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Thursday, November 24, 2016

#3# साप्ताहिक चयन : इंटरनेट और बरगद / *अजय कृष्ण

(डॉ. जयकृष्ण मिश्र 'अमन')
आज एक घुमावदार से समय में सच में एक मौजूं सा सवाल तैरता है ज़ेहन में, जो अक्सर पूंछा भी नहीं जा पाता-और वो ये कि-"कि क्या तुम्हारे पास मेरा परिप्रेक्ष्य है...!!!" यह एक परिप्रेक्ष्यों की लीपापोती का धुंधला काल है. लोग बाग़ अभी समाज सम्हालना सीख ही रहे थे कि इन्टरनेट की दुनिया ने खटपट पैदा कर दी, अब हर मायने के मायने बदलने से लगे और हम अपनी उपस्थिति की हनक तोलने की कशमकश जुट गए हों, जैसे...! अपने समय में हस्तक्षेप करते हुए कवियों में अजय कृष्ण एक प्रभावशाली कविकर्मी हैं. इनकी इस कविता पर नवोत्पल की साप्ताहिक टिप्पणी का योग कर रहे हैं, डॉ. जय कृष्ण मिश्र 'अमन', हिंदी साहित्य के समर्पित अध्येता एवं नीर क्षीर विवेकी रचनाकार भी हैं- डॉ. श्रीश


(अजय कृष्ण)

मध्य रात को
चुपचाप अँधकार में सरसराते हुए
इंटरनेट के एक मैसेज का
एक बरगद रास्ता रोककर खड़ा हो जाता है
और पूछता है
कि क्या तुम्हारे पास
मेरा परिप्रेक्ष्य है !

साइबेरिया से उड़ता हुआ हंसों का जोड़ा
रेगिस्तान की दहलीज़ पार करने से पहले
कई-कई रात मुझसे संवाद करता है
और पेट के अण्डों को महसूसता हुआ
सूरज के ताप को अन्दाज़ता है
पहाड़ों के जंगल से उतरकर
किंग-कोबरा का एक जोड़ा
मेरे कोटरों में घोंसला बनाता है
बच्चे जन कर, उन्हें बड़ा करता है
और फिर कई दिनों के बाद
बढि़याए सोन को पारकर
एक गाँव में लुप्त हो जाता है

ओ पैमेला एंडरसन की नग्न
नब्बे मेगाबाइट
तुम तो रोज़ मेरे सवालों को अनसुना कर
वित्त-सचिव के लैपटॉप पर
डाउनलोड होने को आतुर रहती हो
तुम्हेो नहीं मालूम
बूढ़ी गंडक का बढ़ा हुआ पानी
मेरी जड़ों तक आते-आते
थककर शान्त पड़ जाता है
और ध्वंस का पाठ भूल कर
मेढकों के बच्चों को सेता है
और उसी में एक
गरीब गरेडि़या का बेटा
बंसी डालकर
माँ और बाबा के साथ
मछली-भात का सपना
खर्राटे मार-मारकर देखता है.


['इन्टरनेट और बरगद' --- अजय कृष्ण जी की इस कविता को पढ़ते हुए, शब्द दर शब्द जब विचारों की परतें उधेड़ रहा हूँ, ठीक उसी समय मन के भीतर, स्मृतियों की ढेरों गैलरियों से गुजर रहा हूँ। स्मृतियाँ..... यादें नहीं। और जैसे- जैसे इन स्मृतियों के झरोखे से कहीं गहरे प्रवेश कर रहा हूँ, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर निश्छल भइया तक हजारों परछाइयाँ बारी- बारी कुछ कह रहीं हैं। ऐसे में इतने विचार उग रहे हैं , यदि उन्हें शब्द दूँ तो इस वर्चुअल स्पेस में उन विचारों के लिए ज़मीन कम पड़ जाये। दुःखद संयोग है कि, अनुभूतियों की इस यात्रा में उस व्यक्ति के रचना संसार से भी गुजर रहा हूँ, जो पिछले दिन भौतिक रूप में गुजर गए। इस कविता पर मेरी टिप्पणी इसी अनुभूति के रचनाकार विवेकी राय जी को मेरी श्रद्धांजलि भी है।

