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Tuesday, February 28, 2017

#The_Gazi_Attack...पद्माकर द्विवेदी


बॉलीवुड में साइंस फिक्शन की फिल्में शायद ही बनती हैं, इसलिए गाज़ी अटैक को हम एक अच्छी कोशिश कह सकते हैं।
Loosely द गाज़ी अटैक इंडो-पाक वॉर पर बेस्ड है।फ़ैक्ट और फ़िक्शन की इस मूवी में दिखाया गया कि भारत -पाकिस्तान के बीच 1971 के युद्ध के ठीक पहले पाकिस्तान के बेहद मज़बूत और ख़तरनाक सबमरीन गाज़ी को भारतीय नौसेना के INS राजपूत ने अटैक कर डुबो दिया होता है।लेकिन ऐसा बहुत कुछ है जो मूवी में नहीं दिखाया गया है।इसमें 92 पाकिस्तानी सैनिक शहीद हुए ऐसा कहा जाता है।लेकिन युद्ध इतिहासकारों ने इस बात पर हमेशा से संदेह प्रकट किया और अब सामान्यत: यह माना जाता है कि वास्तव में गाज़ी को भारतीय नौसेना ने नही डुबोया बल्कि वह खुद अपनी ही तकनीकी दिक्कत(हाइड्रोजन एक्सप्लोजन)या अपने ही बिछाए माइंस में उलझकर दफ़न हो गया।ये सबमरीन पाकिस्तान को अमरीका ने दी थी और अपने वक्त की यह बेहद उम्दा और शक्तिशाली सबमरीन कही जाती थी।इसमें दो राय नही कि 80 के दशक तक पाकिस्तान की नौसेना भारत से कहीं बेहतर थी।उस वक़्त रूस और अमेरिका ने गाज़ी को समुद्र से बाहर निकालने का प्रस्ताव दिया था जिसे भारत ने नही माना। 32 साल बाद सन 2003 में भारत की नौसेना पाकिस्तानी सबमरीन से जुड़े हादसे की जांच के लिए आदेश देती है। नौसेना के डाइवर्स को बहुत सी चीजें मिलती हैं।उसमें एक पाकिस्तानी सैनिक की जेब से उर्दू में लिखा एक ख़त भी मिलता है जो उसने अपनी प्रेमिका या होने वाली बीवी के लिए लिखा था ।पर वो ख़त अपने पते पर कभी नहीं पहुँचा।यह सब मूवी में नही है।

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लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है।फ़िल्म में वो दिखाया गया जो दिखाने लायक था।पर आगे एक कहानी और थी जो नही दिखाया गया।ये कम लोग जानते होंगे कि 03/04 दिसम्बर 1971 की रात 'बे ऑफ़ बंगाल' में गाज़ी के डूबने के तुरन्त बाद महज 6 दिन के भीतर 'अरब सागर' में एक और युद्धपोत डूबता है जिसमें इस बार 92 नही बल्कि 194 नौसैनिक शहीद होते हैं।और इस बार यह युद्धपोत पाकिस्तान का नही बल्कि भारत का होता है। और इसे पाकिस्तान की एक दूसरी सबमरीन PNS Harbour डुबोती है।पाकिस्तान को यह सबमरीन फ्रांस ने दिया था ।डूबने वाले इस भारतीय युद्धपोत का नाम INS KHUKHRI था।गाज़ी को भारतीय नौसेना ने डुबोया इसमें शुरू से ही संदेह रहा पर INS Khukhri को पाकिस्तान नौसेना ने डुबोया इसमें कोई संदेह नही था।सेकेण्ड वर्ल्ड वॉर के बाद डूबने वाला किसी भी देश का यह पहला और अब तक का दूसरा युद्धपोत था।इस युद्धपोत के कप्तान, कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला थे जिनका जन्म गोरखपुर में हुआ था। INS khukhri पर PNS Harbour के दो तारपीडो के लागातार हमले से वह सिर्फ सिर्फ़ 2 मिनट के अंदर ही समुद्र तल में डूब गई।इस दौरान कैप्टन महेंद्रनाथ ऐसी स्थिति में थे कि वो अपनी जान बचा सकते थे पर उनके लिए यह सम्मानजनक नही था और वो अपनी लाइफ जैकेट अपने जूनियर ऑफिसर को देते हुए युद्धपोत के उस हिस्से की ओर मुड़े जो सीधे हमले से बचा रह गया था।कुछ को बचाने में सफल रहे पर ख़ुद को नही।शायद उन्होंने खुद को बचाया भी नही।युध्द ख़त्म होने पर कैप्टन महेन्द्रनाथ को मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े सैनिक सम्मान 'महावीर चक्र' से सम्मानित किया गया।उन्हीं कैप्टन महेंद्र नाथ के नाम पर मुंबई के कोलाबा डॉकयार्ड में एक नेवल ओडोटोरियम बनाया गया।इसके अलावा दीव (दमन-दीव) में भी INS KHUKHRI की प्रतिकृति और कैप्टन महेंद्र नाथ का स्टैच्यू आज भी देखी जा सकती है।


