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Thursday, April 27, 2017

#25# साप्ताहिक चयन: 'दीवारों के पीछे की औरत ' / हरकीरत हीर

हरकीरत 'हीर'
दीवारों के पार जाने कितने चाँद हैं जो रोजाना जाया हो जाते हैं रोजमर्रा की उठापटक में. वे चारदीवारी से निकलते तो हैं पर कलूटे बादल जब तब घेरकर सामाजिक प्रश्न पूछते हैं. 

रस्मोरिवाज के टिमटिमाते तारे जिस्म के रूटीन यातनाओं से अनभिज्ञ बस दुपट्टे का लहजा परखते हैं. घने ईज्जतदार पेड़ों की ओट से निकलता चाँद अपनी चमक बचाता, निकलता तो है पर कलंक लग ही जाता है. 

फिर ये चाँद शापित भी होता है...बादल बरसते हैं रिसते घावों पर बेमौसम...तारे लगाते हैं कहकहे...अनायास..जब तब..! 

हम ही बन जाते हैं कभी तारे, कभी बादल और कभी अपने ही घमंड से पनपे ईज्जतदार पेड़. 

चंद चाँद जो सिलवटें करीने से जब तब ठीक करना सीख जाते हैं उन्हें हम बना लेते हैं मानक और फिर तौलते रहते हैं अनगिन चांदों को रात-दिन, यहाँ-वहां...! 

नवोत्पल साप्ताहिक चयन की पचीसवीं प्रविष्टि के रूप में हमने आग्रह किया परम आदरणीया हरकीरत 'हीर' जी से अपनी कविताओं से हमें अनुग्रहीत करने के लिए, आपने तुरत ही सहर्ष आशीर्वाद दे दिया l उन प्रेषित कविताओं में से एक को चयनित करने के दुस्साहस से बचते हुए पहली ही रचना हमने सर माथे रखा और 'दीवारों के पीछे की औरत' आपके समक्ष प्रस्तुत है l 'हीर' जी आधुनिक हिंदी कविताओं की जानी-मानी हस्ताक्षर हैं, जिन्होंने कविता में भाव पक्ष की मर्यादा रखते हुये सामानांतर विमर्श को संजोये रखा है l 

आपकी कविता पर समीचीन टिप्पणी की है संजीदा कवयित्री आदरणीया वसुंधरा पाण्डेय जी ने l वसुंधरा दी सूक्ष्म भाव के अवगाहन की सिद्धहस्त कलमकार हैं l प्रेम आपकी कविताओं का मूल उत्स है l 

आइये इस विलक्षण कविता-टिप्पणी के समवेत स्वर को महसूसें !!!


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दीवारों के पीछे की औरत 

साभार:गूगल इमेज



कभी इन दीवारों के पीछे झाँककर देखना 

तुम्हें औरत और मर्द का वो रिश्ता नज़र आयेगा

जहां बिस्तर पर रेंगते हुए हाथ  
जेहनी गुलामी के जिस्म पर
लगाते हैं ठहाके...

दर्द दोनों हाथों से बाँटता है तल्खियाँ
और,.... 
 समय की क़ब्र में दबी सहमी 
अपने ज़िस्म के लहू लुहान हिस्सों  पर 

उग आये ज़ख्मों को कुरेदने लगती है 

दीवारों के पीछे की औरत … 

  

बाजुओं पर कसा हुआ हाथ 
दबी ख़ामोशी के बदन पर से उतारता है कपड़े
वह अपने बल से उसकी देह पर लिखता है 
अपनी जीत की कहानी .... 
उस वक़्त वह वस्तु के सिवाय कुछ नहीं होती
सिर्फ एक जिन्दा जानदार वस्तु
 ज़िन्दगी भर गुलामी की परतों में जीती है मरती है
एक अधलिखि नज़्म की तरह 
ये दीवारों के पीछे की औरत  …… 


