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Thursday, July 27, 2017

#38 # साप्ताहिक चयन '‘पिता..! " / कल्पना झा


कल्पना झा 
बोर्ड की परीक्षा से माह पहले से ही टीवी देखने और मोबाइल पर पाबंदी लगा देने वाला पिता जो बहुत क्रूर दिखाई देता था,  न जाने क्यूँ रिज़ल्ट से तीन-चार   दिन पहले से ही बड़ा निर्लिप्त दिखाई देने लगता है जैसे उसे पड़ी ही न हो कि बच्चे का परीक्षा परिणाम क्या होगा ।  फिर एकाएक वही पिता रिज़ल्ट मे बहुत अच्छे मार्क्स मिलने पर झूमता है  नाचने लगता है और पूरी कॉलोनी को मिठाइयाँ खिलाता है। ये पिता आखिर ऐसा क्यूँ होता है ??? ये हमें समझ मे क्यूँ नहीं आता ??? ख़ैर ये तो बहुत साधारण उदाहरण था इससे कहीं अधिक गंभीर कविता 'पिता'  इस सप्ताह साप्ताहिक चयन के रूप में नवोत्पल सम्पादकीय समूह द्वारा चयनित की गयी  है जिसे लिखा है युवा रचनाकार कल्पना झा जी ने । प्रतिष्ठित प्रेसीडेंसी कॉलेज और कलकत्ता विश्वविद्यालय   से शिक्षित कल्पना झा जी पेशे से अनुवादक हैं आप रंगमंच कि मंझी  हुई अदाकार हैं  और संगीत में  आप कि विशेष रुचि है।  इस महत्वपूर्ण कविता पर अपनी सम्मत टिप्पणी देने का  अनुरोध स्वीकार किया है श्री सुरेन सिंह जी ने। आप श्रम प्रवर्तन विभाग में वरिष्ठ अधिकारी हैं पर मन रमता है शब्दों और उनके अनगिन अठखेलियों में। सुरेन जी ने कविता को अपनी दृष्टि से परखा है और सम्यक आलोचना की है। आइये देखते हैं यह समानांतर आयोजन !
                                                                                                                                 (डॉ. गौरव कबीर )

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गूगल इमेज 

पिता

नाटक खत्म हो चुका है
और मंच पर उस नाटक का एकमात्र पात्र खड़ा है
दर्शक ताली नहीं बजा रहे
हँस रहे हैं उस पर
लानत भेज रहे हैं
आँखों के इशारे से, उंगलियों के निशाने से
उसकी इज़्ज़त की बोटी बोटी नोच रहे हैं
खड़ा है वह सब देखते सुनते हुए
भागता नहीं कहीं
डटा रहता है
वह एक पराजित पिता है
पड़ोस में गुड्डे गुड़ियों के ब्याह की रौनक है
अपने घर फाकाकशी है
उसे कमरे के चारों तरफ कमीज की फटी हुई जेबें लटकती दिखती हैं
खाली संदूक उड़ते हैं हवा में
अनगिनत दरवाज़े दिखते हैं बाहर निकलने को
सब बंद
दिखती हैं संतानें
जो उम्र से पहले बुढ़ा जायेंगी
उसे बहुत सी आँखों के नीचे काले घेरे दिखते हैं
सूखे होठों की पपड़ियाँ चुभती हैं
रसोई में डब्बे भड़भड़ा कर गिरते हैं
उनका ख़ालीपन धक से सीने में धंस जाता है
बच्चे फिर भी भागते हैं उस ओर
कि कहीं किसी डब्बे से कुछ दाने निकल आएं
तो उसीन लिया जाये
कोई भरा डब्बा छूट गया हो कहीं
उसे कलाई में एक चूड़ी डाले एक औरत दिखती है
पूरी आस्था से वृहस्पतिवार व्रत कथा कहती हुई
कि गुरु भगवान सुंदर थाल में पीला भोजन लेकर आयेंगे
तो बच्चे अपना जन्मदिन मनायेंगे
वह सिर्फ आँख और कान बन जाता है
पराजित पिता धीरे धीरे काठ हो जाता है
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[ कल्पना झा ]

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सुरेन सिंह

कल्पना जी की कविताएं फेसबुक पर पढ़ता रहा हूँ । इन कविताओं में एक कवि का अपनी पृष्ठभूमि से जुड़ाव और उस जुड़ाव में कविमन कैसे अपनी पूरी सराउंडिंग को जोड़ता चलता है और   अपनी पृष्ठभूमि से काव्य में जो ऍप्लिकेबिलिटी लाता है उसे पाठक तक इस भांति सम्प्रेषित करता है कि उसके मन मे चित्र दर चित्र बनता जाए । 