पकिस्तान ने सिर्फ़ 6 दिन के भीतर अपने 92 नौसेनिक साथियों की शहादत का बदला भारत के 194 नौसैनिकों को शहीद कर ले लिया था।इसे मूवी में नही दिखाया गया।शायद मूवी इसी लिए मूवी होती है वरना मूवी डॉक्यूमेंट्री क्यों न हो जाए।ये अलग बात है कि 71 की लड़ाई में पाकिस्तान भारत से बुरी तरह हारा और पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश बन गया। पर अपनी जीत के साथ अपनी हार को भी याद रखना हमेशा बेहतर होता है।एक मुल्क़ के लिए भी और इंसान के लिए भी।
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Monday, February 27, 2017

#२# विश्वविद्यालय के दिन: श्रीश पाठक 'प्रखर '

खलीलाबाद में पिछले दो दशकों से मेरा परिवार बस गया था । माँ सरजू के तट से लगे गाँव बईसा से लगभग ३० किमी दूर उत्तर में स्थित खलीलाबाद अब तहसील से जनपद हो गया था । कहते हैं कि जमींदार खलीलुर्रहमान के नाम पर इस पुराने कस्बे का नाम खलीलाबाद पड़ा ।  खलीलुर्रहमानदुनिया में कई और जगह भी हुए होंगेकुछ उसमें रसूखदार भी रहे होंगे तो कुछ की याद में शहर भी बने होंगे ही  तो;  हाँ जनाबइस दुनिया में खलीलाबाद कई और भी मुल्कों में हैं । पर कबीर के मगहरगोरखनाथ के गोरखपुर और बुद्ध के सिद्धार्थनगर से गलबहियां करता शहर तो हमारा वाला ही खलीलाबाद है ।

गोरखपुर विश्वविद्यालय की दूरी खलीलाबाद से लगभग ३५ किमी थी । कक्षाएं लेने के लिए यह समझाया गया कि रेलवे का मासिक पास बनवाया जाय और रोज रेलवे से आया जाया जाय । पापाजी चाहते थे कि इसे जरुर ही हास्टल (हॉस्टल कहते हैं यह तो कम से कम मुझे दिल्ली आकर पता चला) में रहना चाहिए वरना इसे पता नहीं चलेगा कि दुनिया कैसी है और इसके रंग कैसे हैं...! लेकिन जब तक हॉस्टल नहीं मिलता तब तक तो ट्रेन से सफ़र करना होगा ।