जब -जब वह टूटी है 

कितने ही जलते हुए अक्षर उगे हैं उसकी देह पर
जिन्हें पढ़ते हुए मेरे लफ़्ज़ सुलगने लगते हैँ
मैं उन अक्षरों को उठा -उठाकर  कागज पर रखती हूँ
बहुत लम्बी फ़ेहरिस्त दिखाई देती है

सदियों पुरानी लम्बी …
जहाँ बार -बार दबाया जाता रहा है उसे 
कुचला जाता रहा है उसकी संवेदनाओं को , 
खेल जाता रहा है उसकी भावनाओं से 
लूटी जाती रही है उसकी अस्मत 
अपनी मर्जी से 
एक बेटी को भी जन्म नहीं दे पाती 
दीवारों के पीछे की  औरत  …… 

साभार:गूगल इमेज


वह देखो  आसमां में ....

मेरी नज़्म के टुकड़े हवा मैं उड़ने लगे हैँ
घूँघट , थप्पड़ ,फुटपाथ , बाज़ार , चीख  , आंसू 
ये आग के रंग के अक्षर किसने रख दिए हैं मेरे कानोँ पर
अभी तो उस औरत की दास्ताँ सुननी बाकी है
जो अभी -अभी अपना गोश्त बेचकर आई है 
 एक बोतल शराब की खातिर अपने मर्द के लिये
अभी तो उस चाँद तारा की हँसी सुननी बाकी 
है जो अभी- अभी जायका बनकर आई है 
किसी अमीरजादे की बिस्तर की   .... 
तुमने कभी किसी झांझर की मौत देखी है ?
कभी चूड़ियों का कहकहा सुना है ?
कभी जर्द आँखों का सुर्ख राग सुना है ?
कभी देखना इन दीवारों के पीछे की औरत को 
जिसका हर ज़ख्म गवाही देगा
पल -पल राख़ होती उसकी देह का   …… 

अय औरत ! मैँ लिख रही हूँ
 दीवारों के पार की तेरी कहानी
गजरे के फूल से लेकर पैरों की ज़ंज़ीर तक
जहाँ तड़पती कोख का दर्द भी है
और ज़मीन पे बिछी औरत की चीख भी
ताबूतों में कैद हवाओं की सिसकियाँ भी हैं
और जले कपड़ों में घूमती रात की हँसीं भी
इससे पहले कि तेरे जिस्म के अक्षरों की आग राख़ हो जाये
मैं लिख देना चाहती हूँ आसमां की छाती पर 
''कि अय आसमां ! औरत तेरे घर की 
जागीर नहीं  … !!




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कहते हैं असली लेखन वेदना की गहराइयों से फूटता है...शब्द तो भीतर से आते दिमाग में गुजरते जुबान पर आते-आते संकोच से सिमट जाते या कलम की धार से शब्दों के प्रवाह में बह जाते हैं.  कविता का अंतः संसार अन्ततः स्त्री की अलक्षित पीड़ा का भाष्य है जहाँ से गुजरते हुये हर पाठक ठिठककर पढ़ने और सोचने को मजबूर हो सकता है,ऐसा ही कुछ कवयित्री की इस कविता को पढ़ते हुये ...देह और मन की उहापोह भावों के उमड़ने और पहुँचने से लेकर कई गहरे भावों। को अभिव्यक्त किया है जो काव्य संसार में तैरते जरूर नजर आते हैं लेकिन जीवन की सच्चाई से करीबी नाता रखते है।

