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Thursday, February 16, 2017

#15# साप्ताहिक विशिष्ट चयन: और मेरी नींद टूट गई.../ 'श्याम जुनेजा '

श्याम जुनेजा जी 
आज नवोत्पल साप्ताहिक चयन शृंखला की १५वीं कड़ी है। अतः इसे विशिष्ट चयन के रूप में नवोत्पल परिवार सहेजना चाहता है।  इस अवसर पर नवोत्पल के पुराने साथी आदरणीय श्याम जी की कविता 'और मेरी नींद टूट गयी ' प्रस्तुत कर हम गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। 

          बुझते-बुझते आग अगर एक चिंगारी हवा में लहरा दे ना तो उस चिंगारी को भी कमजोर नही सोचना चाहिए..!  जब हद हो जाती है तो इंसान कुछ भी बनने को तैयार होता है. कुछ लोग जो हाशिये पर जी-जी कर मरने लगते हैं ...तो उसी क्षण उनके अन्दर एक लावा प्रकट होता है..फूटने को आतुर..सबकुछ बदलने को छटपटाता है..वे कुछ लोग बाकी सारे भेद-भाव स्थगित कर एक हो जाते हैं..उनके मुंह से एक ही भाप आती है..परिवर्तन और परिवर्तन  के सिवा और कोई विचार उन्हें कौड़ी का लगता है...उन्हें कुछ साबित नही करना होता..वे बस अपने पाँव तले जमीन की चाह रखते हैं...फिर चाहे उन्हें अनगिन पांवों तले कुचला जाय ...उनकी पीठ चौड़ी होती जाती है..लाल हो जाती है पर दबती-मुड़ती नही...! वे कुछ लोग अगर समय के प्रलोभन में नही उलझे तो फिर एक केसरिया सुबह होती है..जिसमें सबकुछ बदला-बदला होता है...और फिर लोग कहते हैं..क्रांति हो गयी.. ..! पर देखो यहाँ कवि की नींद टूट गयी है...वह जागता है तो पाता है उसके आस-पास तो लोग अब भी सोये हुए हैं...अंतिम चिंगारी भी कहीं मुरझा कर हवाओं में विलीन ना हो जाए..कवि की चिंता है ये..! 

         श्याम जी, क्षण-क्षण के कवि हैं. हर कविता में कुछ और नए प्रश्न करते रहते हैं..उनका उत्तर मिल  जाये तो ठीक ना मिले तो भी ठीक पर हाँ..कविकर्म के आदर्शों के अनुरूप "प्रश्न" आते रहने चाहिए..आदरणीय श्याम जी इस कर्म में कभी चुके हों..ऐसा लगा नही कभी...साक्षी नवोत्पल पर आती इनकी निरंतर कविताएँ हैं...! 

श्याम जी की यह कविता मुझे उस ख़ास बिगुल की तरह लगी..जिसकी पुकार पर रगों में लाली उतर जाती है..पढ़ते समय मेरे कान लाल हो गये..सहा नही गया..रहा नही गया..आइये इस ताप को साझा करते हैं. 

                                                                                                                     -श्रीश पाठक 'प्रखर'  



(चित्र साभार : गूगल इमेज : लौरी पेस की एक पेंटिंग-रिवोल्यूशन)
कुछ सपने मैं देखता हूँ नींद में
कुछ जागी हुई आँखों के ख्वाब हैं
कुछ दिख जाते हैं राह चलते
चले आते हैं कुछ तुम्हें देख कर
पर अब इन्हें एक तरतीब चाहिए
यह जानते हुए भी कि
सपनों को तरतीब नहीं दी जा सकती
मैं कोशिश जरूर करूँगा !

कल रात मैंने देखा 

हमउम्र जवां लड़के-लड़कियों की
एक बड़ी भीड़
शहर के नामी पांचतारा पर
कब्ज़ा किये बैठी है
मेनेजर, स्टाफ
यहाँ तक की बैरे भी हक्के-बक्के परेशान

उस हजूम ने अपने हमउम्रों को छांटा
 
बाकियों को यह कहते हुए विदा किया. .
जाओ तुम भी ढूंढो अपने अपने हमउम्र
और जल्दी से जाकर कहीं कब्ज़ा करो

क्यों भाई ! 