मासिक पास बन गया था । झुण्ड के झुण्ड छात्र झटके से ट्रेन में चढ़ते और एक घंटे में हम गोरखपुर पहुँच जाते । ज्यादातर के गाल पिचकेआँखें धंसीजुल्फे बेपरवाहशर्ट इन नहींमोहड़ी मुडी हुईबाकी चीजें  जैसी भी हों भाई साहब लेकिन जूते जरुर शानदार रहते थेखासकर स्पोर्ट शूज । ओहढंग जो भी हो क्या उमंग था स्टूडेंट्स में । शकल देख के समझ आ जाता कि कौन डिग्री कॉलेज का स्टूडेंट है और कौन इनवस्टी का ।  लपक कर हाथ ऐसे मिलाते थे जैसे किसी देश के आलाकमान हों और हैंडशेक का देसी तरीका भी निकल आया था । हाथ मिलाने के बाद दोनों जन अपने अपने हाथ अपने अपने सीने से हल्का सा लगा लेते थेतो हम मॉडर्न भी हो लेते थे और ठेठ भीकर लो हमारा जो करना है अमरीका वालों।




ट्रेन का वह एक घंटा बड़ा ही रोमांचक होता था । इसमें जरुर कुछ ऐसा मिल जाता था जिसपर हम लोगों से दिन भर बतिया सकते थे । ट्रेन के अन्दर ही घंटे भर के लिए इनवस्टी उभर आती थी और फिर वो झूम के परिसर में खिल जाती । ट्रेन और प्लेटफ़ॉर्म की एक अलग ही दुनिया होती है । नथुनों में वो बू बस जाती है जो वहां पायी जाती है । भारत का कोई प्लेटफ़ॉर्म होआपको वो बू जरुर मिल जायेगी । बोगियों में सहसा जब हम छात्र बैठते तो अक्सर हम स्लीपर क्लास में बैठते । एक घंटे की ही तो बात होती थी । ज्यादातर दिल्ली के मुसाफिर होते थेजिन्हें गोरखपुर उतरना होता था । कुछ लोग बड़े नाक भौं सिकोड़ते पर कर कुछ नहीं पाते थेक्योंकि वो लोग भी भले आज हाफ पैंट-बरमुडा में जर्नी करने लग गए हों और दिल्ली की भाषा ने उनके 'हमको 'मैमें तब्दील कर दिया होरुमाल व गॉगल्स का इस्तेमाल बेवज़ह भी करने लग गए होवे जानते हैं कि जब वे पक्के गोरखपुरी थे तो पान की पीक कितनी दूर तक छोड़ते थे । उन्हें ईल्म इतना तो था ही कि पक्के पूर्वांचली से कच्चे डेल्हाईट्स बन मुकाबला नहीं किया जा सकता थावो भी तब जब ट्रेन गोरखपुर पहुँचने ही वाली हो । 

बात केवल दबंगई की नहीं थी । ये छात्र गंवार भी तो नहीं थेइस उम्र के छात्र अख़बारों के सम्पादकीय अब पढने लग जाते हैंतो इनसे एकतरफा बहस भी नहीं की जा सकती थी । खैर मुझे ये सब तो धीरे धीरे महसूस हुआपर उस दिन आश्चर्यचकित हो गया कि ये जो मासिक पास है वो कायदतन प्रथम श्रेणी के डिब्बे के लिए था । कुछ देर बाद ही अन्तःप्रज्ञा ने अंगड़ाई ली और आवाज आयी- यारये सरकार बड़ी बदमाश है अपने नौनिहालों को प्रथम श्रेणी के डिब्बे का पास देती हैऐसे करेंगे ये शिक्षा का विकास । 

ज़ाहिर है उस वक़्त तक मै यह नहीं देख पा रहा था कि - लोगों की अलग अलग माली हालत पर बेशर्मी से मुहर लगाते हुए लोककल्याणकारीसमाजवादी लक्ष्यों वाली, 'हम भारत के लोगवाली सरकार ने सार्वजनिक यातायात के सबसे बड़े माध्यम को भी लगभग उतनी ही श्रेणियों में बाँट रखा है । और यह विभाजन अभी भी हैनज़र भी नहीं आता और नज़र आता भी है तो उसमें कुछ ग़लत नज़र नहीं आता । 