कविता के जरिये देह के अलग-अलग अर्थों को कवयित्री ने सार्थक प्रयास किया है । तन मन और रिश्तों से टूटी हुई स्त्री का जब मौन टूटता है तो तमाम बाँध और बाँध के किनारे की बस्तियां बह जाती है सच के सैलाब में...! कवयित्री की इस कविता से गुजरते हुए यह महसूस हुआ कि एक मुकम्मल और सुगठित किस्सा सा पढ़ने को मिला है जिनमे पठनीयता और काव्य-रस तो अन्तरभुक्त है ही इसके साथ ही कविता यथार्थ का समूचापन अपनी गतानुगतित शृंखला में बंधी रहकर समय का एक गहन साक्षात्कार हमें कराती चलती है । यह कविता अपने पूरे समकाल का प्रामाणिक प्रतिनिधित्व करने में सामर्थ्य रखती है । इस कविता में पुरुष की सत्ता और स्त्री के दमन का सनातन इतिहास है। बहुतायत में देखा जाता है कि पुरुष बुद्धिजीवी स्त्री का सानिध्य और मैत्री तो चाहते हैं लेकिन  जीवन संगिनी बनने के बाद उसके व्यक्तित्व को खुरच-खुरच कर तानो आदि से विदीर्ण करने में ही सुख पाते हैं फिर शुरू होती है बन्दिशें ... 'सिर पर तलवार टाँग कर प्रेम नही पाया जा सकता क्यूंकि स्त्री के भीतर तब घृणा और जन्मती है और ऐसे में कवयित्री टँकार लगाती है...लिख देना चाहती है आसमां की छाती पर 'कि अय आसमां ! औरत तेरे घर की जागीर नही...!

रचनाकर्म में प्रस्तुत हुई अनुभूतियाँ ऐसी हैं जो अभिव्यक्ति की राह पा कर भी उद्दात और संयत है...!



इस तरह की मनोस्थिति में जाकर रचना करना बड़ा दुष्‍कर कार्य है, रचना लुभाती रही मोहती रही यह बात अलग है कि बहुत कुछ अनकहा सा आपने छोड़ दिया । कभी-कभी कविता का अर्थ नहीं निकालकर उसका बस रसास्‍वादन करना चाहिए, यह उसी तरह की रचना है, सादर और साधुवाद..!!

वसुंधरा पाण्डेय

Tuesday, April 25, 2017

#3# विश्वविद्यालय के दिन: 'डॅा. गौरव कबीर '

पिछली मर्तबा बात छात्रसंघ चुनावों के दरम्यान विश्वविद्यालय  के माहौल की  हो रही थी तो वहीं से शुरू करते हैं:




डॉ. गौरव कबीर
यूं तो इन चुनावों में आप चाहें या न चाहें आप प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ ही जाते हैं पर छात्रो का एक वर्ग ऐसा भी था जिस की पूछ इन चुनावों मे कुछ ज्यादा ही थी । ये कौम थी “एक्सट्रा करीकुलर एक्टिविटी” वाले लौंडों की, ये लौंडे नाटक, गीत, कविता, नृत्य , चित्रकारी आदि करते थे और प्राय: सरकारी पैसे पर युवा महोत्सवों और प्रतियोगिताओं मे भाग लेने दूसरे प्रान्तों मे जाया करते थे  । यूं तो इन लौंडों मे प्रतिभा  भी कूट कूट कर भरी थी , पर ये प्रतिभा की कुटाई कुछ इतनी बारीक थी कि  नेता टाइप लोगों  को ये प्रतिभा सिर्फ चुनाव के आस पास ही नज़र आती थी । पर अगर आप ये सोच रहे हैं कि सिर्फ प्रतिभा कि वजह से ही  इन की  पूछ थी तो आप गलत हैं । बहुत से प्रतिभाशाली व्यक्ति होते हैं पर उन्हे कोई पहचानता नहीं , पर इस कौम ने विश्वविद्यालय मे अपनी सकारात्मक पहचान बना रखी थी और ये प्राय: शरीफ भी समझे जाते थे। न सिर्फ लड़के बल्कि लड़कियां भी इन्हें पहचानती थीं और नेतागिरी मे उलझे लोगों को ऐसे चेहरे अपने साथ जरूर चाहिए थे जिन्हे दीक्षा भवन (महिला संकाय) में “शरीफ” समझा जाए , जिस से लड़कियों के वोट भी हासिल हो सकें। ये शरीफ चेहरे घूम-घूम कर वोट मांगने मे जुट जाते , ये भी न सोचते कि इस चुनाव के बाद शरीफ वाली इनकी छवि ख़तम हो जानी है और फिर ये दगी हुई कारतूस कि तरह किनारे लगा दिये जाएंगे।

