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Sunday, March 12, 2017

"सदा आनन्द रहै एही द्वारे"...डॉ. जयकृष्ण मिश्र 'अमन '

(पहली किश्त)

जयपरकास अपनी नकनकाही आवाज़ में उठ-सुत भिनसारे से ही चिल्लाने लगते- "पनगोइंनी (पचगोइठी)....." और गाँव भर के लौंडे-लफाड़ी इसी धुन में उनके पीछे बउराते-चोंकरते चल पड़ते। फ़िर क्या...! दुआर-दुआर घूम के सम्मत के लिए पचगोइठी मांगी जाती। जिसने प्रेम से जो दे दिया, सब स्वीकार। असली खिलवाड़ तो पीछे होना होता था। जनकपुराही अपने घर के पिछवारे गोबर पाथ रही होतीं और उनके आँखों के सामने से सरसो के सरकण्डे का बोझे का बोझा गायब। वो "दहिजरा, मुँहझउसा" गरियाती हुई पीछे दौड़ती तब तक दुआरे से अरहर के रहठे का चार बोझ फुर्र...। फिर यही क्रिया नैनहपारवाली और मानीरामवाली के यहाँ दुहरायी जाती। डण्डो काका रात के गोले की ख़ुमारी में अपने ओसारे में सोये भोले बाबा के सपनों में मगन रहते। टोली उन्हें टाँग के खटिया से उतार के ज़मीन पर सुला देती और खटिया गई सम्मत में। ये तो निश्चित था कि डण्डो काका गरियाएंगे खूब पर चिन्ता कौन...? रात को उनके आँगन में उछाल के फेंकने के लिए गुह-मूत-गोबर से भरी हंड़िया तैयार रहती।

ऐसा नहीं के लौण्डों को इनसे कोई दुश्मनी थी, बल्कि ये लोग जब होली बीतने के चार दिन बाद तक गरियाते रहते तो लौण्डों को ख़ूब मज़ा आता। असल में फगुआ की शुरुआतै गारी-गरौझा से होती। 

साभार:गूगल इमेज 


अस्सी साल के मोती कचेर जब साँझ को गाँव के बाहर पोखरे के किनारे वाले शिवाले की चौखट पर बैठकर फेंकरना शुरू करते तो बूढ़े जवानों का झुण्ड ख़ुद-ब-ख़ुद शिवाले की ओर दौड़ पड़ता। "फागुन में बुढ़वा देवर लागे......" गाते हुए जब वो बित्ता के माई को चिढ़ाती हुई नज़र से देखते तो वो सत्तर बरिस की बुढ़िया घूँघट के नीचे से गरियाती हुई पास पड़ा ढेला चलाकर पूरी ताकत से सूत देतीं। बूढ़े हो या जवान, सारे देवर-भौजाई फगुनहट में सराबोर रहते। देवर लोग छेड़-चिढ़ा के मउज लेते तो भौजाई लोग घूँघटे के आड़ से मुँह दबा के ख़ूब गरियातीं, पर मज़ाल क्या कि ये गारी-गरौझा मनोरंजन या छेड़छाड़ से आगे बढ़ा हो।

अउर कौनो दिन होता तो साँझ पहर से ही कुक्कुर फेंकरने लगते, पर सम्मत वाले दिन जैसे-जैसे रात गहराती लौण्डों का हुल्लड़ बढ़ता जाता। सतेन्दर भइया न्यूज़चैनल की तरह घर के दरवाज़े घूम-घूम के बता आते- "बाबा.... रात दू बजे की साइत है, सम्मत जलाने की" और बाबा लाठी खड़काते हुए पूछते- "ए मलकिन.... लइके जौ अउर तीसी लाए कि नाहीं"। अइया का ध्यान बाबा के सवाल से ज़्यादा इस बात पर रहता कि दिन में घर भर को बुकवा (सरसो को भून-पीस कर बनाया गया उबटन) लगाकर उतारी हुई 'लीझी' का पिण्ड, दही, चन्दन वगैरह किस मउनी में रखा है, आख़िर जब सम्मतिए जाएंगे तो, जौ और तीसी की कच्ची बालियों के साथ उसकी भी तो ज़रूरत पड़ेगी।

जैसे ही साइत का समय होता, पाँड़े बाबा की एक आवाज़ के साथ हुल्लड़िये उनके पीछे हो लेते। हम भी बाबा के पीछे उत्साहित से पतली-पतली मेड़ों से होते हुए उत्तर के सिवान की ओर चल देते, जहाँ हमारे ही खेत में सम्मत जलने के इंतज़ार में खड़ी होती। वहाँ पहुँच कर सबसे पहले सभी अपने साथ लाई मउनी में भरी लीझी, दही, चन्दन आदि सम्मत में उलट देते। फ़िर पाँड़े बाबा उसमें आग लगाते। हम सब भी जोशियाये हुए बाक़ी लोगों की तरह उस सम्मत की आग में साथ लाई हुई जौ और तीसी की बालियों को भूनते। सम्मत के पाँच चक्कर लगाते और हर चक्कर के साथ कुछ बालियाँ सम्मत में फेंक देते। मेरे और भइया में इस बात का कम्पटीशन रहता कि किसकी फेंकी हुई बाली तीर की तरह जाके सम्मत के पुइरा में बिलकुल सीधी धँसेगी...!

सम्मत जुटाने में जयपरकास भले ही सबसे ज़्यादा मेहनत करते, गाली खाते ; लेकिन सम्मत जलने में सबसे लेट वही आते। गुग्गन चाचा धीरे से छेड़ते- "का हो जयपरकास... डण्डो काका के घर में लुकाये रहे का...?" और एक तीर से दो निशाने लग जाते। जयपरकास तो अपनी नकनकाही हँसी के साथ मन ही मन भुनभुनाते लेकिन डण्डो काका पुरज़ोर शुरू हो जाते। इसी बीच कोई पीछे से पड़ोही यादव की धोती खींच देता और उसके बाद तो फ़िर... जय हो....

(दुसरी किश्त )

(आखिरी किश्त )

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