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Thursday, April 13, 2017

#23# साप्ताहिक चयन: 'मै एक चोर हूँ'/ आलोक प्रकाश

आलोक प्रकाश
शब्दों के अर्थ छलने लग जाते हैं जब कई बार हम बहुत गहरे उतरने लगते हैं. फैसला सुनाने वाला भी दोषरहित नहीं होता, पर वह न्यायाधीश कहलाता है. दूसरी तरफ चोरी के धंधे भी ईमानदारी से ही चलाये जाते हैं. केवल सामान की चोरी को चोरी क्यूँ कहा जाए, हक़ की लूट और उम्मीद की लूट भी तो एक भयानक लूट है. जब जर्रा जर्रा कहता है कि बोलो ...बोलो कि यहाँ चुप रहना अब ठीक नहीं...फिर भी जब कर्त्ता मौन को चुन लेता है तो वह भी तो एक जघन्य चौरकर्म है. लबादा ओढ़े है कोई शरीफ तो यकीनन वह चोर है, कोई न कोई चोरी वो बराबर कर रहा है. पर यह तो तभी समझ आयेगी बात जब यह बोध जगे कि 'मै' और 'हम' में बुनियादी रिश्ता है, अलग-अलग दिखते भले हों पर अन्यान्य रज्जुओं से बंधे हैं, परस्पर. 

आलोक प्रकाश जी बेहद सक्रिय युवा लेखक हैं. आप साहित्य की सभी विधाओं में अपनी कलम चलाते हैं और दुरुस्त चलाते हैं. साप्ताहिक चयन में आपकी कविता पर टिप्पणी कर रही हैं आदरणीया अमिता नीरव जी. अमिता जी शब्दों के माध्यम से गहरे उतरती हैं, जीवन की मोतियाँ अनुभवों की सीपियों से निकाल अपनी दैनंदिन अभिव्यक्तियों में पिरो देती हैं. आइये इस कविता-टिप्पणी समयोग के साक्षी हों !!!


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साभार:गूगल इमेज
मैं एक चोर हूँ,
मैं एक मौन हूँ.
आवाज़ को निगल लेता हूँ मैं.
रात को चोरियाँ करता हूँ,
दिन में तुम्हारी परछाई बन कर घूमता हूँ.

कई बार ऐसा हुआ है:
तपती धूप है,
कोई बूढ़ा बेतरह दयनीय दशा में भाग रहा है,
तुम अपने दुपहिए पर किसी दिशा मे भाग रहे हो.
वो दिख जाता है तुमको,
चंचल आँखे पहुँच जाती हैं वहाँ तक.
मालूम नहीं क्या अनुभूति होती है तुम्हें.
लेकिन अभिव्यक्त क्या करते हो तुम?
मौन!

रास्ते में मुरझाए पेड़ों को देखते हो तुम,
पर शब्दहीन!
कुछ बच्चे तुमको दिख जाते हैं सड़कों पर भीख माँगते हुए,
लेकिन तुम चुप!
तुम इबारत करते हो ,
बेहिसाब लिखते हो इनके बारे में
इनकी आरती उतारते हो,
लेकिन सड़क पर आते ही सब भूल जाते हो
सब कुछ कागज़ी?


निःशब्दता हमने आविष्कृत की ,
परिष्कृत की, व्यवह्रत की.
सदियों से इस अभिव्यक्ति पर हमारा अधिकार है!
पर यह समझ लेना चाहिए,
तुम्हारी पहचान सिर्फ़ और सिर्फ़ आवाज़ है,
तुम्हें ग्लानि होती है ,
शब्द हैं तुम्हारे पास.
तुम्हें अन्याय लगता है,
तुम शोर करो, तुम्हें हर्ष होता है ,
व्यक्त करो.

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कविता सरल है, लेकिन कई सारे आयाम खोलती है, कई सारी पर्तों को उघाड़ती है। कई स्तरों पर बोलती है... कुछ चुप्पियों में बोलती है... कुछ चुप्पियों के अर्थों को खोलती है। चोर के मेटाफोर से कहने के संकट और न कहे जाने की सुविधा पर चीखती कविता में धिक्कार है और कहने की चुनौती भी है। इस दृष्टि से जटिल होती चलती है।


चोर यहाँ कई प्रतीकों के लिए उपयुक्त हुआ है, व्यवहृत हुआ है। भीतर का चोर है, जो न कहने के लिए प्रेरित भी करता है और कहने के लिए उकसाता भी है। कभी वो बाहर भी आ जाता है, आईना दिखाता है। अपने समय की मुश्किलों के साथ संवाद करता है, आँख मिलाता और संवाद करता है। जैसा कि पहले ही कहा है कि कई पर्तों को उघाड़ती चलती है ये कविता।

ये हमारे समय में अपनी मजबूरियों की सुविधाजनक चुप्पी को ओढ़कर यंत्र हो चले मनुष्य के भीतर बह रही क्षीण हो चली संवेदनाओं को झकझोरने की कोशिश
भी है... यहाँ भी चोर ही है।

वही चोर कहे जाने की निरर्थकता की अभिव्यक्ति भी है। कहे जाने के महत्व का गान भी। पूरी कविता में एक अंर्तद्वंद्व है जो कई-कई मोड़ों से गुजरता है। कविता कई मौकों पर खुलती-सी महसूस होती है और फिर बंद हो जाती है। अंत में खुलती है... जीवन की सहजता और ओढ़ी हुई औपचारिक संभ्रांतता से विद्रोह करती है। अंत में आकर चोर कहता है कि तुम्हारी चुप्पी चाहे सजग हो या फिर सहज, वह अर्थहीन है। शायद ये भी कि चुप्पी का कभी कोई अर्थ रहा ही नहीं... यह चुप्पी अपने साथ, अपने समय और अपने समय के समाज के साथ बेईमानी है। कहता है कि कहो... लिखकर नहीं, घड़ कर नहीं... गाकर भी नहीं, क्योंकि इस दौर में माध्यमों का असर खत्म हो चला है। चीखकर... शब्दों में कहा गया ही सुना जाएगा... शायद वह भी सुना नहीं जाएगा, उसे भी कानों में ऊँगली डालकर सुनाया जाना होगा, इसलिए जो भी, जैसा भी महसूस करो, कहो, चीखकर कहो, शोर मचाओ.... क्योंकि समाज के कानों में सुविधा की रूई ठूसी हुई है...!!!


अमिता नीरव


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