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Monday, December 19, 2016

जिन्दगी १, २, ३ : जयकृष्ण मिश्र 'अमन'

जयकृष्ण मिश्र ''अमन'
आइये आज नवोत्पल के पुराने सदस्य जयकृष्ण मिश्र 'अमन' जी की कुछ कविताओं का आस्वादन करते हैं। जिन्दगी शीर्षक से कविता लिखना कम रिस्की नहीं है-मसलन, अनुभव जितने भी हो, पड़ेंगे कम ही, एक के अनुभव से दूसरे को कितना महसूस होगा, कहना मुश्किल, जो महसूसा वो इतना व्यक्तिगत कि प्रकटन के आप्रसंगिक होने का भी भी समानांतर भय, आदि-आदि। फिर भी जब एक युवा कवि जिन्दगी जैसी पुरजोर शै पर कुछ कहता है तो यकीनन उसने उन खट्टे-मीठे खट-पटों में से कुछ उम्दा बटोर लिया होगा...आइये निरखते हैं वह ही. (डॉ. श्रीश)










ज़िन्दगी - १

एक सादा कागज फैलाकर
मैंने उस पर लिख दिया
'जीवन'
इस प्रतीक्षा में
कि, वह 'तरल' हो बह पड़ेगा
'जल' जैसा ।
पर वह जम गया
'बर्फ' की तरह
'कठोर', 'चिकना', 'ठण्डा'.............

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ज़िन्दगी - २

 ज़िन्दगी की छेदही ओखली में
वक़्त के मूसल से
कूट रहा हूँ,
सपनों का
सूखा हुआ अमावट ।
इस उम्मीद में
कि शायद अब भी
निकल ही आये
थोड़ा सा रस.......

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ज़िन्दगी - ३


नई से नई भीत में भी
पड़ जाती है छिनकट,
उभर आते हैं
गड्ढे और फफोले ,
हल्की सी छुअन भी
उसे भुरभुरा कर देती है,
बुरादा-बुरादा
झरने लगता है।
यक़ीनन.........
वक़्त की तरह
ज़िन्दगी भी रेत है.....

------------------------------- "अमन"

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