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Monday, March 6, 2017

#३# विश्वविद्यालय के दिन: श्रीश पाठक 'प्रखर '

लौटते वक़्त का सफ़र भी मेरे लिए बहुत ही लुभावना हुआ करता । अक्सर साइड खिड़की वाली सीट मिल जाती । बोगी में बस इक्का-दुक्का लोग । पूरे उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा बारिश होती है गोरखपुर मेंतो जुलाई-अगस्त का मौसम सोच लीजिये ...अहा... चारोतरफ हरी चादर बिछी हुई । धान के नन्हें पौधे धरती की गोद हरी कर हवाओं के साथ जो अठखेलियाँ करते थे...सरजी-मैम जी पूछिए मत..बस महसूसिये, ...झूम झूम के सनन सनन बयार चल रही होतीखिड़की से चिपका मैउन हवाओं से जैसे बातें करताजाने कौन कौन से गाने याद आते...कितने वाक्य उभरते कविताओं से ! हरे खेतों के बीच में सीहापार (एक छोटा सा रेलवे क्रोसिंग व स्टेशन)के पास बहती पतली सी नदीजैसे हरे परिधान पर सफ़ेद सी डोरी सी हो । हवा का वो एक झोंका आज नसीब हो जाए तो हफ़्तों तरोताजा महसूस करूँ मै । उस एक घंटे के सफ़र मेंकभी मुलायम धूपकभी बारिश की लड़ी मिलती रहती थी ।


साभार:गूगल इमेज 

तो जब अकेला होता था तो अपनी दो पसंदीदा चीजें करता थाजिनका मेरे आज के व्यक्तित्व को गढ़ने में कम योगदान नहीं है और जो यदि मोबाइल युग होता तो असंभव होता । पहली पसंदीदा चीज : आस-पास को महसूसना दूसरा खूब खूब सोचना । सोचना जो मन करे ! काश आज भी कर पाता । लेकिन कभी कभी लौटते वक़्त भी भीड़भाड़ होती । दो घटनाएँ याद आ रहीं । एक चौड़ी सी टोकरी लिए एक ठिगना सा आदमी दो रूपये की टॉफी बेच रहा था और साथ में ईनाम वाले टिकट । ईनाम आना पक्का था । मै कौतुहल से देख रहा था । लोग लेने भी लगे थे और उनके ईनाम भी आने लगे थे । किसी को कंघी मिलता ईनाम में तो किसी को सस्ती गुडिया । किसी को छोटा सा शीशा मिलता तो किसी को प्लास्टिक का कंगन । सहसा किसी के १० रूपये निकले । तुरंत ही दस रूपये ग्राहक को थमा दिए गए-'भाईहमसे किसी का हक नहीं मारा जाता-टोकरी वाले की आवाज ..!किसी को फिर ईनाम चम्मच मिला तभी किसी को ईनाम में पचास रूपये निकल गए । दो रूपये में पचास का ईनाम: कौन कहेगा सौदा बुरा है । १९९८ में जब मै कक्षा आठ में पढता था तो गणेश जी ने मेरे सामने ही दूध पीया था...आज तक नहीं समझ आया था वो रहस्य अब ये देख रहा था कि दो रूपये में पचास मिल रहे थे । काफी देर वो बेचता रहा फिर वो चला गया । आधे घंटे बाद हम ही में से किसी ने नोटिस किया कि उस टोकरी वाले के साथ ही तीन-चार और लोग उतरे थे और हो न हो ये उसी टोकरी वाले के साथ बोगी में चढ़े भी रहे होंगे । तो माजरा समझ आ गया था । ईनाम अपने आदमियों के जरिये वो टोकरी वाला बटोर रहा था और जनता शीशाकंघीगुडियाकंगन ही जमा कर पाई थी । हम तो बस इसलिए बच गए थे क्योंकि नए नए घर से निकले थे और अभी उतने तेज नहीं बन पाए थे जितने की समझदार लोग होते थे ।

दूसरा वाकया जिसने मुझे ये सिखाया कि सच भी सापेक्ष होता है और सच के भी कई पहलू हो सकते हैं. हम कौन हैंकहाँ खड़े हैंकितना देख पा रहे हैं इस पर भी निर्भर करता है सच । सच की परतें भी हो सकती हैं और ख़ारिज कोई भी परत नहीं की जा सकती है । बाद में जाना कि यही पर्सपेक्टिव होता है । ट्रेन चल रही थी और एक शानदार आवाज में कोई धाराप्रवाह बोले जा रहा था । शब्दों का चयन आकर्षक और आवाज का खरापन प्रभावी था । कोई था अपनी उम्र का ही जो अपनी शानदार हिंदी में वकालत के पेशे को गालियाँ दिए जा रहा था । अब तो मुझे करीब आकर सुनना पड़ा । उनके तर्कों में दम था -वकील मुकदमा खुद ही लटकाते हैंमुवक्किल की माली हालत से उन्हें कोई मतलब नहीं । ये लोग पढ़ते-लिखते भी नहीं बस मुंशीगिरी से ही वकीली चलाते हैं । मंत्रमुग्ध सी जनता उन महाशय को सुने जा रही थी । मुझसे रहा ना गयापापाजी हमारे भी वकीलकब तक और कहाँ तक बर्दाश्त होता । मैंने सीधा ही हस्तक्षेप किया- आप सही हो सकते हैं पर उस पेशे का पूरा सच ये नहीं है । मेरे पापाजी भी वकील हैं-मैंने उन्हें रात रात भर पढ़ते देखा हैमुवक्किल उन्हें गाजरककडीभिन्डी दे जाते हैं फीस के तौर पर कई बार । छुट्टी के दिन भी जमानत के लिए जाते हैं ताकि कोई बहन अपने भाई की कलाई पर प्यार बाँध पाए जबकि उसका भाई निर्दोष है । कई बार केस सुनते ही पापा कहते हैं इसमे मुकदमा करने से फायदा नहीं होगापॉइंट कमजोर हैसुलह करना ठीक रहेगाकोई धंधा कैसे खराब हो सकता है और ख़राब लोग तो हर धंधे में हो सकते हैं... आदि-आदि...बोलता रहा मै..! जाने कब प्लेटफ़ॉर्म आ गयामहाशय शांत हो गए थेलोग सच के दूसरे पहलू से भी वाकिफ हो गए थे ।
उन महाशय से अगले दिन इंग्लिश की कक्षा में भेंट हो गयी । आज वे मेरे अनन्य मित्रों में से हैंकाफी कुछ सीखा उनसे !!!