स्मृतियाँ........ यानि, वह सामाजिक-विचार-चेतना, जो हजारों वर्षों की मानसिक परम्परा में हमारी पीढ़ियों से हमें प्राप्त हुई हैं। कविता का प्रारम्भिक शब्द 'बरगद' उसी चेतना का प्रतीक है। रचनाकार ने बरगद को यूँ ही नहीं चुना। बरगद प्रतीक है उस मानवीय जिजीविषा का, जो हर कटाव के बाद भी हमें हमारी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ता है। उसने पीढ़ियाँ देखी है। उसने भगही पहन गलबहियां डाल अपने बैल को पुचकारते हुए किसान को भी देखा है तो, तथाकथित आधुनिक कल्याणकारी शासन के विशाल मशीनी संगठन में फसे मामूली इंसानी पुर्ज़े को भी। उसने विज्ञान के बढ़ते प्रभाव और परिणाम स्वरूप उत्पादन के साधनों के केन्द्रीभूत होने, पत्थरों और शीशे के चमकदार महानगरों के उगने तथा यांत्रिक सभ्यता के प्रभाव में होती हुई वृद्धि और धीरे-धीरे पदार्थिकृत होते मनुष्य को भी देखा है। उसने देखा है वैश्विक महायुद्धों और उनके बाद मटियामेट होती हुई सांस्कृतिक विरासतों को। उनके प्रभावों को और मूल्यों की उड़ती हुई धज्जियों को। उसने महसूसी है पीड़ा, स्वयं को अकेला, असहाय, अजनबी, संत्रस्त, जड़ों से कटा और टूटा हुआ अनुभव करने वाले मनुष्य की। उसने देखा मनुष्य को इस वास्तविक दुनिया पर अविश्वास कर, इससे अलगाव महसूस करते हुए, अपनी एक अलग कृत्रिम, आभासी, वर्चुअल दुनिया रचते हुए। उस दुनिया में खोये हुए, जहाँ सब कुछ है पर कुछ नहीं। उस इंसान को जिसे सुदूर हिमनदों में पिघलते हुए ग्लेशियरों और उसके टेम्परेचर की जानकारी तो है पर, अपने गाँव के किनारे की नदी कब उथली होकर सूख गई, इसका कुछ भी ज्ञान नहीं। जिसने विशालकाय पेड़ों को बोनसाई बनाकर अपने कमरे के छोटे से गमले में क़ैद कर दिया।

बरगद ने यह सब कुछ देखा-जाना है, तभी तो वह रात के सन्नाटे और स्याह अन्धेरे में चुपचाप खिसक कर आते इन्टरनेट के मैसेज का रास्ता रोककर पूछने का साहस करता है-"एक बरगद रास्ता रोककर खड़ा हो जाता हैऔर पूछता हैकि, क्या तुम्हारे पास मेरा परिप्रेक्ष्य है" इस बरगद की शाखाओं में ढेरों गाँठे हैं, पर हर गाँठ से निकलने वाली जड़ों ने इस आभासी दुनिया के बावजूद उन सभी स्मृतियों को सहेज रखा है। स्मृतियों के समयबोध के जाल से छूटकर हर बार जाने कितने क्षण गिर पड़ते हैं। 'हंसों के जोड़े से संवाद, मेढकों के बच्चों की चिन्ता, गड़ेरिये की गिरी हुई वंसी' आदि उन्हीं क्षणों को पकड़ने और बाँधने की चेष्टा है। कवि की पुरजोर कोशिश है कि, बरगद की छाँव में बैठ, उसकी जड़ों से रस्सी बना, इन स्मृतियों की लड़ी बना पाये। क्योंकि उन्हीं के भरोसे तो-"गड़ेरिये का बेटामछली-भात का सपनाखर्राटे मारकर देखता है।"-डॉ. जयकृष्ण मिश्र 'अमन']