जब कभी छात्र नेता अपने रेगुलर प्रचारकों को छोड़ कर सिर्फ शरीफ माने जाने वाले लड़कों के साथ दीक्षा भवन मे घुसते तो इन रेगुलर समर्थकों के सीने पर तो मानो साँप ही लोट जाता था। ये होना स्वाभाविक ही था क्यूकि “मर्द टाइप रेगुलर प्रचारक” के नज़रिये के हिसाब से तो इन “मऊगा टाइप” लड़कों के दम पर चुनाव नहीं जीता जा सकता था। पर समझदार छात्र नेता जानते थे कि कहाँ मर्द बन कर भोकाल टाइट करना है और कहाँ इन कलाकर लड़कों को साथ लेे कर हाथ जोड़ कर “दीदी-दीदी” कह कर वोट मांगना है।  
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मर्द टाइप छात्रों और पूर्णत: पढ़ाकू छात्रों के बीच साल भर हिकारत कि नज़र से देखे जाने वाले ये  “एक्सट्रा करीकुलर एक्टिविटी” वाले लड़के एकाएक अपनी पूछ बढ़ जाने से अति प्रसन्न हो जाते थे और प्रचार मे अपने आप को झोंक देते। कुछ तो मानसिक रूप से इतना ज्यादा इनवोल्व हो जाते कि उनके सपनों मे भी बस चुनाव आते थे । खुद को अगले चुनावों मे उम्मीदवार तक मान बैठे थे। हालांकि तब उनमे से कोई भी गंभीरता पूर्वक छात्र राजनीति में नहीं आ सकता था , शायद छात्र राजनीति करने भर के पैसे जुटाना उनके बस का नहीं था। यूं भी तब ठेकेदारी के पैसों से चुनाव लड़ने का ज़माना था।

      धीरे –धीरे ही सही पर राजनीति का असर इनके परस्पर सम्बन्धों पर भी पड़ने लगा, अब “एक्सट्रा करीकुलर एक्टिविटी” वाले छात्रों में प्रत्याशियों के हिसाब से खेमेबंदी भी होने लगी (जाति वाली खेमेबंदी तो पहले सी ही थी)। सुकून बस इतना था कि ये खेमेबंदी 20-25 दिन तक ही रहती थी। बाद मे कोई युवा- महोत्सव का चयन होने लगे तो सब एक हो जाते थे।  इस सब के बीच इन कलाकार लड़को के प्रदर्शन पर भी फ़र्क जरूर पड़ता था ।
अरसे बाद जब मैंने तिग्मांशु धूलिया की फ़िल्म 'हासिल' देखी तो लगा कि हमारे ही विश्व विद्यालय  की कहानी है । शायद हर शिक्षण संस्थान की मोटा-मोटी यही कहानी होती है, जहां सामान्य छात्र चुनावी फायदे के लिए छले जाते हैं ।

(क्रमश:) 

Saturday, April 22, 2017

#५# दिल की डायरी: मन्नत अरोड़ा


मन्नत अरोड़ा 
यूँ तो अभी दो साल ही पूरे होने को थे शादी के बाद।इतना थक गयी थी कि आगे और जिंदगी भी यहीं काटनी है।बस यही सोच के अब जिंदगी से कोई उम्मीद बची ही नहीं थी। यह दो साल भी पता नहीं कैसे बीते थे। कुछ दिन तो भूलाये से नहीं भूलते।

मेरी शादी के कुछ दिन बाद ही तो था करवा चौथ।
पहली बार व्रत रखा था।माहौल और मौसम कुछ अजीब सा था तो चाँद निकल ही नहीं रहा था।बादल थे।
घर और बाहर सभी औरतें इंतज़ार में कि व्रत कैसे खोलें।सभी घरों की छतों पे कि तभी एकाएक चाँद निकला तो सभी भागी अपना-2 पूजा का सामान लेने।इतने में चाँद फिर से बादलों के पीछे था। अब सभी एक-दुसरे का मुंह देख रही थी कि क्या किया जाए।इतने में किसी ने आकर कहा कि मंदिर की पंडिताइन से पूछा है कि ऐसे चाँद तो निकल ही आया है भले ही बादलों के पीछे है तो भगवान् शिव के सिर का चाँद देखो मूर्ती में और खाना खा लो।

