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Thursday, November 10, 2016

#1# साप्ताहिक चयन: मां जलाकर आया है बारिश/ *सागर'

डॉ.
अभिषेक शुक्ल 'निश्छल'
सागर साहब 
नवोत्पल की यात्रा में दिवस गुरूवार की अप्रतिम महत्ता है । अभी यह तय हुआ कि प्रति गुरूवार एक विशेष कविता चयनित की जाए और उसे एक विशिष्ट सम्पादकीय टिप्पणी के साथ प्रकाशित की जाय । पहली कविता चयनित हुई है सागर साहब की । सागर साहब  एक पुराने प्रतिबद्ध ब्लॉगर हैं और अपनी तरह की अलहदा कविताओं के शिल्पी । इस अल्हड़ कवि की रचना पर यदि एक संवेदनशील अनुशासित पारखी की टिप्पणी ली जाये तो एक मणि-कांचन संयोग तो घटेगा ही....यह टिप्पणी तैयार की है..हिंदी साहित्य में रचने-बसने वाले डॉ. अभिषेक शुक्ल 'निश्छल' जी ने. आइये आस्वादन लें ! -डॉ. श्रीश


(साभार: गूगल इमेज)



"मां जलाकर आया है बारिश

बेआबरू होकर बरसे ही जा रहा है।

मुंह खोले गुस्साए बरस रहा पानी 

टपाटप गिर रहा, झमाझम नहीं

अपनी लय से बेखबर, बरसने की अदा से जुदा

आज बारिश, बूंद-बूंद बरस जाने में बहुत पेशेवर है



मिट्टी के बांध बह जाएंगे

नदी की धाराएं फूट पड़ेंगी

घुटने भर पानी, फसल कुछ इंतज़ार में खड़ी होगी 

जैसे छठ अध्र्य में सुहागिनें मन्नत के लिए

उजाड़ कच्चे गांव फिर कहीं बसने की जगह देखेंगे

आसमान का टैंकर खाली हो जाएगा

कौवे निर्जन प्रदेश की घास में अपनी चोंच उल्टा उल्टा कर पोछेंगे 

लेकिन नहीं पड़ेगा फर्क पत्थर की पीठ पर



नहीं पड़ेगा फर्क पत्थर की पीठ पर

रेशा रेशा फूट रहा है

छिन्न छिन्न उड़ रही पानी की बारूद

कोई मूर्तिकार छेनी लिए पत्थर तराशता हो जैसे

और हर कोंच पर बारीक बुरादे उड़ते हों



कहां जा रही बारिश अपना मायका छोड़कर

धरती बस एक अवरोधक लगता है

चुकंदर की तरह अपना ही हृदय दोनों हथेली में लिए सरे बाज़ार 

खुद को निचोड़ रहा

मां जलाकर आया है बारिश, बेरहम।"





[सृष्टि का सबसे संवेदनशील रिश्ता 'माँ' से यह कविता प्रारम्भ होकर,रिश्तों की अहमियत के खात्मे पर मनुष्य को जिस विशेषण 'बेरहम' से नवाज़ा जाता है,वहाँ यह कविता ख़त्म होती है।इससे लगता है कि युवा कवि सागर मानवीय संस्पर्श के कवि हैं।सम्बन्धों की गम्भीरता के साथ-साथ वह बारिश को पेशेवर भी बनाते हैं जिसमें बारिश से अपनी उन्मत्त स्वाभाविकता को त्यागकर व्यवसायी की भाँति बून्द-बून्द, सूझ-बूझ से वर्षा कराते हैं।मिट्टी के बाँधों का बहना, नदी की धाराओं का फूटना तथा वहीं अपनी प्रबल इच्छा के पूर्ण होने की तपस्या में लीन फसलें प्राकृतिक विसंगतियों को दर्शाती हैं।इस प्राकृतिक अवदान बारिश के होने न होने से जहाँ कहीं भी संवेदना है उस पर प्रभाव पड़ता है परन्तु संवेदनहीनता के प्रबल उदाहरण पत्थर पर संवेदनशील स्निग्धता का कोई असर नहीं होता बल्कि इस निष्ठुरता का प्रतिकार,जीवन के पर्याय बारिश के जल को सहन करना पड़ता है।उस प्रतिकार के बावजूद रचनाकार ने ,मूर्तिकार की संकल्पना करके जिस कल्पित मूर्ति की ओर ध्यान दिलाया है वह रचनार्धर्मिता,अनवरत संघर्ष और सूक्ष्म दृष्टि का द्योतक है जिसकी अनुपस्थिति में मूर्तिकार और रचनाकार दोनों विफल हो जाते हैं।कविता के अंत में कवि मर्मस्पर्शी बात करते हुए कि 'बारिश अपना प्रिय स्थान छोड़कर और निःशेष भाव से सब कुछ निचोड़कर दूसरों को समर्पित कर देता है' ,कविता की भावनात्मकता को शीर्ष पर पहुँचा देता है और कविता अपने उददेश्यों में सफल हो जाती है।]                                                        



डॉ. अभिषेक शुक्ल 'निश्छल'

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