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Thursday, August 10, 2017

#40# साप्ताहिक चयन 'आस' / प्रदीप कुमार '

प्रदीप कुमार
युवा कवि प्रदीप कुमार एक सहज सहृदय कवि हैं l आपकी कवितायेँ बड़ी ही सरलता से जीवन राग सुनाती हैं l नवोत्पल साप्ताहिक चयन की इस प्रविष्टि पर अपना अभिमत दे रहे हैं श्री अमित कुमार श्रीवास्तव 'बेइंतिहा ' जी l 'बेइंतिहा ' जी उम्दा कलमकार हैं और बैंक की उठापठक के बीचोबीच साहित्य सुर साध ही लेते हैं l आप नवोत्पल के पुराने संगी हैं l 

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 आस

जानती हो सहेली
ज़िन्दगी बोझ है
वैसे ही जैसे किरणें होती हैं
सूरज पर बोझ
वो बिखेर देता है
जैसे रात होती है
शाम पर बोझ 
सुबह अकेला छोड़ देती है
जैसे प्यार होता है
मन पर बोझ
अधूरा ही रहता है
संग छोड़ देता है
जैसे खुशबू बोझ होती है
फूलों पर
हमेशा साथ नहीं रहती
इंसान इसी सफर में है
कुछ बोझ,कुछ संग
कुछ बिछड़न
डॉ. गौरव कबीर: CellClicks

देखा है ना विरान पटरियां
वैसी ही है ज़िन्दगी
आगे भी कोई नहीं
पीछे भी
लेकिन जिम्मेदारी के
बोझ से लदी हुई
जैसे पटरी पर मंज़िल का बोझ
सोचा है कभी
क्यों ढो रहे हैं
खून के आंसू रो रहे हैं
क्यों कि आस कभी नहीं मरती
दुःख के इस पार भी
और उस पार भी
हाँ सच में 
सब अच्छा हो जायेगा
जरूर अच्छा हो जायेगा

8 अगस्त 2017





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कवि क्या है सृजनकर्ता , रचता रहता है शब्दों के नए मायने ,उकेरता रहता है नयी आकृतियाँ , तब्दील करता है कल्पनाओं को यथार्थ में ,अपनी लेखनी से अनवरत पैदा करता है विश्वास और गढ़ देता है एक “आस”...!

प्रदीप भाई ने अपनी इस कविता के माध्यम से आस को कुछ यूँ ही उकेरा है |

जिन्दगी के मायने बोझ से सदा ही बोझिल नही होते , हाँ बोझ को जिम्मेदारी समझ नि:स्वार्थ निर्वहन करना असल मायने में जीजीविषा को परिभाषित करता है | क्या सबमे होता है इतना सामर्थ्य कि वे उठा लें जिम्मेदारियाँ ....प्यार की ,नैतिकता की, सदाचार की ,मंजिलों तक धैर्य की , समर्पण और त्याग की, समरसता की और ना जाने कितने अप्रत्याशित वेदनाओं की ...!

शायद “आस” और इस आस से जुड़े विश्वास से ही संभव हो पता है इन बोझों का उचित निर्वहन |


एक अनमोल एहसास “प्यार’ पर प्रदीप जी ने कहा है कि

“जैसे प्यार होता है

मन पर बोझ

अधूरा ही रहता है

संग छोड़ देता है"



हाँ सच है कि प्यार अक्सर अधूरा ही रह जाता है पर

प्यार अधूरा रहता है पूरा होने की आस में, रहता है सदा के लिए जिंदा किसी के जेहन में और फिर इसी आस के सहारे पनपता रहता है प्यार का उन्स दोनों तरफ़

कविता में एक तरफ बोझ के कारण फूलों का खुशबू से त्याग है तो वहीं दूसरी तरफ वीरान पटरियों की मानिंद जिन्दगी का विश्लेषण जो कहती है कि अंतहीन सामानांतर पटरियों सा जीवन अनन्त ज़िम्मेदारियों और पटरी पर मंजिल का बोझ लिए हुए अथक प्रयासरत है |

पर बोझ का बोझ भी कम हो सकता है जैसे कवि ने कहा कि बस एक आस जिन्दा हो | मेरी राय में कुछ यूँ ही...


“अँधेरा तो सिर्फ देहरी पर है

उस पार है उमीदों और उजास की पूरी दुनिया

अँधेरा तो सिर्फ देहरी पर है"



जैसे प्रदीप भाई कहते हैं-

दुःख के इस पार भी
और उस पार भी
आस कभी नहीं मरती

सब जरूर अच्छा हो जायेगा.

अमित श्रीवास्तव "बेइंतहा"



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