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Saturday, February 25, 2017

धीमी मौत...ई. एस. डी. ओझा


Er S D Ojha
3 hrs



आप एक धीमी मौत मरने लगते हैं.
पाकिस्तान में गुजराती भाषा धीमी मौत मरने लगी है. बोलने वाले लोग तो कम हो हीं रहे हैं ,उससे ज्यादा लिखने वाले विलुप्त हो रहे हैं. पूरे विश्व में 50 मिलियन लोगों की भाषा आज पाकिस्तान में दम तोड़ने के कगार पर है . कभी कायदे आजम की मातृभाषा रही गुजराती मातृभाषा कॉलम से हटा दी गयी है.पाक की डाटाबेस व पंजीकरण प्राधिकरण के आवेदन पत्रों से गुजराती अपना वजूद खो चुकी है . पूरे विश्व में ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में गुजराती 26 वें पायदान पर है,पर पाकिस्तान की नई पीढ़ी इसे बोलने व लिखने से गुरेज करने लगी है . पाक सरकार ने भी गुजराती को धीमी मौत मरने के लिए अपने हाल पर छोड़ रखा है .

धीमी मौत की सजा कभी मलयेशिया में अक्सर दी जाती थी. इस मौत की सजा पाए अपराधी को एक संदूक में भरकर किसी निर्जन इलाके में छोड़ दिया जाता था.उस संदूक में मात्र एक छेद होता था ,जिससे सजायाफ्ता व्यक्ति आते जाते लोगों से भोजन पानी ग्रहण करता था . फ्रांस के धनाढ्य व्यापारी व प्रसिद्ध फोटोग्राफर अलबर्ट कान्ह सन् 1913 में आस्ट्रेलिया गये थे . उन्होंने वहां एक औरत को इस तरह की सजा पाते हुए देखा था . चाहकर भी उस महिला की वे कोई मदद नहीं कर पाये . उन पर मलयेशिया का कानून तोड़ने का आरोप लग जाता .

अल्बर्ट कान्ह ने महिला की फोटो ली और फ्रांस लौट आये .जब इस महिला की फोटो अखबार व पत्रिकाओं में छपी तो पूरे विश्व को पता चला कि इस तरह की अमानवीय व क्रूर सजा दी भी दी जा सकती है . तिल तिल मरने की सजा . वह महिला उस तंग संदूक में रहकर अकेलेपन व अन्य शारीरिक तकलीफों का दंश झेलते हुए मरी होगी . यह क्रूरता की चरम प्रकाष्ठा थी .

दुनियां में अकेला रहना भी धीमी मौत मरना है .अकेले रहना उतना हीं खतरनाक है ,जितना कि मोटापा और धूम्रपान है. अकेलेपन से आपको हार्ट अटैक का खतरा तीन गुना ज्यादा हो जाता है . ब्लड प्रेशर ,शूगर व अन्यान्य बिमारियां घर कर लेती हैं . आदमी जितना हीं एडवांस और नाना प्रकार की सुविधाओं से युक्त होता चला जाता है .उतना हीं वह अकेला होता चला जाता है. भले हीं आप फेसबुक पर घंटों काम करते रहें ,दोस्तों से चैट करते रहें ; पर परिवार में विखराव है ,भावनात्मक तादात्मय नहीं है ,परिवार से सम्वाद न के बराबर है तो आप अकेलेपन के शिकार हैं . हम फुटपाथ पर रहने वालों की केवल गरीबी देखते हैं ,हम उनके चेहरों की हंसी नहीं देख पाते हैं . हमें उनके मुस्कुराते चेहरों पर परिवार के एकात्मकता की छाप नजर नहीं आती है। 

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