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Thursday, March 30, 2017

#21# साप्ताहिक चयन: भगवान के भी भगवान / *प्रज्ञा सिंह '

प्रज्ञा सिंह
जनता नेता में नायक तलाशती है, तो वह उम्मीद नाहक नहीं, पर नेता सेवा भी मैनेज कर लेता है. जोर-शोर से गाड़ियाँ गुजरती हैं, बहुधा उन स्मूद पहियों तले रौंदे जाते हैं जाने कितने घरौंदे. जुड़ी हथेलियों के भीतर भी अनगिन आह दबी होती है, जब माननीय अपनी मुस्कान के साथ उतरते हैं वाहन से और बढ़ते हैं मंच की तरफ. 

मंच से विकास के पतंग की डोर हुमक हुमक कर उड़ाई जाती है और आखिर में अधनंगे बच्चे उधड़े मालाओं के फूलों से उछल उछल नहाते हैं. 
लोकतंत्र में जब जनता परिभाग नहीं करती, सवाल नहीं करती, हिसाब नहीं रखती, केवल जब उम्मीद करती है तो वह मदारी से कब बंदरिया बन जाती है, पता ही नहीं चलता. 

नवोत्पल साप्ताहिक चयन में आज चयनित कविता है आदरणीय कवयित्री प्रज्ञा सिंह जी की. आप एक सजग लेखिका हैं, कवितायें आपका मुख्य स्पंदन हैं. गंभीर बातें अपनी कविताओं में चुटीले अंदाज में कह जाना आपकी खासियत है. आपकी कविता पर सहज टीप की है, आदरणीया गुंजन श्रीवास्तव जी ने. आप सहृदय पाठिका और शब्दसाधिका हैं. 
कविता पर आपकी टिप्पणी संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित है.  

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डरिये नहीं
डरवाइये नहीं
आइये आइये इधर आइये
इस जहर का तोड़ बताइये
आइये दो कदम बढकर आइये
जल्दी नहीं अच्छा थोड़ा ठहरकर आइये
पर बताइये बताइये जरूर बताइये
कि कुल्फी वाले के पास जैसे होते हैं
वैसे सांचे में कैसे फिट कर लेते हैं आदमी को आप
आदमी में से कैसे छांट लेते हैं काम का आदमी
बताइये कि आदमी का कैसे काट है आदमी
बताइये कि किस हुनर से खड़े कर देते हैं आप
आदमी के खिलाफ आदमी

साभार:करेंट क्राइम 



मेरे हुजूर मेरे आका
बताइये मुझे जरूर बताइये
कि आपकी तमाम बातों में
आदमी के हक की एक भी बात क्यों नहीं
मेरे मसीहा बताइये मुझे
बेघर हों दोनों
आदमी और भगवान
तो पहले किसका घर बनवायेंगे
वही तर्क कि जिस तर्क से
भगवान के भी भगवान हैं आप

बना है आप का भौकाल
रोज नया बवाल
चौं चौं चौं चौं चिल्ल पों
ये बेलबूटे ये कशीदेकारी
ये भाषणबाजी फितने बाजी
नये पैंतरे तीरंदाजी
आपके लिये नहीं तो किसके लिये
पूछ रहा है एक सवाली
बताइये बताइये हुजूरे आली

(प्रज्ञा सिंह )
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प्रज्ञा सिंह जी की कवितायें पढ़ती रहती हूँ।

ये एक कविता है। न न ये कविता से कुछ ज्यादा है। दुखी और कमज़ोर वर्ग की व्यथा है। आदमी को मनचाहे साँचे में फ़िट करने की ताक़त और आम आदमी की उस साँचे में रहने की मजबूरी। राजनीति सत्ता पक्ष की और बेबस जनता द्वारा सहन करने की मजबूरियाँ। क्योकि हर असहमति को देशद्रोह का नाम दिया जाता है। शासक ऐसे ही होते हैं। इनका हर फ़रमान ब्रह्म वाक्य बन जाता है।

बताइये मुझे जरूर बताइये
कि आपकी तमाम बातों में
आदमी के हक की एक भी बात क्यों नहीं
जवाब देना तो बनता है क्योंकि इसके अलावा और क्या चाहेगी आम जनता आपसे ?
ये बेलबूटे ये कशीदेकारी
ये भाषणबाजी फितने बाजी
नये पैंतरे तीरंदाजी

ये वादे जो आप बिना सोचे कर देते हैं , जब पूरे नहीं कर पाते। तो ख़ुद सोचिये कितने छोटे हो जाते हैं आप उनकी नज़र में जिनसे आपने वादे किये थे l  प्रज्ञा जी के द्वारा इस्तेमाल किये उदाहरण कोई कोरी कल्पना नहीं बल्कि हमारे इर्द गिर्द कसते हुए शिकंजे की वास्तविकता है। प्रज्ञा जी अपने उद्गार ज़ाहिर करने में सफल रही हैं पर कविता की पुकार बड़ी निरीह सी लगती है। विरोध के स्वर ज़रा मजबूत होने चाहियॆ। जान पड़ता है इस आवाज़ को मजबूत सहारे की ज़रुरत है।

"बताइये बताइये हुजूरे आली " ख़ुद को कमतर आँकने वाले शब्द लगते हैं। कवयित्री ने व्यंगात्मक शैली का उद्बोधन दिया है, क्योंकि सिद्धांततः  वो जन सेवक हैं जिन्हें  जनता ने ख़ुद चुना है l इसप्रकार विरोध की सुगबुगाहट भी कविता में परिलक्षित होती  है। हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।

आख़िर में ये कहूँगी कि कविता में उन्होंने सहन करते जाने की बजाय अन्याय के विरोध में स्वर दिए जो कि इक बड़ी बात है। कभी तो सूरज निकले और अन्धेरा ख़त्म हो। मूलतः ये कविता वर्तमान परिवेश में जो त्रासदी सब भुगत रहे हैं उसे बिना किसी लाग लपेट के बड़ी मासूमियत से किया गया शिक़वा है, जो दूर तलक दर्ज होता है l



(गुंजन श्रीवास्तव)




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