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Monday, April 11, 2011

किर्र ..किर्र.....किर्र..किर्र


किर्र ..किर्र.....किर्र..किर्र

लकड़ी के दरवाजे में नहीं
देह में
सुनो
कान लगाकर
अपनी सांस . .....
समय का घुन
अनवरत चर रहा है
तुम्हें  .......!

अभिषेक आर्जव 

8 comments:

  1. धीरे धीरे खोद रहा है सब।

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  2. सुन्दर अभिव्यक्ति। आभार।

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  3. बेजोड़ आर्जव....नही चाहिए अनगिनत शब्द...भावों के लिए..यकीनन..

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  4. Fir mitti me mil hi jana hai..ati sundar

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  5. dekhan me chhote lage ghav kare gambhir ....ko charitaarth karti hai aapki kavita......uttam

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  6. सुन्दर शाब्दिक उभार भावनाओं का।

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  7. शानदार चेतावनी ! आभार.. अभिषेक !

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