस नही कर पाये |

रश्मि सहज शब्दों में वर्तमान जीवन शैली की वास्तविकता  साहसिक ढंग से उधेड़ती है । गीत वही है एक था राजा एक थी रानी दोनों मिल गये हुई कहानी ।
यहां रानी के पैरों की फटी बिवाई उसके अतीत के संघर्ष की दास्तान है जो सिर्फ आने वाले समय की उम्मीदी में दर्द बिसारते बीतता है ।  उनकी कविता में उपमाएं प्रतिमान क़तई गढ़े हुए नहीं लगती , बनावटीपन से कोसों दूर वो लिखती हैं ।
ख़ाली कनस्तरों सा बजता प्रेम तो ये सिर्फ परिस्थितियों को ढंकने की कोशिश मात्र है जो इन दिनों  का हिस्सा हो गया है
राजा रानी शायद दोनों ही सुनाने वाले की बुझी आंखों को याद करते हैं  जिन्होंने हमेशा कहा कि एक दिन एक राजा/रानी मिलेगा तुम्हे दूर कल्पना के देश ले कर जायेगा जहां तुम्हारी कल्पित सारी चीजें मौजूद रहेंगी ।

हक़ीक़त इसके विपरीत होती है रोज़ मरते मरते एक दिन हम परिस्थिति के आगे नतमस्तक हो जाते हैं खुद को अभ्यस्त पाते हैं इस जीवन शैली के जिसमे मुड़ने या रुकने की कोई गुंजाइश नही बचती इस तरह का जीवन जीना  जुबान को तल्ख और कलम को बागी बना जाता है ।

इस गीत  के रचनाकार को झिंझोड़ सकने की ताब परिस्थितियों में तप कर आती है ।
कवियत्री की बेचैनी पाठक की छाती तक उतरती है और यही बेलागपन और खड़े होने की मजबूती  ,प्रकटीकरण की यही साहसिकता उंन्हे भीड़ से अलग करती है ।

रश्मि की कवितायें सहज पठनीय हैं बिना ना नुकुर किये आप पढ़ते चले जाते हैं भाषा का प्रवाह भावों के सम बहता चला जाता है पर कविता जहां रुकती है आप दर्द से कराह उठते हैं ये दुख की साम्यता पाठक को  कवि मन से जोड़ती है और यही कवि की सफलता भी है औचक से खड़ा पाठक दोबारा तिबारा पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर पाता इस दर्द को शब्दों में पिरोना कदाचित एक असाधारण कार्य है जो रश्मि ने बख़ूबी किया है ।

उनकी कलम और निखरे वो इसी तरह सशक्त ढंग से बात रखती रहें यही शुभकामनायें ।