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय का प्रवेशद्वार 

विश्वविद्यालय में अपने बुजुर्गों से सुना कि अभी तो कैम्पस में सतयुग पसरा हुआ हैबहुत शांति हैये कितनी बड़ी जगह है तब तुम्हे पता चलता । आदरणीया मायावती जी ने छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगा दी है । और जब से प्रोफ़ेसर राधे मोहन मिश्र जी कुलपति बनेइनवस्टी में सब कुछ पटरी पर है । अचानक कहीं पर भी पहुँच सकते हैं कुलपति जी । किसी भी विद्यार्थी से बात करने लग जाते हैं और समस्या पहचान तुरत कार्यवाही । कक्षाएं समय पर लगने लगी हैंप्रयोगशालाएं चलने लगी हैं । किसी भी हॉस्टल सहसा पहुँच जाते हैं वी सी सर और मेस का खाना खाने लग जाते हैं । किसी भी कक्षा में पहुँच जाते हैंअध्यापक नहीं पहुंचे समय से तो फिर उनकी कक्षा शुरू । मेरा तो पहला ही अनुभव था इनवस्टी काअच्छे की बुरे से तुलना ही नहीं कर सकते था । पर मुझे अच्छा बहुत लगता थाकैम्पस में ।



जिस साल मै पहुंचाउसी साल इनवस्टी के कुलपति परिवर्तित हो गए । उनके स्थान पर दर्शन शास्त्र के ख्यातिलब्ध विश्वविख्यात विद्वान स्व. रेवती रमण पाण्डेय जी नियुक्त हुए । मैंने कुलपति के रूप में इन मनीषी को ही देखा । आदरणीय पाण्डेय जी का एक बड़ा ही प्रसिद्द जुमला था जो वे अपने हर उद्बोधन में कही न कहीं जरुर प्रयोग करते थे : "सारा ताना-बाना छात्रों के लिए है । " तुरत ही जर्मनी से आये हुए थे तो थोड़ा जर्मन एक्सेंट आ जाता उनकी आवाज में । हम उनकी खूब नक़ल करते । पर उन्होंने अपने लिए हमारे दिलों वो स्थान बना लिया जो आसानी से नहीं बनाया जा सकता था । छात्र की हर मांग पे उनकी हाँ आ जातीविश्वविद्यालय प्रशासन सन्न देखता रह जाता । मैंने कितनी बार ही छात्रों की जिद भी पूरी होते देखी है: एक दो बार तो उन जिदों के केंद्र मै स्वयं ही था ।  उद्बोधन की शुरुआत किसी संस्कृत श्लोक से करतेउसकी संक्षिप्त व्याख्या कर के तनिक विषय पर बोल वाहवाही लूट लेते थेआचार्यजी ।



किसी भी दो विद्वान् की तुलना करना अनैतिक ही नहीं बल्कि तुलना करने वाले कि मूर्खता को भी परिलक्षित करता है पर ये बात आराम से कही जा सकती हैं कि जरुरी नहीं कि एक विद्वान व्यक्ति कुशल प्रशासक भी हो । तो मुझे अक्सर सुनने को मिलता कि ये राधेमोहन जी का करा-धरा हैशांति बनी हुई है वरना तो इनवस्टी के रंग देखते तुम सीरीस .....(मेरा नाम आज भी कम ही लोग ठीक से पुकारते हैंइसकी इतनी आदत पड़ चुकी है कि मै खुद ही अब अपना नाम कई बार गलत बता देता हूँ-कि तुम तोड़ोगे हीमै ही तोड़ देता हूँ इसलिए..और कुछ बेहतरीन लोग सही नाम पुकारते हैं तो मेरा ध्यान ही नहीं जाता और जब जाता है तो मन में इतनी अगाध श्रद्धा उपजती कि पूछिए मत ) ।



ये सच था इनवस्टी  की जो शांति है जो साफसुथरी रौनक हैजो व्यवस्था है वो आदरणीय राधेमोहन जी की अनन्य प्रतिबद्धताओं की वज़ह से थीं । तो इन अर्थों में मेरा बैच और मै बड़े ही भाग्यशाली थे कि हमें एक शानदार माहौल मिलने वाला था जिसकी नींव आदरणीय राधेमोहन जी ने अपने अनथक प्रयासों से डाल दी थी । मै उनसे कभी मिल नहीं पायासंयोग ही नहीं बनापर मेरे सहित हमारा पूरा बैच उनका आभारी है ।








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