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Thursday, June 22, 2017

#33# साप्ताहिक चयन 'कविता की खोज में' / अभिषेक आर्जव



कविता की खोज में 
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जिस दिन सब कुछ अच्छा रहता है
उस दिन नहीं जन्मती कोई कविता ।



जैसे कल रात जल्दी सोया मैं
और सुबह ही मां ने जगाया ।
पूरे दिन सब कुछ वैसे ही चलता रहा
कक्षाएं, बेमतलब की पढ़ाई, दोस्त और भटकनें ।
नहीं जन्मी कोई कविता ।

जबकि कल के उस दिन में
जिसमें सब ठीक ठाक गुजर गया !
पूरे दिन जगह जगह , यहां वहां
खोजता रहा मैं कोई कविता ।

हरे सूखे बड़े छोटॆ,हर पेड़ की
डाल डाल देख डाली मैंने
कि शायद बूढ़े -से आम की किसी डण्ठल पर
धीरे धीरे कहीं जाती लाल चूंटों की
एक तल्‍लीन पंक्ति दिख जाय
अथवा
निकम्‍मे-से ऊंचे ताड़ के झुरमुट में बया के घोंसले सी टंगी
कहीं मिल जाय कोई कविता ।

बहुत देर तक टहलता देखता रहा मैं
दिन ब दिन तेज होते घाम में बड़ी बेरहमी से
खुरदुरी शुष्क निर्विकार रस्सी पर फैला दिये गये
जमकर धुले, चोट से कराहते ,साफ साफ,
कपड़ों को सूखते ।

पहुंचा मैं ऊंचे-से टीले के उस
पीछे वाले पीपर डीह पर भी ,
कि शायद आज भी कोई
अपनी अधूरी चाह की तड़पन का एक धागा
फिर लपेट गया हो वहां!

रास्ते में लौटते वक्त कहीं पर
कुंई कुंई करते , पीछे दौड़ते आ रहे
सफेद प्यारे गन्दे पिल्ले को थोड़ी देर रुककर
सहलाया भी , और चोर है कि साव ,
जांचने के लिये उसके कान भी खीचें ।

छत पर हल्का सा झुक आये आम के पेड़ में
गंदले धूलसने अनुभवी और निरीह-से पल्लव की एक पत्‍ती तोड़
उसकी पतली -सी डण्ठल को ऊंगलियों से पोछ
खूब मन से (मैंने) उसे कुटका भी
और उसके हल्के कसैले स्वाद को
थोड़ी देर तक चुभलाया भी ।

शाम को लंकेटिंग* के दौरान
अमर बुक स्टाल के ठीक सामने
ठेले पर सजने वाली चाय की दुकान पर
पांच रुपये वाली इस्पेसल चाय की छोटी सी गरम डिबिया थामें
पास ही में जमीन पर लगभग ड़ेढ फूट चौड़ी ,
सड़क के पूरे किनारे को अपनी बपौती -सी समझती हुयी
खूब दूर तक बड़े आराम से पसरी
लबालब कीच व तरह तरह के कचरे से अटी पड़ी ,
बस्साती गन्दी नाली में एक ओर
आधे डूबे , फूले , मटमैले पराग दूध के खाली पैकेट और
उस पर सिर टिका कर सोये -से
अण्डे के अभी भी कुछ कुछ सफेद छिलकों को
खड़े खडे़ कुछ समय तक घूरता भी रहा (मै ) ।


लेकिन . . . .. .
अन्ततः नहीं जन्मी कोई कविता
क्योंकि जिस दिन सब कुछ अच्छा रहता है
उस दिन नहीं जन्मती कोई कविता ।

(इसके अलावा , इस खोज में )


बहुत देर तक नीलू के साथ
घूमता रहा (मैं) आईपी माल में ।
मैक डोनाल्ड में पिज्जा खाते ,
थर्ड फ्‍लोर के हाल टू में गजनी देखते
भीतर के गीले अंधेरों में,
सच में प्रेम करने वालों की तरह ही
हमने एक दूसरे को महसूस भी किया
और इण्टरवल में नेस्कफे के काउण्टर पर
एक दूसरे से सचमुच में यह बतियाते रहे कि
यहां तीस रुपये में कितनी बेकार काफी मिल रही है
जबकि कैम्पस में वीटी पर दस में ही कितनी अच्छी मिल जाती है ।