Thursday, November 17, 2016

#2# साप्ताहिक चयन: स्मार्ट फोन की तितलियों में तितलियों से भी ज्यादा रंग हैं/ *दर्पण'

दर्पण शाह 'दर्शन'
एक तरफ अक्षरों से अठखेलियां करता युवा कवि: दर्पण शाह, जो साहित्य शिल्प के बंधनों को बुनते हैं, समझते हैं और बहुधा उनसे खेल जाते हैं: एक उन्मुक्त चितेरा----शब्द दर शब्द मन के परत दर परत पर दखल ; वहीं डॉ. गौरव कबीर सरकारी पशोपेश और जिम्मेदारियों के बीच बसता एक साहित्यिक रसिक ! इस बार #साप्ताहिककविताचयन में आइये पढ़ते हैं दर्पण शाह 'दर्शन' की कविता और उसपर विशिष्ट टिप्पणी की है गौरव कबीर जी ने ! -डॉ. श्रीश




"चूक गया हूँ
बहुत बड़े मार्जिन से
(Source: Google Image)

मैंने कोई ऐसी स्त्री तो नहीं देखी
जिसे दिल तोड़ने की मशीन कहा जाता है
मगर मैं जानता हूँ एक ऐसे शख्स को
जिसे आप उम्मीद तोड़ने की मशीन कह सकते हैं
जो घमंडी है, सेल्फ - ओब्सेस्ड है
हारा हुआ है (अनंत बार)
कुंठित है अस्तु
कितना सब कुछ है सोच में,
मग़र सब रिपीटेटिव
और अगर कुछ नया है भी
तो एक बिज़नेस प्लान
"अतीत में लिखे गए को एक रुपया प्रति शब्द कैसे बेचा जाय?"
अगर आज मैं स्त्री की बात करूँ तो वो रुग्ण होगी
अगर आज मैं चिड़ियाँ की बात करूँ तो उसके पंख मटमैले होंगे
अगर आज मैं गाँव की बात करूँ तो उस तक सड़क नहीं पहुंची होगी
अगर आज मैं क्रान्ति की बात करूँ तो वो जुटाए गए तथ्य और कोरी साख्यिकी होगी.
अगर आज मैं रात की बात करूँ तो वो चोर उचक्के, रेव पार्टीज़, हनी सिंह और माइग्रेन की बात होगी
शाम का मतलब मेरे लिए नेशनल हाइवे एट का जाम होगा
सुबह एक हैंगओवर होगी
दिन होगा हज़ारों स्ट्रगल और टारगेट एडहियरऐंस से लबरेज़
सरोकारों में ऍन. जी. ओ., चेरिटेबल म्यूज़िक नाईट्स, पेज थ्री और डोनेशन्स होंगे
इनमें से कुछ भी कविता नहीं
स्मार्ट फोन की तितली में तितलियों से ज़्यादा रंग हैं
ऍन. एस. डी. के नाटकों में संवेदनाओं से ज़्यादा आंसू हैं
फ़ेसबुक के स्टेटसों में सरोकारों से ज़्यादा विचार हैं
बारिशों में भीगने से ज़्यादा जतन हैं
पहाड़ों में घूमने से ज़्यादा डर
जब आपको अपनी नींद सबसे प्यारी लगे
समझ जाइए, वास्तविकता कुरूप हो चुकी है
जब आपको अतीत में रहना रुचिकर लगे
जान जाइए अपने वर्तमान की अप्रासंगिकता
जब आपको किसी की छोटी से छोटी सफलता से कोफ़्त होती हो
निश्चित है कि आप बुरी तरह से असफल हो चुके हैं
ख़ुशी की परिभाषा अब इतनी है बस कि
शरीर कही भी नहीं दुःख रहा
ये भी तो कई दिनों में एक बार नसीब होती है
मुझे मृत्यु से भी ज़्यादा डर परहेज़ से लगता है
चश्मा लग जाएगा कल
परसों हियरिंग एड्स
उसके अलगे दिन शायद हार्ट ट्रांसप्लांट हो
चाहे मैं अपनी मर्ज़ी से ताउम्र न खाऊँ भिन्डी
लेकिन वो नरक होगा मेरे लिए
अगर मेरी प्लेट से हटा दी जाय वो आज के बाद से
ताउम्र के लिए
न जाने कौनसी सिगरेट अंतिम हो
न जाने कौनसी सांस
आई. सी. यू. के बाहर ली गयी
अंतिम सांस हो
क्या पता किसी दिन उठूँ और
और
इस वजह से सोये रहना चाहता हूँ
इस वजह से अत्तीत में खोया रहना चाहता हूँ..!"