आखिर, यह माजरा क्या है ?

कहने लगे --
 
लाखों के पास छत नहीं ..
दो जून खाने का प्रबंध नहीं ...
और यहाँ होटल पड़े रहेंगे खाली ..
कभी-कभार
किसी आँख के अंधे
गाँठ के पूरे की अगवानी में ...
नहीं ! यह सब नहीं चलेगा ...

इतने मंदिर.. मस्जिदें.. गुरूद्वारे..चर्च..
 
कितने-कितने आश्रम.. मठ
और भी न जाने कितना कुछ
सरकारी, गैर-सरकारी
पड़ा है बेकार.. बिना मतलब के
नहीं ! ये सब नहीं चलेगा !

क्या मतलब 

गिनती के लोग सब घेरे बैठे हैं . .
करोड़ों के पास कुछ भी नहीं ?
ये सब नहीं चलने का अब
हम हैं असली मालिक हम !
और हम आ रहे हैं ...

पर भाई ! 

तुम लोग हो कौन ?
तुम्हारा आपस में रिश्ता क्या है ?
खुले आम लडके-लड़कियां
इन बागी तेवरों के साथ
कोई शर्मो हया है या नहीं ?
कहाँ से आये हो ?
कुछ तो साफ करो !

हम ! 

हमें नहीं पहचानते !
आने वाले समय को नहीं पहचान रहे
कितने अफ़सोस की बात है !
तो सुनो !
इन इमारतों की नीव हो चुकी है जर्जर ..
किसी भी समय हो सकती हैं धराशायी ...
इन्ही के मलबे से हमें खड़ा करना है बहुत कुछ ..
नए सिरे से ..अपने लिए.. अपने ढंग से ..
जहाँ तुम्हारे गुलामी पसंद ख्यालात का प्रवेश
वर्जित होगा हमेशा के लिए ...

यहाँ 

अर्थ-हीन समर्थों की ऐशगाहें नहीं
जरूरतमंदों की छतें होंगी ...

पक्की दोस्ती के सिवा
 
हममें कोई रिश्ता नहीं ...
जीवन के सिवा
कोई दीन नहीं.. धर्म भी नहीं..
स्त्रियाँ हमारे यहाँ
पाँव की जूती नहीं हैं
बच्चे हमारे
हम सबकी जिम्मेदारी हैं..

हमारे पास अपना कुछ भी नहीं 

जो कुछ भी है सबका है..
यहाँ कोई किसी का स्वामी नहीं
न ही कोई किसी की चरनदासी है...
तुम कोई अनुशासन हम पर नहीं लाद पाओगे
हम अपना अनुशासन स्वयं हैं..

अरे भाई !
 
यह क्या धांधली है ?
नियम-धरम-नैतिकता
कानून-व्यवस्था भी तो कोई चीज़ है..
यूं ही कैसे...?

धांधली !! 

तो होती रही है आज तक ..
सदियों से सदियों तक
पीढ़ी दर पीढ़ी ..
अब नहीं होने देंगे ..

कानून वाले ही तो हैं 

सबसे बड़े चोर...
नियम-धर्म वालों ने ही तो
रच रखे हैं इतने पाखंड
हमें मत पढाओ इनके पाठ !

तुम !
 
जो बूढों से मंगवाते हो भीख !
बेरोजगारों का उड़ाते हो मजाक !
देश धर्म दीनो मजहब के नाम पर
बच्चों को कसाइयों के हवाले कर देते हो !
तुम !
जो औरत को ऐयाशी की चीज़ और
पाँव की जूती समझते हो
तुम !
जिन्होनें युद्ध और बुद्ध दोनों को
व्यापार बना रखा है
हर किसी से
छीन रखा है जीने का हक
तुम !
जो आदमी को आदमी तक नहीं समझते
अहंकार की आग में जलने वाली लकडियो
तुम सिखाओगे हमें नियम धर्म !!
नैतिकता कानून और व्यवस्था?
जाओ
पहले मुह धोकर आओ किसी नाली में...

और मेरी नींद टूट गई..





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