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Thursday, December 22, 2016

#7# साप्ताहिक चयन: जंगल एक आवाज है/ *वीरु सोनकर'

वीरू सोनकर
 इस सप्ताह नवोत्पल सम्पादकीय समूह ने चयनित की है युवा रचनाकार वीरू सोनकर जी की एक महत्वपूर्ण कविता 'जंगल एक आवाज है' को। वीरू जी फेसबुक पर अपना परिचय इन शब्दों में देते हैं: "निष्पक्ष, जिद्दी, घातक और आत्मसाक्षात्कार की धुन में दुनिया की भीड़ में खोया एक अथक यात्री" ! 

एक संजोग ही है कि वरिष्ठ पर्यावरणविद व जमीनी कार्यकर्त्ता अनुपम मिश्र जी का महाप्रयाण हुआ है, ऐसे में इस कविता का सन्देश और भी मौजू हो जाता है। प्रकृति शब्द का जीवंत पर्याय जंगल ही होता है,  किन्तु जो दृष्टि 'जंगली' शब्द को  'शुद्धता व सहजता' की बजाय ''असभ्यता' का पर्याय बनाती है, उस दृष्टि की पड़ताल आवश्यक है। कृत्रिमता को कबसे हमने इतनी वरीयता और अधिकार दे दिए कि उसने प्रकृति को अपने थोथे परिप्रेक्ष्य थोपने शुरू कर दिए...? एक पुरावलोकन की मांग करती हो जैसे ये कविता ! 

इस महत्वपूर्ण कविता पर अपनी सम्मत टिप्पणी देने का अपर्णा अनेकवर्णा जी का अनुरोध स्वीकार किया है श्री सुरेन सिंह जी ने। आप श्रम प्रवर्तन विभाग में वरिष्ठ अधिकारी हैं पर मन रमता है शब्दों और उनके अनगिन अठखेलियों में। सुरेन जी ने कविता को अपनी दृष्टि से परखा है और सम्यक आलोचना की है। आइये देखते हैं यह समानांतर आयोजन ! (डॉ. श्रीश)


गौरव कबीर के कैमरे से 


जंगल एक आवाज है
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जंगल गायब नहीं है
वह देर से बोलता है
अपने सन्नाटे की अलौकिक रहस्यमयता लिए
हमारे भीतर चीखता है
कहता है
मेरी प्रतिलिपि दूर तक बिखरी पड़ी है
तुम्हारे ड्राइंगरूम के बोनसाई से लेकर स्वीमिंगपूल की उस नकली पहाड़ी नदी तक
जंगल एक अमिट स्मृति है
सड़को पर छाई सुनसान रात उस बाघ की परछाई है
जो तुम्हारे शहर कभी नहीं आता
जंगल अचानक से हुए किसी हमले की एक खरोंच है
एक जरुरी सबक कि जंगल कोई औपचारिकता नहीं निभाता
जंगल एक बाहरी अभद्र नामकरण है
जंगल दिशा मैदान को गयी
एक बच्ची को अचानक से मिला एक पका बेलफल है
जंगल बूढ़े बाबा के शेर बन जाने की एक झूठी कहानी है
जंगल खटिया की बान सा सिया हुआ
एक घर है
जंगल वह है जो अपने ही रास्तो से फरार है
जंगल हर अनहोनी में बनी एक अनिवार्य अफवाह है
जंगल एक रंगबाज कर्फ्यू भी है
जो तय करता है रात को कौन निकलेगा और दिन में कौन
जंगल जो बारिश में एक चौमासा नदी है
तो चिलचिलाती धूप में बहुत देर से बुझने वाली एक प्यास भी
जंगल सब कुछ तो है पर विस्थापन कतई नहीं है
जंगल एक आवाज है
जो हमेशा कहती रहेगी
कि
तुम्हारा शहर एक लकड़बग्घा है
जो दरअसल जंगल से भाग निकला है !
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【 वीरु सोनकर】


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वीरू की कविताएं फेसबुक पर पढता रहा हूँ । इन कविताओं में एक कवि की ऊर्जा और रवानगी दिखाई देती है। कवि अपनी कविताओं के बिंम्ब और विषय अपने आसपास के वातावरण से अपनी सजग दृष्टि से लेता है और काव्य में उतारने की कोशिश इस भांति करता है कि पाठक तक सम्प्रेषण हो । 

आज प्रस्तुत कविता में कवि जंगल का बिंम्ब काव्य में पिरोकर  पाठक तक जंगल शब्द और प्रत्यय के वितान को इस भांति प्रेषित करना चाहता है कि पाठक तक जंगल और उसकी व्यवहारिक दुनिया में बने रिश्ते उभर सके ।


कविता जब शुरू होती है कि जंगल गायब नही है / वह देर से बोलता है ... तो पाठक मन में शब्द साहचर्य से संजीव का उपन्यास जंगल जहां शुरू होता है , अनुज लुगुन की कविता .. अल सुबह शुरू होता है दांडू का काफिला ,शहर की ओर  और एक कविता जिसके कवि का नाम याद नही आ रहा हंस में छपी थी  काफी पहले कि जंगल जहाँ खत्म होता है / दरअसल घर वही शुरू होता है ।

इन सभी शब्द साहचर्यो  में  जंगल को लेकर भिन्न आयाम सामने आते है । वीरू अपनी कविता में जंगल की उपस्थिति  को जीवन में महसूस कराना चाहते है । एक ऐसी मौजूदगी जो सतह पर पता ही नही चलती पर वो है और महसूस करने से चाक्षुष हो जाती है ।


जंगल के प्रत्यय में इस कविता में व्यक्ति का अंतर्मन भी शामिल है जो बाहरी दुनिया के आवरण के हटते ही ,मौन के सानिध्य में सामने खड़ा हो जाता है तो अपने अंशो के इस व्यवहारिक जगत में यत्र तत्र बिखरे होने से भी अपने होने को दर्शाता है ।

जंगल एक ऐसा वितान जहां कोई औपचारिक विधान हमारे और हमारी भावों के मध्य नही रह पाता ।वह किसी नाम रूप से नही बंधा पर फिर भी हमारे कई मनोभावों को अनचाहे ही नियंत्रित भी करता है ।  जैसे श्रीकांत वर्मा कहते है कि कितना ही बचना चाहो हस्तक्षेप से ... उसी तर्ज पर कवि कहता है जंगल कुछ भी हो ,किसी भी तरहसे हमे  प्रभावित करता हो पर  उससे कैसे भी बच नही सकते ,पलायन नही कर सकते.. क्योंकि वह विस्थापन नही है ।  और अंत में कवि स्पष्ट भी कर देता है क़ि दरअसल  मातृघर  से भागी हुई सभ्यता  का  इस व्यवहारिक दुनिया में तथाकथित विकास क्रम का क्रोड है ...जंगल । 

एक सुंदर कविता वीरू ने अपने पाठकों को दी है । जबकि  जंगल का जो बिंम्ब और प्रत्यय लिया  है वह काफी प्रसिद्द कविताओं और उपन्यास में लिया गया है । इस प्रचलित तथ्य के बावजूद भी कवि का शब्द विधान ,कहन की सहजता और बोधगम्यता के साथ अमूर्तन होने की रहस्यमयता को निभाने की सलाहियत कविता को विशिष्ट बनाती है । 

वीरू के काव्य कर्म के लिए शुभकामनायें!

सुरेन सिंह
सुरेन जी



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