[ दर्पण शाह , गंभीर अलबेलेपन के कवि हैं; और यकीन मानिये जब जब आप उनकी कविताओं से रूबरू होते हैं वो आप को कभी निराश भी नहीं होने देते । *स्मार्ट फोन की तितलियों में तितलियों से भी ज्यादा रंग हैं* एक ऐसी ही कविता है

यह कविता बन सके रिश्तों के टूट जाने के भय को जाहिर करती है , ये एक हारे हुए इंसान के अतीत में ही रह जाने की इच्छा को दर्शाती है,और यहीं पर इसका जुड़ाव 1980 के बाद जन्मे युवा से हो जाता है , एक ऐसे युवा वर्ग से जो वर्तमान समय की सिर्फ वास्तविक बल्कि आभासी चुनौतियों से भी रोज़ जूझ रहा है आरम्भ से ही कविता हताशा और निराशा का एक ऐसा कॉकटेल प्रस्तुत करती है कि जिस में डूबा हुआ शख्स कभी बाहर भी आएगा , इसकी छटाँक भर भी गुंजाईश नहीं दिखती गुस्से और खीज से उपजी एक ऐसी स्थिति का बोध जहाँ से वापस लौटना असंभव है ।कविता अंत में हमें मृत्यु का मतलब समझाती है :

मृत्यु का अर्थ जीवन के साथ साथ हर तरह के संघर्ष का भी अंत। धीरे-धीरे क्रमशः ह्रास की जगह मृत्यु ही भली। एक एक अंग और एक एक शौक का मरना ही दु: है। अतः यूँ तिल तिल मरने से बेहतर तो एक हसीन मौत को गले लगाना है

कविता की इन पंक्तियों में तो यथार्थ अपनी पूरी कसावट के साथ उभरता है:



“बारिशों में भीगने से ज़्यादा जतन हैं

पहाड़ों में घूमने से ज़्यादा डर

जब आपको अपनी नींद सबसे प्यारी लगे

समझ जाइए, वास्तविकता कुरूप हो चुकी है
जब आपको अतीत में रहना रुचिकर लगे
जान जाइए अपने वर्तमान की अप्रासंगिकता
जब आपको किसी की छोटी से छोटी सफलता से कोफ़्त होती हो
निश्चित है कि आप बुरी तरह से असफल हो चुके हैं ।”

कविता के मध्य में इसकी कसावट बहुत बेहतरीन है और अगर कोई कविता हिस्सों में भी बांटी जा सकती, तो कविता का यह हिस्सा ही मुझे सबसे ज्यादा पसंद होता कविता में दी गयी उपमाएं और उनका प्रयोग बहुत अनोखा है दर्पण गहरा लिखते है, शायद इतना गहरा कि उनकी लिखी पंक्तियां जितनी बार पढ़ी जाये उतने ही अर्थ प्रकट करती है , पर पिछली बार पढ़ने में जो अर्थ आपने समझा होगा वो अर्थ भी कायम रहता है हर बार एक नया आयाम जुटता है संभव है, अर्थ के अन्य कई वितान और भी बनें जबकि इसका पुनः पुनः आस्वादन किया जाय ।

                                                    
                                                                 (डॉ. गौरव कबीर )