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Sunday, March 26, 2017

#२# दिल की डायरी: मन्नत अरोड़ा


फिर हिम्मत बटोर कर ऊपर गयी बाकी सब पीछे ही थे।
पर जितना परेशान थी वैसा अब कुछ भी नहीं था।दरवाजा पूरा का पूरा खुला मिला।
अंदर जाते ही समझ में आया कि लड़कों का मेला आखिर दरवाज़े पे क्यों था?
होटल वालों ने पीने और नाचने का इंतज़ाम सारा दरवाज़े की एक ओर करवा रखा था।
दूसरी और लड़का-लड़की के रोके की रस्म चल रही थी।
एक चोर नज़र लड़के पे--अब वोही सब और लड़कों और पीने की टेबल कुछ साइड पे करवा रहा था।
चलो कुछ तो समझ है।
बाकी सब से मिलके मैंने अपने लिए एक कोना ढूंढ लिया।
जाने क्यों बार-2 ध्यान मेरा उसी की ओर बार-2 जा रहा था।
काफी समय के बाद देखा था।कुछ-2 sincere भी लग रहा था।यूँ तो पहले अजीब-2 मुंह बनाते हुए ही दिखता था।
अरे! height भी निकल आई है।  ;)
ओह! तो बड़े हो गए हैं जनाब जी।चलो शुक्र है थोड़ी-बहुत अक्कल भी आ गयी लगती है।
 यही सोच के खुद ही मुस्कुरा दी।
तभी ध्यान गया वो भी मुस्कुरा रहा है।
अब यह तो सही नहीं है।पता नहीं क्या समझ रहा है।
हद है।
मुझे ही अपना ध्यान हटाना पड़ेगा।वर्ना हम पंजाबियों में यह कहावत तो है ही _लड़की हंसी और पटी।
बेकार का ड्रामा बढ़ जाएगा।
किसी तरह वक़्त बिताया।खाना खाया और घर जाने का वक़्त भी आ गया।
नीचे की ओर जाने लगे सभी।
घर के बड़े आदमियों ने इन्ही वानरों की सेना को सबको घर पहुँचाने का जिम्मा सौंप दिया था।
मैं आगे बढ़ ही नहीं पा रही थी।आगे यह खड़ा था।
इतने में गाड़ी में बैठने को पीछे से कोई ज़ोर से मेरा नाम लेकर पुकारा।
चलो!नाम भी पता चल गया।
शायद उसको यह भी समझ आ गया था कि मैं आगे क्यों नहीं आ रही।
पीछे हटा वो तो जल्दी से कार में बैठी मैं।
मालूम हुआ कि वो कार भी वोही ड्राइव करने वाला है।अब घर भी पता चल जाएगा।कुछ तो थोड़ा-बहुत शक़ था कि मैं कौन हूँ और कहाँ रहती हूँ वो भी दूर हो जायेगा।
(हम काफ़ी रिश्तेदार एक ही गली के मोहल्ले में रहते थे और मैं चूँकि घर से बहुत कम निकलती थी तो बहुत कम लोग जानते थे मुझे)
एक-दो बच्चे भी मेरे ऊपर बैठा दिए गए।साथ में बहुत सी मेरी auntiyan।आगे कौन-2 था– कुछ दिखा नहीं और कुछ मैंने शुक्र भी किया कि न मुझे वो देख पाएगा और न मैं उसे।
जैसे ही घर की गली के बाहर गाड़ी रुकी और मैं उतरी।सीधी गली में तेज़ी से चलती-चले गयी कि अगर ज़रा सा भी थमी या रुकी या पलट के भी देखा तो कोई भूत पकड़ लेगा।
ऐसा लग रहा था कि कोई भूत मेरा पीछा कर रहा था।
जैसे ही घर पहुँची।दरवाज़ा और खुद को अपने कमरे में किया बंद ।
रात काफी हो चुकी थी।
पर नींद कब आई पता नहीं।कितनी देर तक उसकी आवाज़ और कहकहे अपने दोस्तों से ,मेरे दिल और दिमाग में गूंजते रहे।
आज यूँ ही नहीं हुआ इतने साल पीछे ख्यालों का मुझे ले जाना।
कुछ तो ब्लॉक कर रखा था।जो बरबस फिर से उभर आया,नेट से भी जिंदगी जैसे हारते हुए अपनी हर आइडेंटिटी डीएक्टिवेट करते।
फ्रेंड लिस्ट पे एक unknown सी रिक्वेस्ट बिना किसी पिक के।
नाम पढ़ते ही सारा प्रोफाइल छान लिया।
कोई सपना है या मेरा ही कोई ख़्याल वजूद हो आया है ?
यह कैसे हो गया?उसको मालूम भी है कि वो रिक्वेस्ट किसे भेज रहा है?
पिक चाहे कोई नहीं है पर details उसी की ओर इशारा कर रही हैं।
मेरा भी कोई पिक नहीं था।नाम भी फेक ही था।यूँ ही टाइम पास id थी जो कभी ही खोलती थी।
इतने सारे सवाल और एक परेशानी भी।हाथ डीएक्टिवेट का बटन नहीं दबा पाए।
सोचें परेशां कि accept करूँ यां नहीं–यां फिर से ब्लॉक कर दूँ इसे जिंदगी की तरह।
ख्यालों का भी अपना ही एक वजूद होता है।कब उभर आएं,किस मोड़ पे रु-ब-रु हो जाएं कह नहीं सकते।सच खुद को मनवा ही लेता है।जब तक नहीं मानते हक़ीक़त तोड़ती रहती है।
आखिर उसके लिए अभी मैं unknown ही तो थी तो यही सोच के request accept कर ली कि अपनी identity देना तो आखिर मेरे हाथ में ही है।सो जो होगा देखा जाएगा।
उसकी प्रोफाइल से यही लगता था कि बस games के लिए खोली है।
अगले दिन फ्री होकर जैसे ही नेट खोला तो थैंक यू 4 accepting the request का उड़ता हुआ एक message मिला।ऐसा लगा जैसे मैं अपने दिल को खुद ही thanx कह रही हूँ।
अचानक ही मेरा हाथ लैप टॉप की स्क्रीन पे चला गया जैसे छू कर परख रही थी कि कहीं मेरी आँखों का धोखा तो नहीं।
कितनी देर मैसेज को यूँ ही देखती रही।फिर से उसकी प्रोफाइल खोल ली थी।अभी कुछ सोच ही रही थी।
तभी एक दम से ध्यान onl9 लाइट पे चला गया।
जल्दी से सब बंद करना शुरू कर दिया।
पर तब तक chat box खुल गया।और दूसरी तरफ से मैसेज शुरू हो गए।
Hi
How r u?
इधर बिना कुछ सोचे मेरी उँगलियों ने भी जवाब टाइप शुरू कर दिए।
जो पूछा जा रहा था बस उसका कुछ मुनासिब सा जवाब दे कर वोही पलट के मैं भी सवाल किए जा रही थी।
बस इतना ध्यान था कि उसके ख़्याल में भी मेरा नाम न आ जाए कहीं।

(क्रमशः)

मन्नत अरोड़ा 















#१# दिल की डायरी: मन्नत अरोड़ा 

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