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Thursday, April 27, 2017

#25# साप्ताहिक चयन: 'दीवारों के पीछे की औरत ' / हरकीरत हीर

हरकीरत 'हीर'
दीवारों के पार जाने कितने चाँद हैं जो रोजाना जाया हो जाते हैं रोजमर्रा की उठापटक में. वे चारदीवारी से निकलते तो हैं पर कलूटे बादल जब तब घेरकर सामाजिक प्रश्न पूछते हैं. 

रस्मोरिवाज के टिमटिमाते तारे जिस्म के रूटीन यातनाओं से अनभिज्ञ बस दुपट्टे का लहजा परखते हैं. घने ईज्जतदार पेड़ों की ओट से निकलता चाँद अपनी चमक बचाता, निकलता तो है पर कलंक लग ही जाता है. 

फिर ये चाँद शापित भी होता है...बादल बरसते हैं रिसते घावों पर बेमौसम...तारे लगाते हैं कहकहे...अनायास..जब तब..! 

हम ही बन जाते हैं कभी तारे, कभी बादल और कभी अपने ही घमंड से पनपे ईज्जतदार पेड़. 

चंद चाँद जो सिलवटें करीने से जब तब ठीक करना सीख जाते हैं उन्हें हम बना लेते हैं मानक और फिर तौलते रहते हैं अनगिन चांदों को रात-दिन, यहाँ-वहां...! 

नवोत्पल साप्ताहिक चयन की पचीसवीं प्रविष्टि के रूप में हमने आग्रह किया परम आदरणीया हरकीरत 'हीर' जी से अपनी कविताओं से हमें अनुग्रहीत करने के लिए, आपने तुरत ही सहर्ष आशीर्वाद दे दिया l उन प्रेषित कविताओं में से एक को चयनित करने के दुस्साहस से बचते हुए पहली ही रचना हमने सर माथे रखा और 'दीवारों के पीछे की औरत' आपके समक्ष प्रस्तुत है l 'हीर' जी आधुनिक हिंदी कविताओं की जानी-मानी हस्ताक्षर हैं, जिन्होंने कविता में भाव पक्ष की मर्यादा रखते हुये सामानांतर विमर्श को संजोये रखा है l 

आपकी कविता पर समीचीन टिप्पणी की है संजीदा कवयित्री आदरणीया वसुंधरा पाण्डेय जी ने l वसुंधरा दी सूक्ष्म भाव के अवगाहन की सिद्धहस्त कलमकार हैं l प्रेम आपकी कविताओं का मूल उत्स है l 

आइये इस विलक्षण कविता-टिप्पणी के समवेत स्वर को महसूसें !!!


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दीवारों के पीछे की औरत 

साभार:गूगल इमेज



कभी इन दीवारों के पीछे झाँककर देखना 

तुम्हें औरत और मर्द का वो रिश्ता नज़र आयेगा

जहां बिस्तर पर रेंगते हुए हाथ  
जेहनी गुलामी के जिस्म पर
लगाते हैं ठहाके...

दर्द दोनों हाथों से बाँटता है तल्खियाँ
और,.... 
 समय की क़ब्र में दबी सहमी 
अपने ज़िस्म के लहू लुहान हिस्सों  पर 

उग आये ज़ख्मों को कुरेदने लगती है 

दीवारों के पीछे की औरत … 

  

बाजुओं पर कसा हुआ हाथ 
दबी ख़ामोशी के बदन पर से उतारता है कपड़े
वह अपने बल से उसकी देह पर लिखता है 
अपनी जीत की कहानी .... 
उस वक़्त वह वस्तु के सिवाय कुछ नहीं होती
सिर्फ एक जिन्दा जानदार वस्तु
 ज़िन्दगी भर गुलामी की परतों में जीती है मरती है
एक अधलिखि नज़्म की तरह 
ये दीवारों के पीछे की औरत  …… 


जब -जब वह टूटी है 

कितने ही जलते हुए अक्षर उगे हैं उसकी देह पर
जिन्हें पढ़ते हुए मेरे लफ़्ज़ सुलगने लगते हैँ
मैं उन अक्षरों को उठा -उठाकर  कागज पर रखती हूँ
बहुत लम्बी फ़ेहरिस्त दिखाई देती है

सदियों पुरानी लम्बी …
जहाँ बार -बार दबाया जाता रहा है उसे 
कुचला जाता रहा है उसकी संवेदनाओं को , 
खेल जाता रहा है उसकी भावनाओं से 
लूटी जाती रही है उसकी अस्मत 
अपनी मर्जी से 
एक बेटी को भी जन्म नहीं दे पाती 
दीवारों के पीछे की  औरत  …… 

साभार:गूगल इमेज


वह देखो  आसमां में ....

