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Tuesday, August 8, 2017

डेढ़ इश्किया .......नारी का डेढ़ विमर्श


 श्री सुरेन सिंह श्रम प्रवर्तन विभाग में वरिष्ठ अधिकारी हैं पर मन रमता है कला और साहित्य  में। थोड़ी देर से    ही सही पर फिल्म डेढ़ इश्किया पर  लिखी उन  की ये  समीक्षा पढ़ने योग्य  है ।  

[मॉडरेटर]


कल शाम विशाल भरद्वाज और अभिषेक चौबे की ‘डेढ़ इश्किया’ देखी .फिल्म बेहतरीन लगी .फिल्म निस्संदेह ‘इश्किया ‘ से डेढ़ गुना ही सिद्ध होती है नारी विमर्श को व्यापकता प्रदान करती हुई जिसमे स्त्री अपना त्राण पति ..प्रेमी से आगे बढ़ कर निज़ स्वतंत्रता के नये आयाम रचती है अपने होने को अपने... अस्तित्व को सेलिब्रेट करते हुए ....स्वतंत्रता को सही सही पहचानते हुए .....और उसे प्राप्त करने हेतु छल –प्रपंच रचती हुई .....सभी प्रकार के मिथ्या भ्रम और शारीरिक ग्लानियो से मुक्त ....स्त्री से मनुष्य बननेकी दिशा में अग्रसर निरन्तर .    स्त्री ,  पुरुष को अपने  मनोरथ  के  लिए  औजार /टूल बना सकती है वो भी परंपरागत भूमिकाओं से परे जाते हुए . ये फिल्म महेश भट्ट की ‘अर्थ’ से दो कदम आगे जाती है . ‘अर्थ’ में नायिका पति और प्रेमी के परंपरागत द्वैत से इतर मार्ग का चुनाव करती है जबकि ‘डेढ़ इश्किया’ में नायिका—द्वय (माधुरी-हुमा) का चुनाव पूर्व नियोजित और निर्धारित है बस उसे प्राप्त करने का मार्ग उसकी स्वतंत्रता है और इस साध्य में पुरुष –द्वय (नसीर-अरशद ) साधन मात्र है । 

और इसी के साथ शायद हमारा सिनेमा थोडा आधुनिक हो चला है चालीस पार की नायिकाओ की स्वीकार्यता की ओर ...निस्संदेह ऐसे सिनेमा  नारी विमर्श को अपने ही तरह से रच रहे है .......रच रहे है ..ये बदलाव की बयार ही हमारे समाज को नयी दिशा देगा साथ ही ऐसी महिलाओ के विचारो को भी हजम कर पायेगा जो पुरुषों को प्यार और सेक्स के अंतर को समझा पायें .......और पुरुषो का मुंह खुला का खुला ही रह जाये ऐसा होता देखना मनोरंजक तो है ही सशक्तिकरण का एक सबक भी है .


फिल्म के सिनेमाटोग्राफी जबरदस्त हैं। रंगों का संयोजन और लाइट्स का बेहतरीन उपयोग फिल्म में देखने को मिलता है। विशाल भारद्वाज का संगीत और गुलजार के लिखे गीत बेहतरीन  हैं। 'दिल का मिजाज इश्किया', 'जगावे सारी रैना', 'हमारी अटरिया' जैसे गीत  पसंद आएंगे, फिल्म में बशीर बद्र साहब की शायरी मन को खुश करती है  । विशाल भारद्वाज के संवाद कैरेक्टर्स के मिजाज के अनुरूप हैं। गालियों के साथ-साथ दिल को सुकून देने वाले शब्द भी सुनने को मिलते हैं।विभिन्न ठुमरियों के माध्यम से एक काल  को जो रचा है ..विशाल ने वो नवाबी संस्कृति को एक शास्त्रीयता प्रदान करता है . एक दृश्य जिसमे बेगम पारा (माधुरी )बिरजू महाराज निर्देशित नृत्य में स्वयं को खोजती है और अपना वजूद रीक्लैम करती है .....असर पैदा करता है   . क्लाइमेक्स में बेगम अख्तर का ...”.वो जो हममे तुममे प्यार था तुम्हे याद  हो  के न याद हो” के बैकग्राउंड स्कोर के साथ  .....और सभी पात्रों का अपने बेसिक करैक्टर में लौटते हुए अपने अपने प्रिय को बचाते हुए , हिसाब चुकाते हुए ...गोलियों की धाय  धायं .......पूरी  फिल्म को अपने ऊपर लाद कर ऊँचाई दे देता है . 
मैं तो दोस्तों को  इस फिल्म को देखने का इसरार करूँगा     ...........
                                                                                                                                 [सुरेन सिंह]

सुरेन सिंह


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