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Tuesday, March 14, 2017

"सदा आनन्द रहै एही द्वारे"- (2) डॉ. जयकृष्ण मिश्र 'अमन '

होलिका
अगले दिन बड़े सुबह हम सम्मत वाली जगह पर जाते, एक सुलगता हुआ कण्डा लाने। पुराने जमाने में इस सुलगती हुई आग को साल भर ज़िन्दा रखा जाता और उसी से चूल्हे की आग जलाई जाती। सुलगते कण्डे की राख पूरे घर में छिड़की जाती। लगता... जैसे सब पवित्तर हो गया।

रसोई की तो न पूछो। एक दिन पहले से ही पकवानों की खुश्बू हवा में तैरने लगती। बाबा को किसी दुसरे पर भरोसा नहीं होता। वे ख़ुद अपने हाथ से चाचा के ससुरारी से विदाई में मिली मुर्रा भैंस का दूध दुहते और अपने सामने औटवाते। फ़िर उस खोवे में ढेर सारे मेवे, चीनी और थोड़ी सी सूज़ी मिलाई जाती और मस्त गुझिये बनते। पिताजी को गुड़ और सोंठ के गुझिये अच्छे लगते, जो अम्मा बनाती। फगुआ वाले दिन खीर, पूरी, दालपूरी, तरी वाली मसालेदार सब्जी, गुलगुले (मालपुआ) और जाने क्या-क्या पकता। हम बच्चों की तो छोड़ो, सबसे ज़्यादा खुश तो चउधरिया और झँकरिया होते। हल-बैल, गाय-भैंस, ओसारा-दुआर और सानी-पानी की जिम्मेवारी इन्हीं की होती। इन्हें तो हर तिउहार का अगोरा होता। नाऊ, कंहार, धोबिन, कोहाइन... सब गठरी बाँध के ले जाते।

खा-पी चुकने तक हल्ला बढ़ चुका होता था। गाँव भर के बूढ़े-जवान, लौण्डे-लफाड़ी हमारे दरवाजे पर इकट्ठे हो चुके होते। सतीश, जयपरकास के हाथ में मजीरा तो बिनोद चाचा गले में ढोलक लटकाये भड़भड़ा रहे होते। हुड़दंग शुरू। किसी का चेहरा पहचाने नहीं आता। मैं, भइया, पिताजी, चाचा और बाबा भी इस टोली में शामिल हो लेते। दुआरे-दुआरे घूम कर "सदा आनन्द" गाने के लिए अब टोली कूँच करने को तैयार और इसकी शुरुआत हमारे दुआरे से।

होरियारे गा रहे हैं। जिसके हाथ में ढोल- मंजीरा, जो भी है; बजा रहा है। बकिया लोग पीछे-पीछे चोंकरते हुए थपोड़ी(ताली) पीट रहे हैं। आवे चाहे न आवे पर सब मुँह चला रहे हैं-

"सदा आनन्द रहै एहि द्वारे

मोहन खेलें फ़ाग रे

पाने क बिरवा गोपिय मारे

लौंग न मारे कान्ह रे

सूर सगोपिय मारत आवै

कान्ह अकेला का करे

हाँ हाँ मोरे ललना

लौंग न मारे कान्ह रे..."



लेकिन फगुआ है भाई, अधियरा बाबा का दुआर है। इहाँ इत्ते से काम नहीं चलेगा। नारद चचा बाबा को ढेलते- "अधियरा चाचा...एक ठो त.."। बाबा सहती कचेर की ओर देखते। दरअसल बाबा और सहती संगे कै पढ़वइया। सहती भले छोटी जात के थे, लेकिन तब के हाईस्कूल और रमलोइहा (रेलवे) खलासी से रिटायर। इज़्ज़त खूब थी। बाबा और सहती की जोड़ी जब गाने बैठ जाती तो बस घण्टों सुनते रहो। गला भी दोनों ने खूब पाया था। आँखों-आँखों में इशारे होते और ढोल-हरमुनिया (हारमोनियम) इन दोनों के हवाले। फ़िर तो--

" मोसों खेलन होरी, अइहो बनवारी"


चाचा भी बाबा के बगल में बैठ के मुँह डोलाते रहते, जैसे की कुल्ही फगुआ इनको जबानी याद हो। हम लोग मुस्कुराते तो वो ताली पीटते हुए धीरे से आँख दबा देते। औरतें घर के भीतर से बाल्टी पर बाल्टी रंग फेंकती रहतीं। होरियारे तर-बतर हुए जा रहे हैं। मुँह बानर हुआ है। किसी के मुँह पर लाल, तो किसी के हरा या काला। कइयों के मुँह पर तो वार्निश पुता होता। (भाई, गाँव की एक बड़ी आबादी रेलवे कारखाने में काम करती थी, तो वार्निश तो...)

(प्रथम भाग )

(आखिरी भाग )
  *जय कृष्ण मिश्र 'अमन'

                                                                                                                  








                                                                                                                                                                                                                                

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