मेरी नज़्म के टुकड़े हवा मैं उड़ने लगे हैँ
घूँघट , थप्पड़ ,फुटपाथ , बाज़ार , चीख  , आंसू 
ये आग के रंग के अक्षर किसने रख दिए हैं मेरे कानोँ पर
अभी तो उस औरत की दास्ताँ सुननी बाकी है
जो अभी -अभी अपना गोश्त बेचकर आई है 
 एक बोतल शराब की खातिर अपने मर्द के लिये
अभी तो उस चाँद तारा की हँसी सुननी बाकी 
है जो अभी- अभी जायका बनकर आई है 
किसी अमीरजादे की बिस्तर की   .... 
तुमने कभी किसी झांझर की मौत देखी है ?
कभी चूड़ियों का कहकहा सुना है ?
कभी जर्द आँखों का सुर्ख राग सुना है ?
कभी देखना इन दीवारों के पीछे की औरत को 
जिसका हर ज़ख्म गवाही देगा
पल -पल राख़ होती उसकी देह का   …… 

अय औरत ! मैँ लिख रही हूँ
 दीवारों के पार की तेरी कहानी
गजरे के फूल से लेकर पैरों की ज़ंज़ीर तक
जहाँ तड़पती कोख का दर्द भी है
और ज़मीन पे बिछी औरत की चीख भी
ताबूतों में कैद हवाओं की सिसकियाँ भी हैं
और जले कपड़ों में घूमती रात की हँसीं भी
इससे पहले कि तेरे जिस्म के अक्षरों की आग राख़ हो जाये
मैं लिख देना चाहती हूँ आसमां की छाती पर 
''कि अय आसमां ! औरत तेरे घर की 
जागीर नहीं  … !!




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कहते हैं असली लेखन वेदना की गहराइयों से फूटता है...शब्द तो भीतर से आते दिमाग में गुजरते जुबान पर आते-आते संकोच से सिमट जाते या कलम की धार से शब्दों के प्रवाह में बह जाते हैं.  कविता का अंतः संसार अन्ततः स्त्री की अलक्षित पीड़ा का भाष्य है जहाँ से गुजरते हुये हर पाठक ठिठककर पढ़ने और सोचने को मजबूर हो सकता है,ऐसा ही कुछ कवयित्री की इस कविता को पढ़ते हुये ...देह और मन की उहापोह भावों के उमड़ने और पहुँचने से लेकर कई गहरे भावों। को अभिव्यक्त किया है जो काव्य संसार में तैरते जरूर नजर आते हैं लेकिन जीवन की सच्चाई से करीबी नाता रखते है।

कविता के जरिये देह के अलग-अलग अर्थों को कवयित्री ने सार्थक प्रयास किया है । तन मन और रिश्तों से टूटी हुई स्त्री का जब मौन टूटता है तो तमाम बाँध और बाँध के किनारे की बस्तियां बह जाती है सच के सैलाब में...! कवयित्री की इस कविता से गुजरते हुए यह महसूस हुआ कि एक मुकम्मल और सुगठित किस्सा सा पढ़ने को मिला है जिनमे पठनीयता और काव्य-रस तो अन्तरभुक्त है ही इसके साथ ही कविता यथार्थ का समूचापन अपनी गतानुगतित शृंखला में बंधी रहकर समय का एक गहन साक्षात्कार हमें कराती चलती है । यह कविता अपने पूरे समकाल का प्रामाणिक प्रतिनिधित्व करने में सामर्थ्य रखती है । इस कविता में पुरुष की सत्ता और स्त्री के दमन का सनातन इतिहास है। बहुतायत में देखा जाता है कि पुरुष बुद्धिजीवी स्त्री का सानिध्य और मैत्री तो चाहते हैं लेकिन  जीवन संगिनी बनने के बाद उसके व्यक्तित्व को खुरच-खुरच कर तानो आदि से विदीर्ण करने में ही सुख पाते हैं फिर शुरू होती है बन्दिशें ... 'सिर पर तलवार टाँग कर प्रेम नही पाया जा सकता क्यूंकि स्त्री के भीतर तब घृणा और जन्मती है और ऐसे में कवयित्री टँकार लगाती है...लिख देना चाहती है आसमां की छाती पर 'कि अय आसमां ! औरत तेरे घर की जागीर नही...!

रचनाकर्म में प्रस्तुत हुई अनुभूतियाँ ऐसी हैं जो अभिव्यक्ति की राह पा कर भी उद्दात और संयत है...!



इस तरह की मनोस्थिति में जाकर रचना करना बड़ा दुष्‍कर कार्य है, रचना लुभाती रही मोहती रही यह बात अलग है कि बहुत कुछ अनकहा सा आपने छोड़ दिया । कभी-कभी कविता का अर्थ नहीं निकालकर उसका बस रसास्‍वादन करना चाहिए, यह उसी तरह की रचना है, सादर और साधुवाद..!!

वसुंधरा पाण्डेय

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