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Saturday, May 13, 2017

#६# दिल की डायरी: मन्नत अरोड़ा

दिल की डायरी: मन्नत अरोड़ा 



बेटी स्कूल जाने लगी थी। तो सोचा कि दूसरे बच्चे के बारे में कुछ सोचते हैं पर बेटा ही भगवान् देगा इसका तो कुछ पक्का नहीं।तो या तो एबॉर्शन या फिर बेटा। अब एक और बेटी इस माहौल में। पर test करवाने पे बेटी होने का पता चला। डाक्टर से मैं पहले ही बात कर चुकी थी।पति यूँ ही पूछने लगा कि क्या मर्ज़ी है? मैंने कहा आगे पहले बेटी पे पूरा महीना सदमा ही नहीं गया था तुम्हारा अब जब पहले से ही पता चल गया है तो एक ऐसी जिंदगी को जन्म देना जिसे कोई चाहता ही नहीं,मेरे बस की बात नहीं। मुझे बाकी किसी की सोच का फर्क नहीं पड़ता था पर मेरे पति की सोच ही जब ऐसी थी।तो अकेले बस एक ही की जिम्मेवारी उठा सकती थी,दूसरा मैं इन सब के प्रभाव से बेटी को बचाना भी चाहती थी।

तो एबॉर्शन ही मेरा फैसला था जिसको किसी ने मना भी नहीं किया। अज़ीब था मेरी सास डॉक्टर से एबॉर्शन के बाद कन्फर्म कर रही थी कि बेटी ही थी या बेटा।तो डॉक्टर चिल्लाई कि हम भगवान् नहीं हैं।रिपोर्ट आप खुद लाए हो।हम दवाई पहले ही दे देते हैं।अब यह नहीं देखते कि बेटा था या बेटी।


मुझे रह-रह कर अपने कॉलेज के वो दिन याद आते जब मेरा पति रोज़-रोज़ मेरे पीछे आ जाया करता था जबकि मैं जानती ही नहीं थी कि कौन है। मुझे बस अपने रास्ते से मतलब होता था या कॉलेज से।पता नहीं कितनी बार मैंने अपना आने-जाने का वक़्त भी बदला। बात करना चाहता था।यूँ ही अजनबी से क्या बात करती मैं।फिर किसी सहेली से मैसेज भिजवाया।तो भी मैंने इंकार कर दिया।कॉलेज के रास्ते पे खुद का एक्सीडेंट ही करवा लिया कि मैं उसे देखने आ जाऊं।मैं नहीं गयी। आखिर एक दिन मैंने रुक के पूछा तो उसने कहा कि बहुत पसंद हो शादी करना चाहता हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि पसंद क्या है इसको। पूछा तो बोला कि तुम्हारी फैमिली के बारे में सब जानता हूँ। बस तुम हाँ कर दो। एक बार तो खून से लिख के तक दे दिया।
आखिर मैंने बिना कुछ ज्यादा सोचे कह दिया कि अगर मेरे पेरेंट्स को मंजूर होगा तो ठीक है। बाद में पता चला कि कितनी बार इसकी तरफ़ से रिश्ते की बात की गयी थी और पापा इंकार कर देते थे क्योंकि उनको कुछ इसकी फैमिली के बारे में सही सुनने को नहीं मिला था। पर फिर भी बार-2 इसकी तरफ से प्रपोजल आते जा रहे थे।बात मेरी माँ तक भी इसने पहुंचा दी थी कि बहुत प्यार करता है मुझे।माँ को पता नहीं क्या हो गया वो पापा को मनाने लग गयी कि फैमिली कैसी भी हो लड़का तो अच्छा है न।मुझे भी पूछने पर मैंने हाँ कह दिया था।

साभार: नांदीपाठ 


माँ को तो जितने भी रिश्ते आए सभी लड़के पसंद थे मेरे लिए। इसका भी पसंद आना कुछ हैरानी जैसा न था।
मैंने सोचा भी नहीँ था कि प्यार ऐसा होता है जिंदगी का।कुछ ऐसे जिंदगी गुज़रेगी मेरी।मंगनी के बाद से ही कुछ बर्ताव बदलता सा जा रहा था।हर रिक्वेस्ट हुकुम होता जा रहा था जिसे न मानने पे रवैया ही बदल जाता था और लहज़ा भी। मेरी इक हाँ मुझे यहाँ तक ले आएगी मालूम न था। अगर मेरी हाँ के बाद मुझे कोई पसंद आ भी गया तो भी मैंने इंकार नहीं किया इस शादी से क्योंकि मुझे तब लगा कि इक बेनाम चाहत के चलते इसके साथ ग़लत नहीं करना चाहिए। आज समझ नहीं आ रहा था कि इस शादी के पीछे इसका क्या मतलब छुपा रहा होगा। कुछ दिल समझ भी रहा है पर फ़िलहाल कुछ कहना नहीं चाहती।