लेकिन . . .. .
आखिरकार. . .. नहीं जन्मी कोई कविता
क्योंकि जिस दिन सब कुछ अच्छा रहता है
उस दिन नहीं जन्मती कोई कविता ।


 


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'जहाँ ना पहुंचे रवि, वहाँ भी पहुंचे कवि' , बचपन से यह पंक्ति सुनता आ रहा हूँ l बहुधा व्यंग में अथवा अभिधा में l अर्थ बेहद धीरे धीरे खुलते हैं, कई बार तो बेहद सहज समझे जाने वाले शब्दों के युग्म अपने भीतर बड़े गहरे आस्वादन समाये होते हैं l ज़िन्दगी में जितने गहरे हम उतरे होते हैं, शब्दों के मायने तह दर तह उतने ही उधड़ते जाते हैं l कविता यों तो सहज है विधा है पर सहजता यों कुछ सहज नहीं l इस सप्ताह नवोत्पल की कविता की खोज जिस कविता पर आकर रुकी उसका शीर्षक ही 'कविता की खोज में ' है l अभिषेक आर्जव नवोत्पल के पुराने संगी हैं और आप भारतीय संसद में कार्यरत हैं l भाषा-शब्दों-अर्थों-बिम्बों-ध्वनियों से आपका परिचय तकनीकी भी है और आपमें उन्हें लेकर एक मोहक संजीदगी भी है l 

कविता का शीर्षक ' कविता की खोज में ' है और यह एक अनायास उन्वान नहीं है l कवि की पहली चुनौती उस विषय की खोज होती है जिसपर कविता लिखी जानी चाहिए l जिस समाज में यह खोज कठिन होने लगे तो उसका आशय जरुरी नहीं कि सकारात्मक हो l चुनौतियों भरे देश काल सामाजिक परिस्थितियों में यह स्वाभाविक है कि कविता नित नए नवीन विषय से बारम्बार उपजती रहे किन्तु ऐसी स्थिति उस समाज में भी हो सकती है जहाँ एक तरह की इनर्शिया घर कर गयी हो l जहाँ कुछ अब ना हो पाना नियति मालूम पड़ती हो l कुछ ना हो पाने की स्थिति अभी कन्फर्म नहीं है क्योंकि कविता लिखी जा रही है...पर शीर्षक कहता है कि कविता खोजनी पड़ रही है l यह स्थिति मोंटेल की उपरोक्त उक्ति के उलट है जिसमें कविता खुदबखुद उनके पास टहलते हुए आ जाती है छमछम l ज़ाहिर है कवि उन परिस्थितियों में है जहाँ सब कुछ ठहरा सा सामान्य दिखता है पर कवि उस ठहराव तक पहुँच ही जाता है l 

हाँ; 'जिस दिन सब कुछ अच्छा रहता है, उस दिन नहीं जन्मती कविता '! जरुरत ही कहाँ बचती है कविता की, फिर l अच्छे दिनों में तो गीत गाये जाते हैं, शासकों के लिए लोरियां गुथी जाती हैं मालाओं में l शासक चाहते हैं कि कविता ना लिखी जाए, क्योंकि वह खरीद-फरोख्त का शिकार नहीं बनती आसानी से l कविता को 'पॉलिटिकली करेक्ट ' नहीं होना होता l उसे किसी सुयोग-दुर्योग की चिंता नहीं होती सो उसे कोई योग नहीं साधना पड़ता l कवि कहता है कि वह कल रात जल्दी सो गया, कुछ जागने को ना हो जैसे या समझ आया हो कि जागने का कोई फायदा ना हो अब, तो जल्दी सोया l दिन प्रकट हुआ और गुजरता रहा l कुछ अब खटकता नहीं, कहाँ से आयेगी कविता l 

कविता की यह तलाश उसे आसपास टटोलने को मजबूर करती है तो अरसे बाद नज़र पड़ती है दरख्तों और पत्तों से लदे-फदे डालियों पर l हर पल प्राणवायु खींचने वाले हम कृतघ्न, इन बेजुबानों को देखते तो हैं पर नज़र ठहरती कहाँ हैं कभी उनपर, फिसलती जाती है लोभी मन के ईशारों पर l ध्यान इतना सहज नहीं l पर कविता की खोज अपने आप में एक आँख खोल देने वाली प्रक्रिया है l हमने आसपास को महसूसना कुछ इस कदर छोड़ दिया है कि कवि कहता है कि लाल चीटियों की एकसार कतार और बया के लटकते घोंसले जैसे अब नहीं मिलते अक्सर, वैसे ही कविता भी उगने का नाम नहीं ले रही l 

