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Friday, March 31, 2017

"सदा आनन्द रहै एही द्वारे"- (3) डॉ. जयकृष्ण मिश्र 'अमन '

सदा आनन्द रहै एहि द्वारे

(तीसरी किश्त: आखिरी भाग) 

हर घर के दुआर पर जा-जा कर "सदा आनन्द" गाया जाता। भीतर से औरतें ख़ूब रंग फेंकतीं। हर घर से अपनी क्षमता के मुताबिक मिठाई, गुझिया जो बन पड़े, खिलाया जाता। पर होरियारों को कुछ खास घरों का इंतज़ार रहता। उन घरों का जहाँ कोई नौकी भौजाई आई हो, वहाँ तो रुक के ख़ूब चिल्ल-पों होती। उन घरों का कि जहाँ भांग वाले पेड़े मिलते। दो-तीन और घरों का, कि जहाँ से ख़ूब गरियाया जाएगा और जहाँ रात को हंड़िया फेंकनी है। होरियारों की भीड़ में छुपे अंतर्राष्ट्रीय देवर लोग धीरे से घरों में घुस के भौजाइंयों को रंग मल आते।

रामऔतार, जोगी, माताबदल जैसे अस्सीसाला बाबा लोग बड़े करीने से उज्जर धोती पहिन के, उसका कोन्ना हाथ में पकड़े इस्टाइल से चल रहे होते। लोग-बाग भी उनको बस अबीर का चन्नन लगा के गोड़ लग लेते (पैर छूना), पर एतने में कहाँ गुरू...। सतेन्दर भइया गजबै खेलवाड़ी। धरमिन्दरवा, सोगनवा, रमौधा..... सब एक से बढ़ि के एक लुहेड़ा। सतेन्दर भइया के लुहकारते ही मिनट भर में ऊ कुल बुढ़ऊ बाबा लोगन को संन्यासी से जामवन्त बना देते। झकझोर के हुड़दंग होता।

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        हुरियारे घर लौट रहे होते तो लड़कियाँ और लड़के अपनी अलग-अलग टोली बना के निकलते, गाँव की भौजाइयों की टोह लेते। फुलकुमारी, जयन्तिरा, कनक, सुभौती गोल बना के माँ और चाची के साथ रंग खेलने आतीं। दबा के पटकी-पटका, आ मुँहलूथेरई..... ई चली रहा होता तब तक दूसरा चीख-पुकार। किसी के नाक का नथुनी गिरा तो किसी के कान का कनफूल। मिलेगा कहाँ...? बाल्टी-बाल्टी भर के रंग खेली हौ, त सब गया ओही पानी के साथ पड़ोहा (नाली) में।

        दादी हम बच्चों को लेकर भौजाइयों से होली खेलवाने सतिन्दर भइया के घर ले जातीं। होली के दिन वो घर कारगिल से कम नहीं लगता, कसम से...। उस घर में कितनी भौजाइयाँ थीं, ये आज तक नहीं समझ पाया। उहाँ गजबै धुरकण्डो चल रहा होता। दू राउण्ड होली होता वहाँ। पहिले राउण्ड में सतिन्दर भइया एक-एक भौजाई को खोज-खोज के लाके झम्म से पड़ोहा में... कोई आटा सना हाथ लिए रसोई में थी, तो कोई कपड़हवा साबुन का झाग पोते अंगना में। पूरा ओसारा कनइया उठता। पर असली मज़ा तो दूसरे राउण्ड में आता। जब सज्जी भौजाइयाँ जुट के सतिन्दर भइया को गीले घूर (जहाँ गोबर और कूड़ा फेंका जाता) पर पटक के गोबरिया देतीं। नित्या भइया उनके पीछे लिहो-लिहो कर रहे होते, तो ओनहूँ का जंघिया फाड़ के कनई में...। सचिता भइया वहीं से चिल्लाते- "अरे अइया, लइकन के ओहरी रखे। इहाँ महाभारत मचा है।" और हम बच्चे दादी का हाथ छुड़ा, घर भाग आते।

         तीसरे पहर नहा-धो के फिर जनता जुटती। तिरपाल बिछाया जाता। भाई, होली बाद नया साल जो शुरू हो रहा है। सबके बीच पाँड़े बाबा बैठते, नैका पत्रा खोल के। नया बरिस कैसा होगा.... पानी-बुन्नी, हर्जा-खर्चा, फसल, राशिफल... सब सुनाते। गाँव भर उनको सीधा-पैसा चढ़ाता और सबको पैलग्गी कर के सब घर वापस।

       बरसों बीते, बाबा को गए आठ बरिस हो गए। मोती, सहती, पड़ोही और डण्डो काका भी चले गए। हमेशा हल्ला, दंगा और किबिल्ली करने वाले सतिन्दर भइया और जयपरकास भी बिना कुछ कहे, भरी जवानी में एक दिन चुपचाप निकल लिए। आज सुना की बिनोद चाचा भी अस्पताल में अब-तब हैं। पूरा गाँव जैसे सुन्न हो गया है। ढोल, झाल और सदानन्द सुने जमाना हो गया। आज होली के दिन दोपहर में अकेले दीवान पर लेटे हुए, मद्धिम आवाज़ में चाचा कुछ गुनगुना रहे थे। बड़े जतन से कान लगाया तो सुन पड़ा-


"सदा आनन्द रहै एहि द्वारे

मोहन खेलें फ़ाग रे.........!!!

पहली किश्त 

दुसरी किश्त 




जय कृष्ण मिश्र 'अमन'

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