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Wednesday, February 22, 2017

लुगदी साहित्य बनाम श्रेष्ठ साहित्य: अनुराग आर्या


#StatusOfStatus 

मैं चेतन भगत को नहीं पढता और बहुत सारे लोगो को नहीं पढता जो बेस्ट सेलर है पर उसे खरीद कर पढ़ने वाले लोगो के मुताल्लिक मैं सार्वजनिक राय नहीं बनाता ,ना मुझे ऐसा करने का अधिकार है । मैं उन्हें कोई बुक रिकमेंड सकता हूँ किसी बुक के बारे में बता सकता हूँ। हो सकता है मेरी रिकमेंड बुक उसे पसंद ना आये 
पसंद एक सब्जेक्टिव फिनोमिना है !
पसंद कभी लादी नहीं जा सकती।
एक जर्नी होती है ।
एक यात्रा ।
जो लेखक भी तय करता है पाठक भी।
दोनों मैच्योर होते है
दोनों का जायका बदलता है ।

हाँ पढ़ने का ,सुनने का, हर अदब का एक जायका होता है । हर लिखने वाले की एक कैफियत होती है ,एक समझ ! अपने अनुभवो से उत्पन्न समझ को सम्प्रेषण देना यही लेखन है। एक लेखक जीवन में समान्तर चल रहे उन दृश्यों को आपके सामने रखता है जिन्हें ठहर कर आपने देखा नहीं ,"मन्त्र " आपके साथ जीवन भर चलती है और "हामिद का चिमटा" भी. यशपाल का पर्दा आपको ताउम्र याद रहता है ।ऐसा लेखन जो पाठक की दृष्टि को उसकी संवेदना को "रिच " करता है उसे सम्रद्ध करता है।
रूह को पकड़ कर झझोर देता है । हर समाज इस लिए अपने अपने नायक बनाता है । राम ,हनुमान ,बैटमैन ,सुपरमैन ऐसे ही नायक है। लोककथाएं टेक्नोलॉजी विहीन समाज की जरुरत थी एक बड़े समाज को एक सूत्र में बांधती कथाये । बच्चों के फेंटेसी संसार को पोषित करते नायक की कथाये जो सामाजिक अनुशासन के साथ एक पॉजिटिव मेसेज बच्चो में कन्वे करे । उन्हें भी किसी ने रचा ही था इस तरह से ताकी वे जन मानस तक पहुंचे । आसान होकर टेक्नोलॉजी के बाद पश्चिमी समाज ने अपने नायकों में समय के साथ परिवर्तन किया उन्हें मोडिफाइड किया ।उम्र के एक पड़ाव में वे हमारे साथ रहे । हर लिखने वाले की तरह पढ़ने वाले कैफियत भी अलग होती है। क्लास का हर बच्चा लिटरेचर एन्जॉय नहीं करता ,कुछ को खेल पसंद होता है , कुछ को गिटार किसी का गला अच्छा होता है और कोई कुछ भी नहीं होता पर आदमी अच्छा होता है। समाज में सबकी उपयोगिता होती है। समाज ऐसे ही कई वेरिएशन का जोड़ होता है। हर लेखक का बच्चा लेखक नहीं बनता ।
ये एक भीतर से उपजा गुण है।

रेणू मनोहर श्याम जोशी नहीं हो सकते ,जोशी यशपाल नहीं ,यशपाल भीष्म साहनी नहीं और भीष्म साहनी मोहन राकेश नहीं !
कोई सिर्फ शिवानी ही पढता है उसे रेलिश करता है उसे महादेवी वर्मा अट्रेक्ट नहीं करती। उससे ना महादेवी वर्मा का कद घटता ना शिवानी तुच्छ हो जाती। 

किसी को जगजीत पसंद है किसी को ग़ुलाम अली ,कोई मेहँदी हसन को पसंद करता है।
उससे तलत अज़ीज़ या पंकज उदास ख़ारिज नहीं होते। उनको सुनने वाले लोग है
माज़िद मजीदी की फिल्म हर कोई नहीं देखता ,ना कुरुसावा की ,सत्यजीत राय या श्याम बेनेगल को कई लोग बोर मानते है तो क्या उससे श्याम बेनेगल खारिज हो जाते है ?मैंने श्याम बेनेगल को कभी लोकप्रिय सिनेमा का उपहास उड़ाते नहीं देखा । हर समय और समाज को राज कपूर भी चाहिए ,गुरुदत्त भी ,बिमल रॉय भी ,ऋषिकेश मुखर्जी भी, गोविन्द निहलानी भी चाहिए,यश चोपड़ा भी,डेविड धवन भी ।

एक समय काल में सबके लिए स्पेस रहता है एक बच्चा जब राजन इकबाल पढ़ रहा होता है दूसरा गोर्की ।
इसके कुछ कारण भी होते है और कभी कभी चीज़े बेवजह होती है । पूरा समाज एक जैसा ग्रो नहीं होता ,हो भी नहीं सकता चाहे कितना ही विकसित समाज हो ।

टेस्ट मैच का प्लेयर रणजी वाले को कहे उसे क्रिकेट नहीं कहते जो तुम खेल रहे हो। अच्छा नहीं लगेगा ना ।
किसी भी चीज़ का अभिमान गलत है, वह आपकी उपलब्धि को आपके अर्जित ज्ञान को व्यर्थ कर देता है !
मुझे याद है टी 20 वर्ल्ड कप जीतकर वेस्ट इंडीज़ के मर्लिन सेम्यूल्स ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में पैर जूतों सहित ऊपर टेबल पर रखकर बात की थी !उसके अभिमान ने उसे छोटा कर दिया था। 

किताबे हमारी संवेदना के विस्तार के लिए है ,हमें और अधिक बेहतर मनुष्य बनाने के लिए। श्रेष्ठता के साथ विनम्रता भी जरूरी है । याद रखिए क्लासिकल के साथ जैज म्यूज़िक भी स्पेस है।
#लुगदी साहित्य बनाम श्रेष्ठ साहित्य

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