लगभग रोज ही उजला दिखने की चाहत से मजबूर रस्सियों से लटके धुले गीले कपड़ों को देखकर भी नहीं आती मन में कोई कविता l कविता क्यों आयेगी आखिर, वह श्वेत और श्याम दोनों को समेटती है और यहाँ बस सफेदी की हवस है l कभी लोग मन का चाहा के लिए ही सही, धागा बाँध पीपल से बतिया लेते थे...चलकर देखा वहां भी और वापसी में आवारा पिल्ले को सहलाया भी, पर यहाँ भी नहीं कौंधी कोई कविता l 

बाजार आम बोतलों में पहुंचाता है जब तब, पर अपने ही छत के आम से मिले कैसे इतना अरसा हो गया l और कविता की खोज में इक पत्ती की डंठल को चखा भी, महसूस किया उसका वही कसैला पर महकता स्वाद...पर अफ़सोस यहाँ भी कविता के शाखों पर बौर आने से रहे l यहाँ-वहां ऐवें ही घूमते हुए भी नहीं आयी कोई कविता जबकि दिखे कवि को बुक स्टॉल के सामने की चाय की दूकान के सामने बिखरे कई दृश्य भी l 

अंततः बाजार के मॉडर्न अवतार मॉल में वही सब कुछ किया जो बाकी करने जाते हैं पर कितना अजीब है और क्यों ऐसा है कि नहीं आयी कोई कविता ...?

अद्भुत...आर्जव अद्भुत !!!


डॉ. श्रीश 

8 comments:

  1. ....बहुत खूब!!!!

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  2. श्याम जुनेजा4:43 PM, June 21, 2010

    अभिषेक जी ! भई बहुत सुन्दर रहा आपका यह सफर ..कविता सा ही कविता की तलाश में.. "निकम्‍मे-से ऊंचे ताड़ के झुरमुट में बया के घोंसले सी टंगी कहीं मिल जाय कोई कविता... शायद आज भी कोई अपनी अधूरी चाह की तड़पन का एक धागा फिर लपेट गया हो वहां!"
    खूब ऊंची उड़ान भरते हैं आप .. वधाई !

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  3. क्या खूब लिखा है भाई..सच में मजा आ गया..इतना सरल और इतना प्रवाह...भई मै तो फैन हो गया आपका..शानदार लेखनी "आर्जव"...बेहद ही शानदार..!

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  4. "जिस दिन सब कुछ अच्छा रहता है
    उस दिन नहीं जन्मती कोई कविता ।"

    वाकई अभिषेक..पर देखो तुमने कैसे करीने से कविता उकेर ली..!

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  5. Beautiful creation !

    Badhaii.

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  8. अभिषेक जी आपकी कविता पढ़ते पढ़ते रघुवीर सहाय जी की एक कविता याद आ गई ।

    आज फिर शुरू हुआ जीवन

    आज मैंने एक छोटी-सी सरल-सी कविता पढ़ी
    आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा

    जी भर आज मैंने शीतल जल से स्नान किया

    आज एक छोटी-सी बच्ची आयी,किलक मेरे कन्धे चढ़ी
    आज मैंने आदि से अन्त तक पूरा गान किया

    आज फिर जीवन शुरू हुआ।
    यहाँ इस कविता में कवि अपने जीवन के छोटे छोटे क्षणों में भी कविता ढूँढ लेता है ।
    इधर कवि अपने जीवन से बाहर निकल समाज में कविता ढूँढता और जब सब कुछ उसके साथ अच्छा घटता है तो आख़िरकार नहीं ही जन्मती कविता । कविता का सबसे पार्ट कवि जिस जीवन में जाता शब्द भी वैसे ही चुनता है ।
    काफी दिनों बाद किसी बहोत अच्छी कविता से रूबरू होने का मौका मिला धन्यवाद अभिषेक जी एक अच्छी कविता से परिचय करने के लिए ।

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