सब के साथ मैंने भी ऐसा ही किया।मेरे पति अभी तक घर नहीं आये थे।तबियत मेरी व्रत के कारण कुछ खराब थी।सिर मेरा बुरी तरह से दर्द कर रहा था।मेरे से कुछ खाया भी नहीं जा रहा था।किसी तरह से कुछ थोड़ा खाना और दवाई खा कर मैं सोने चली गयी। जैसे ही पति आए तो बस यही बात लेके बैठ गए कि आखिर चाँद नहीं निकला था तो खाना क्यों खा लिया।अपशगुन कर दिया।भले ही चाँद सारी रात न निकले,खाना चाँद देख के ही खाना चाहिए।पति से प्यार ही नहीं है।बस मरते हुए देखना चाहती है। मैं कहा भी कि सब कह रहे थे तो मना भी कैसे करती।


चलो वो बात खत्म ही हुई कि लो जी अब तबियत खराब है।
करवा-चौथ तो पति की रात होती है।पत्नी सो कैसे जाए दवाई खा कर।बस चीखे जा रहा था और दीवार पे अपना सिर पटक रहा था।मुझे यही समझ में नहीं आ रहा था कि मेरे से क्या गलती हो गयी शादी कर के।आखिर क्यों की। दिल में आया कि सब छोड़ के चली जाऊं। पर कहाँ। दिन ससुराल के और रातें पति की।अपना कुछ रहता ही नहीं।एक किराए की जिंदगी जीते चली जानी है। बातों ही बातों में यह तो सास को जता ही दिया था कि मैं जब तक बेटी कुछ बड़ी नहीं हो जाती और बच्चे की नहीं सोच सकती।वैसे भी घर में इतना काम क्या कम था–मेरी बेटी,जेठानी की बेटी और अब बेटा भी।सारे घर का,आने-जाने वालों और कुछ फैक्ट्री के नौकरों का खाना तक घर में बनता था।


ऊपर से साफ़-सफाई और न जाने क्या-क्या।इस पे एक और बच्चा;मैं सोच भी कैसे लेती।


घर में दो पार्टियां बनी हुई थी।एक सास की और दूसरी जेठानी की।मैं जिस की भी पैरवी करती दूसरी मेरे ख़िलाफ़ तो मेरा हाल आम जनता जैसा था कि वोट किसको दे। अब पति माँ के साथ था तो ज़ाहिर सी बात है उसी को वोट करना था। इस पे जेठानी-जेठ और सास की 2 ननदें(बुआ-सासें) यानी पूरा head quarter ही नाराज़ रहता था। मेरी ननदों का वोट कभी इधर तो कभी उधर।Head quarter की नाराज़गी किसी को मंज़ूर नहीं थी। आखिर कुछ झगड़ों के चलते दोनों पार्टी अलग हो ही गयी।झगड़े भी कुछ छोटे नहीं हुए थे।

मेरी दोनों ननद अब माँ की पार्टी में थी।


अलग हो जाने से एक तो बिज़नस और दूसरा बेटा न होने का दुःख में माँ-बेटा दुखी रहते।
अब तो मैंने मान ही लिया था कि अगर बेटा हो भी जाए तो भी इन माँ-बेटा को दुखी होने का कोई और कारण मिल जाएगा।इन्होंने रहना रोते ही है।कोई कारण न मिलने पे ये खुद ही बना लेते हैं।
मेरे सिर दर्द के dose बढ़ने लग गए थे।