आज प्रस्तुत कविता में हिंदी कविता का एक बहुप्रयुक्त बिंम्ब पिता को लिया गया है । पिता शब्द के साहचर्य से जितने भी मानक पिता को लेकर हमारी सामूहिक चेतना में है वो तैर जाते है ... जैसे पिता कहते ही एक शक्ति और पुरुषार्थ से भरा हुआ पुंज जो हमेशा सरमायेदार होने के साथ साथ हमारा फ्रेंड फिलॉस्फर गाइड तो है ही एक असुरक्षा भाव को सुरक्षा भाव मे बदलने वाला नॉस्टैल्जिक सा प्राणी भी है पर यहां कवि किसी घिसे पिटे नॉस्टेलगिया में नही बल्कि परिदृश्य के  बीच से एक काठ होते जा रहे पिता को पाठक के बीच इस भांति रखता है कि पाठक भी पाता है कि उसका मन तर्क से खाली हो गया है और वहां बस कुछ चित्र बन बिगड़ रहे है पिता के ... ।


 इस कविता को पढ़ने पर अनायास ही दो  तीन कविताएं याद आती है । एक है नागार्जुन की अकाल  और उसके बाद , दूसरी है कुमार विकल की पिता पर लिखी कविता तथा रघुवीर सहाय की -  दे दिया जाता हूँ । 

नागार्जुन की कविता में  अकाल में भी एक उम्मीद रहती है और वह जीवन मे उल्लास के न चुकने को पाठक मन पर अंकन करती है वही इस कविता में अकाल जैसे हालात में उम्मीद एक भ्रम है । आस्था पर यथार्थ हावी है । यह व्यवस्था से पूरी तरह पराजित हो चुके पर हार न मानने वाले पिता की दास्तान है  । जिसमे उम्र से पहले बूढ़ी होती संताने ,रसोई के खाली डिब्बों की भड़भड़ाहट और  बचे हुए दाने उसीनने की आकांक्षा ...  इन सब के बीच वो शख्स जो एक व्यक्ति होने के साथ ही  पिता भी है वह अपना पितृत्व किस भांति इस दुनिया मे बचाये रखे । जिस तरह से उसके औसत होने के संत्रास ने उसके पितृत्व पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है  वो प्रकिया केवल दारुण ही नही पाठक के लिए एक वैचारिक झनझनाहट भी छोड़ जाती है ।



अब इसी क्रम में याद आते है  कुमार विकल ,वह  कहते है  -- 

"पिता तुम्हारा शाप तो स्वीकार है 

लेकिन मेरी पराजय तुम्हारी भी हार है 

तुम्हारे  जल स्रोतों की अपनी सीमायें थी 

उनमे केवल एक उथली नदी की संभावनाएं थी"
      
 यहां कवि उस पिता की ओर से कह रहा है जिसकी केवल एक उथली नदी की सम्भवनाएं ही थी । उस उथली नदी की संभावना वाले व्यक्ति के पितृत्व को उसका परिदृश्य जब अप्रासंगिक घोषित कर देता है तब भी वह अपने मूल्यों के लिए लड़ता प्रतीत होता है ।  यही प्रतीति पाठक के लिए भी मूल्य रखती है । 


इसी तरह यह वही पिता है जिसे देखकर रघुवीर सहाय कहते है -- 
.......
"और ज़िन्दगी के अन्तिम दिनों में काम करते हुए बाप

काँपती साइकिलों पर

भीड़ में से रास्ता निकालकर ले जाते हैं

तब मेरी देखती हुई आँखें प्रार्थना करती हैं

और जब वापस आती हैं अपने शरीर में, तब वह दिया जा

चुका होता है।"
     

तो कवि यहां उस पिता का दृश्य खींचता है जो लोकतंत्र के नायकों के द्वारा लूट कर हाशिये पर धकेल दिया गया है । वह पिता अपने औसत होने के उत्सव को पूरी सराउंडिंग द्वारा मनाए जाने को देख सुन रहा है साथ ही  व्यवस्था के स्याह पक्ष में भी अपनी न्याय पाने की जो आकांक्षा है उसे नही मरने दे रहा है  , भले ही सम्वेदनाओं के क्षरण के इस काल मे वो काठ समान होता जा रहा हो । 


अंततः इस कविता पर यही कहना चाहूंगा कि कवि अपने रंगकर्म के वितान को जब पाठक तक काव्य में ले कर आता है तो उसके पास अपने माध्यम की वायबिलिटी  को एक्सटेंड करने का अवसर होता है और कल्पना जी ने उस अवसर का अच्छे से उपयोग किया है । शास्त्रीय तरीके से देखे तो काव्य का लोच और लय थोड़ी कम है और बिम्बों बरतने की सलाहियत में एक अनगढ़ता सी है  । आने वाले समय में और निखार आएगा यह पाठक उम्मीद कर सकता है । 
                                                                                                                               [सुरेन सिंह]

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