बेटा तो कुछ पल का भी नहीं बन पाया मेरा पति पर हाँ जवायीं का गुरूर बस हाथ थामने की देर थी,पल में सिर पे सवार था। सब कुछ जानते हुए भी जवायीं को गलत भी तो नहीं कहा जा सकता।हिंदुस्तानियों की रीत जो ठहरी। यही हर माँ-बाप और भाइयों का सच भी है। बहुत कुछ जानते हुए भी मेरी माँ का यही कहना होता था।कि औरत को सब सहना ही पड़ता है।आदमी सब एक से ही होते हैं।तू अगर वापिस आई तो सब सवाल करेंगे,बातें बनाएंगे।कल को भाइयों के रिश्ते नहीं आते कि बहिन शादी के बाद भी घर पे बैठी है। बड़े ताया जी की बेटी भी घर वापिस आ गयी थी।ताया जी पता नहीं क्या कुछ दे चुके थे पर मांगें ही थमती नहीं थी।आखिर एक बेटी के साथ मायके वापिस आ गयी थी।वो शायद मेरे से भी ज्यादा बुरे हालातों से गुजरी थी। मेरी माँ को अब यह भी था कि लोग क्या कहेंगे कि इनके घर की बेटियां ससुराल में टिकती ही नहीं। कूड़ा माँ-बहनों के रूप में सब को कबूल है।रात भी कूड़े के बिना नहीं कटती पर बेटी के रूप में कूड़ा नहीं चाहिए किसी को भी।यही हमारे समाज की कहानी है।

जरूरतों का पूरा होना ही प्यार है शायद।


एबॉर्शन के लगभग एक साल बाद फिर से उसी मोड़ पे थी।इस बार टेस्ट करवाने पे बेटा होने का पता चला।
मुझे सुकूँ था कि फिर से एबॉर्शन करवाने नहीं जाना पड़ेगा। बाकी पति और सास बहुत खुश कि बेटा आने वाला है।एक दम से मुझे क्या अच्छा लगता है और क्या नहीं सब कुछ जादू सा पता चल गया था जैसे;जिनका मुझे लगता भी नहीं था कि कुछ ध्यान भी होगा इनको।यानी मेरा बहुत ख़्याल रखा जाने लगा था।मैं किसी बात से भी परेशां न हूँ।इसका भी ख़्याल था। चलो वक़्त आने पे बेटा भी आ गया। वैसे भी मेरी सास को मेरे से कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि उनको अगर घर अपनी मर्ज़ी से चलाना था तो मुझे कोई ऐतराज़ नहीं था।सारे काम या हर छोटा-बड़ा फैसला वोही लेती थी।मेरे गहने मायके और ससुराल दोनों के सब उन्हीं के पास थे क्योंकि उनको अच्छा लगता था कि पूछ के लूँ और उन्हीं को दूँ।सो मेरा-तेरा था नहीं हम लोगों में।उनको मेरा साथ अच्छा लगता था।

बस इसी वजह से कहीं वो जो कुछ उनके पास था कहीं मुझे न दे दें दोनों बेटियों और बड़े बेटे-बहु में टेंशन थी।
मेरा बड़ा भाई भी तब तक वकालत कर चुका था तो यह भी था उन सब को कि सब अपने नाम करवा लेगी यह। वक़्त के साथ-2 बड़ी बेटी और सास के बीच झगड़े भी बड़ने लगे।बात ज्यादा बड़ने पे सास ने उसको बुलाना भी छोड़ दिया। जेठ-जेठानी जो बुआ-सासों के चले जाने से अकेला सा महसूस कर रहे थे।अब बड़ी बहिन भी उनकी पार्टी में थी।

मेरे आगे जिंदगी जैसे एक कड़वी सच्चाई के रूप और आने बाकी थे।शायद तभी कोई किताब पढ़ नहीं पाती अब।किताबी बातों पे विश्वास नहीं रहा। बड़ी को देख छोटी कहीं किसी बात में पीछे न रह जाए–अब माँ को छोड़ बड़े भाई की प्यारी बन गयी। माँ को यह सब देख के बहुत दुःख होता था पर क्या किया जाए।वो बीमार भी रहने लगी थी। काफ़ी बीमार रहने पे डॉक्टर ने लास्ट स्टेज कैंसर बताया। ज्यादा वक़्त नहीं था उनके पास।बस इलाज ही था। सभी रिश्तेदार ख़बर लेने आते रहते थे। आखिर बड़ा बेटा-बहु,बड़ी और छोटी बेटी भी आने लगे।काफ़ी माफियों के बाद कि वो बहुत प्यार करते है माँ से।रात-दिन बारी-2 माँ के आस-पास ही रहने लगे।

माँ खुश भी थी पर कभी कभार मुझे यह भी पूछती थी कि यह आ तो जाते हैं पर मुझसे मेरी सब चीजों को बांटने के बारे में क्यों कहते रहते हैं।मैंने भी कहा कि सबको एक साथ बैठाकर जिसको भी जिनके बच्चों का जो-जो देना है आप दे दो।नहीं तो मेरे को सब खा गयी कहेंगे।पर उनका कहना होता था कि मेरे बच्चे ऐसे नहीं हैं।तू बेकार में परेशान होती है।


जाने क्यों मुझे सब नाटक सा लग रहा था।समझने वाला कोई था नहीं तो पति से इतना कहा कि मेरे गहने बैंक लाकर में हैं तो बस चाबी अपने पास रख ले माँ से लेकर।और सारे कानूनी कागज़ separation और बाकी प्रॉपर्टी के पूरे कर ले।अगर कोई हस्ताक्षर किसी का रह गया हो तो करवा ले क्योंकि मुझे आगे आने वाले वक़्त से डर लग रहा है।

(क्रमशः)

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