बहनें भी साथ देने के एवज में माँ से यदा-कदा कुछ न कुछ डिमांड करती रहती थी।चाहे सबको प्रॉपर्टी का शेयर दे दिया गया था पर माँ ने जो कुछ अपने लिए रखा था कि वक़्त आने पे दोहते-दोहतियों और पोते-पोतियों की शादी पे देंगी।बस वो भी अभी मिल जाए इस पे होड़ लगी थी।न मिलने पे झगड़े।
अब इनके आपसी मामलों का मैं क्या करती।बेटियां घर आ जाती थी तो सास उनके जाने के बाद मुझे रो-रो कर सब कहती।नहीं आती थी तो खुद ही फ़ोन कर-कर के बुला लेती।

फिर एक दिन दोनों बुआ सास के रोड एक्सीडेंट में चल बसने की ख़बर आ गयी।

इस पे मेरे दिल के ही एक कोने ने कहा
"चलो कुछ तो "कूड़ा" कम हुआ"


अब उनकी कुर्सी मेरी दोनों ननदें संभालने का सोचने लगी।

(क्रमशः )



Thursday, April 20, 2017

#24# साप्ताहिक चयन: 'स्मृति विसर्जन' / रुचि भल्ला

रुचि भल्ला
रोमियो और एंटी-रोमियो के इस दौर में प्रेम, प्यार, इश्क़ ये सब कहने मे कितने सहज लगते हैं ! कुल ढाई आखर ही तो है, पर ये ढाई आखर ही कभी  ढाई सौ गुलाब की गुलकंद लगते हैं तो कभी ढाई मन रेत का बोझ बन जाते  हैं एक बारगी प्रेम करना सहज है जब कि प्रेम मे बने रहना, प्रेम करते रहना, प्रेम को निबाहना तनिक कठिन | स्मृति विलोपन कि अवस्था मे स्मृतियों से प्रेम करना शायद और भी कठिन | न जाने क्या क्या लिखा गया और क्या कहा गया पर प्रेम तो धीमी आंच पर हौले हौले पकने वाली शै है

इस शै को ही हमसे रूबरू कराने वाली कविता आज नवोत्पल साप्ताहिक चयन में  चयनित  है |  आदरणीय कवयित्री  रुचि भल्ला जी  का रचनाकर्म संस्मरण, लघुकथा , कहानी आदि साहित्यिक लेखन मे दिखता है परंतु  कवितायें लिखना आप को विशेष प्रिय है | आपकी कविता पर सहज टीप की है, आदरणीया  अमिता पाण्डेय जी  ने,  आप संवेदनाओं से परिपूर्ण कुशल पाठिका हैं |


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स्मृति विसर्जन


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अम्मा सुंदर हैं लोग कभी उन्हें सुचित्रा सेन कहते थे
अम्मा कड़क टीचर थीं स्कूल के बच्चे उनसे डरते थे
अम्मा अब रिटायर हैं और मुलायम हैं

अम्मा गर्मियों में आर्गेन्ज़ा बारिश में सिंथेटिक
सर्दियों में खादी सिल्क की साड़ियाँ पहनती थी
साड़ी पहन कर स्कूल पढ़ाने जाती थीं
वे सारे मौसम बीत गए हैं

साड़ियाँ अब लोहे के काले ट्रंक में बंद रहती हैं
ट्रंक डैड लाए थे उसे काले पेंट से रंग दिया था
लिख दिया था उस पर डैड ने अम्मा का नाम
सफेद पेंट से
ट्रंक तबसे अम्मा के आस-पास रहता है

स्पौंडलाइटिस आर्थराइटिस के दर्द से
अम्मा की कमर अब झुक गई हैं
कंधे ढलक गए हैं
पाँव की उंगलियां टेढ़ी हो गई हैं
अम्मा अब ढीला-ढाला सलवार -कुर्ता पहनती हैं
स्टूल पर बैठ कर अपनी साड़ियों को धूप दिखाती हैं
सहेज कर रखती है साड़ियाँ लोहे के काले ट्रंक में
जबकि जानती हैं वह नहीं पहनेंगी साड़ियाँ
पर प्यार करती हैं उन साड़ियों से

