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Tuesday, February 21, 2017

#१# विश्वविद्यालय के दिन: श्रीश पाठक 'प्रखर '



ज़िंदगी का एक थपेड़ा अभी ताज़ा ही लगा था और बारहवीं के परिणाम आने को थे. तय इतना हो गया था कि आगे की पढाई कहीं पास में की जाए और ऐसी की जाए कि घर सम्हालना मुश्किल ना हो. आज समझता हूँ बी.ए. की बारीकियां पर लोगों को लगता था इसे करना आसान है, फेल होने का डर ही नहीं. आस-पास की पढाई के लिए सबसे प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान था : दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय...! डिग्री कालेज तो कई थे, पर बताया गया कि इनवस्टी (यूनिवर्सिटी की सही स्पेलिंग सभी को पता थी, पर जनता इसे इनवस्टी ही पुकारती थी) की पढाई की बात कुछ और ही थी. उन दिनों यू. पी. बोर्ड नित नए प्रयोग कर रहा था. अचानक हाईस्कूल से प्रैक्टिकल हटा देना, सामाजिक विज्ञान के बड़े से सिलेबस को एक मोटी सी किताब में रख देना, आदि-आदि-अनेक..! तो बोर्ड की कृपा से संजाया-संवारा जो बचपन का आत्मविश्वास था, वो फ़िलहाल कहीं गुम हो गया था. इनवस्टी की प्रवेश परीक्षा निकलेगी या नहीं, देखने वाली बात थी. पापाजी की गुरुवाक्य इस पर आ चुका था: 'पता चल जाई एही एक्जामे में थाह....'

 अथाह ही लग रहा था पहली नज़र में विश्वविद्यालय. गर ईमानदारी से दर्ज करूँ तो उस वक़्त तो सोच रहा था कि रोज मुख्य द्वार से कला संकाय इतनी दूर  कक्षाएं करने कैसे जाऊँगा. जहां देखो वहीँ लोग, इतने लोग, इतनी बातें, आवाजें इतनी । उल्लास ही उल्लास । पापाजी की कोई तबादले वाली नौकरी तो थी नहीं या फिर पापाजी को घुमने फिरने का जाने क्यूं शौक भी न था, तो दुनिया सुनी ज्यादा थी, देख नहीं पाया था कुछ । जब सब उम्मीद कर रहे थे हाईस्कूल में मेरिट में आएगा लड़का तो फर्स्ट डिविजन भी नसीब नहीं हुआ और जब बी.ए. के आवेदन पत्र भरे जा रहे थे और इंटर का रिजल्ट आया तो मै भी हतप्रभ कि कैसे मैथ से फर्स्ट डिविजन आ गया? विधना का पहला पाठ समझ आया था कि -"कहीं की मेहनत कहीं काम आती है.." दूसरा पाठ ये कि- "मेहनत का सीधा सम्बन्ध सफलता से नहीं होता, इस फार्मूले में कुछ और वैरिएबल्स होते हैं..." ये कुछ और वैरिएबल्स ज़िंदगी में आगे एक्सप्लोर होने थे । खैर तो उल्लास मन से आया विश्वविद्यालय में । कक्षाओं के पंजीकरण भी कराने होते हैं..., पढ़ने के कई स्लॉट चुने जा सकते थे,..आदि-आदि ....; ये सब चीजें जादुई लग रही थीं और मन कहता था झूम झूम के -"....ऐसे ही थोड़े इसे इनवस्टी कहते हैं "  

इतिहास जितना ही प्राचीन हो उसमे रूचि उतनी ही होती है । मन में सहज जिज्ञासा थी कि जाना जाए कि प्राचीन भारत में क्या थी अपनी कहानी । प्राचीन विश्व कैसा था, सोचा मन में एक तस्वीर तो बनेगी ही, सो बी. ए. में एक विषय लिया 'प्राचीन इतिहास' राजनीति आकर्षित करती थी, जाने क्यूं शुरू से । मुझे लगा राजनीति का ककहरा, इसके विज्ञान से परिचित रहूँगा तो ठीक रहेगा । दूसरे विषय के तौर पर 'राजनीति शास्त्र' लिया । मन में बड़ी चाह थी कि छम छम इंग्लिश बोलूं तो तीसरा विषय लिया -अंग्रेजी साहित्य । ये बिलकुल ही कच्ची सोच से किया गया चयन था । यह तब स्पष्ट हुआ जब अतीत की कहानी से रूबरू होने की अपनी ख्वाहिश प्राचीन इतिहास के पहले ही अध्याय काल-विभाजन के ऊबाऊ विश्लेषण से झुलस गयी । तो ये कहानी का विषय नहीं था । राजनीति शास्त्र की परिभाषाएं ही इतनी तरह की सामने आयीं कि मन छटपटाने लगा । पांच सौ साल पहले की इंग्लिश में और आज की इंग्लिश में बहुत अंतर है, ये बात समझ आयी और सिलेबस के हिसाब से हमें पुरानी इंग्लिश पढनी थी. टेक्स्ट से इतर पैराफ्रेज से भी पढना था-तो अब अंग्रेजी बोलने की सोचना तो दूर की कौड़ी हो गयी । इस जनम में तो अब इंग्लिश की छम छम नसीब नहीं ही होनी थी । पापाजी वकील हैं तो उनके पास भांति भांति (कहना तो मै 'अजीब-अजीब' चाहता हूँ) के मौकिल (मुवक्किल होता है, जानता हूँ, पर जाने क्यूं कोई नहीं बोलता था) आते थे । 'अच्छा....इहे आपका बड़का बाऊ हों? अच्छा अच्छा ...बी. ए. करत हवे, काहें साइंस नाइ चल पाइस का...? अच्छा.....का बिसैय लेल हवे......? अच्छा चला -अंगरेजी त लेल हवे कम से कम ..ठीक बा.....कुल सास्त्र सास्त्र रहत त गड़बड़ रहल............!'


(क्रमशः)



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