उन पर हाथ फिराते-फिराते पहुंच जाती हैं इलाहाबाद
घूमती हैं सिविललाइन्स चौक कोठापारचा की गलियाँ
जहाँ से डैड लाते थे अम्मा के लिए रंग-बिरंगी साड़ियाँ
अम्मा डैड के उन कदमों के निशान पर
पाँव धरते हुए चलती हैं
चढ़ जाती हैं फिर इलाहाबाद वाले घर की सीढ़ियाँ
घर जहाँ अम्मा रहती थीं डैड के साथ

लाहौर करतारपुर और शिमला को भुला कर
घर के आँगन से चढ़ती हैं छत की ओर पच्चीस सीढ़ियाँ
अम्मा छत पर जाती हैं
डैड का चेहरा खोजती हैं आसमान में
शायद बादलों के पार दिख जाए
उन्हें रंग-बिरंगे मौसम
जबकि जानती हैं बीते हुए मौसम ट्रंक में कैद हैं

अम्मा काले ट्रंक की हर हाल में हिफ़ाज़त करती हैं
सन् पचपन की यह काला मुँहझौंसा पेटी
अम्मा के पहले प्यार की आखिरी निशानी है


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अमिता पाण्डेय
विशुद्ध मानवीय धरातल पर प्रेम नितांत व्यक्तिगत नहीं रह जाता । प्रेम की निजी अनुभूतियां जब शब्दों का आवरण ओढ़कर हमारे सामने आती हैं तब वह जिस तरह से पाठक के साथ रागात्मक सम्बन्ध स्थापित करती हैं वह प्रक्रिया उसे अनेकों हृदयों के अनुभवों से जोड़कर प्रेम के एक विराट कैनवास का निर्माण करती है । रूचि भल्ला की कविता 'स्मृति विसर्जन' कुछ ऐसा ही हमारे साथ करती है । यह कविता नास्टेल्जिया का रूप धरकर हमारे सामने प्रस्तुत होती है और एक 'मुंहझौंसे' सत्य के रूप में अंततः हमारे सम्मुख खड़े होकर हम पर लगातार मुस्कुराती रहती है । 

कविता की शुरुआत एक स्त्री के सुखद इतिहास की कहानी है जहां हर तरफ बागों में बहार है । कुछ समय के लिए अगर विमर्श टाइप की चीज को किनारे रख दिया जाए और नितांत भारतीय गृहस्थ  प्रेम को केंद्र में रखा जाए तो हम पाएंगे कि एक भारतीय स्त्री की ठसक का स्रोत उसका पति होता है । यहां एक आदर्श स्थिति है और वह यह कि वह पति भी उस स्त्री से अनन्य प्रेम करता है । इसका प्रमाण वह साड़ियां हैं जो की उसने अपनी उस पत्नी के लिए खरीदी हैं । अब हम विमर्श को वापस ले आते हैं तो हम पाएंगे कि हमारे लाख इंकार के बावजूद यह होता है की स्त्री का संस्कार ही कुछ तरह होता आता है कि वह अन्ततः अपने आपको इस तरह मिटा देती है कि उसका अस्तित्व कोई मायने नहीं रखता । वह एक काले बक्से के इर्द गिर्द ही घूमता रहता है ।यहाँ बक्से का काला होना अनायास नहीं है । एकबारगी भले ही यह लगे की यह स्मृतियों का संग्रह है लेकिन यह एक ऐसा गह्वर है जिसमें वह अपनी स्मृतियों का, अपने प्रेम के साक्ष्यों का विसर्जन करती है ताकि वह अपने को और मिटा सके और इसकी नींव पर अपने प्रेम की मीनार को खड़ा रख सके । दरअसल यह विसर्जन विशुद्ध प्रेम और तर्क की भूमि और खड़े विमर्श के बीच एक बड़ी महीन रेखा है जिसका ध्यान रखा जाना अत्यंत आवश्यक है।

मैं कवयित्री को इस मर्मस्पर्शी परंतु नितांत निश्छल प्रेम से परिपूर्ण रचना के लिए साधुवाद देती हूँ और शुभकामनाएँ भी |
                                                                                  (अमिता पाण्डेय)