काश  हमारा महान भारत दुनिया का पहला ऐसा देश होताजहाँ ट्रेनों में बस एक ही श्रेणी होतीतो क्या हुआ थोड़ी कम ही सुविधाएँ होतीं. अंगरेजी पूंजीपतियों द्वारा लाई गयी ट्रेन में जब नवीन भारत के कर्णधार समाजवाद स्थापित कर अपना मौलिक हस्तक्षेप करते तो यह उदाहरण सोवियत के भी किसी भी उदाहरण से अधिक उदात्त होता । जब सभी एक साथ यात्रा करते तो तीर्थ साकार होतासमरसता बढ़तीसंवेदनशीलता बढ़ती और तब साफ़-सफाई हर बोगी में होतीकेवल कुछ में नहीं । भगवान के लिए कोई अर्थशास्त्री ये ना कहे कि दुनिया में कहीं ऐसा नहीं होतातो हम कैसे कर सकते हैं;  क्योंकि अचानक टर्की ने आधुनिकता का चोला पहना तो भी कोई विश्वास न कर सका थाजर्मनी फिर फिर खडा हो जाता थातो विश्वास  नहीं होता थाजापान ने १९०५ में ही विशालकाय रूस को धूल चटा दीतो विश्वास नहीं होता थातेरह छोटी-बड़ी कॉलोनियों से बना नया नवेला संयुक्त राज्य अमरीका कभी विश्व की महाशक्ति बन जायेगा किसने सोचा था.....उदाहरण कई और भी हैंऔर जबकि अपने महान भारत के अलावा दुनिया में कोई और देश भी तो नहीं जो उच्च स्वर में 'वसुधैव कुटुम्बकमका शंखनाद करने का आदी रहा हो । 

ट्रेन वो पहली जगह थी जहाँ भांति भांति के लोगों का अलग अलग होना पहली बार मैंने करीब से महसूस किया । इसके पहले मैंने ८-१० बार ही यात्रा की थीट्रेन की । जरुरत ही नहीं थीरिश्तेदार आस-पास ही के थे और गर्मी की छुट्टी आउटस्टेशन मनाने की प्रथा वाला अपना परिवार था नहीं । जिनके पापाजी लोगो का ट्रांसफर हुआ करता थावे ऐसी महान उपलब्धियां साल दर साल बटोरते और हमें सुनातेखैर ! मायूस मन तब भी नहीं होता थाअपने भविष्य पे भरोसा बहुत था ना ! इनवस्टी के बहाने पहली बार ट्रेन में सफ़र का मौक़ा मिला था । जाते वक़्त तो गहमागहमी चरम पर होती थीपर लौटते वक़्त ट्रेनें काफी खाली मिलती । अपना मन तो इनवस्टी में ही रमता थातो सारी कक्षाएं ले के ही आते थेकक्षाएं चलें ना चलें ।


#१# विश्वविद्यालय के दिन: श्रीश पाठक 'प्रखर '


                                                                                                                                                     (क्रमशः )

Saturday, February 25, 2017

मेरे प्रत्याशी को वोट दीजिए...असित मिश्र



मेरे प्रत्याशी को वोट दीजिए...
आजकल शहरों, कस्बों और गाँवों की गलियों में दौड़ रही चमचमाती गाड़ियों में बज रहे बाजारू नारों ने बलिया और बनारस को ही नहीं पूरे फेसबुक व्हाट्स ऐप से लेकर हर घर-आँगन तक को ढंक लिया है। राजनीतिक चालों, घातों - प्रतिघातों के इस समय में प्लेटो,अरस्तू, मैकियावेली, जाॅन, लाॅक, अरविंदो और गाँधी के राजनीतिक विचारों पर एक स्मार्ट फोन या फिर एक पायल भी भारी पड़ सकती है। बाहुबलियों की 'द्यूत-सभा' में राजनीति रुपी द्रौपदी का चीरहरण रोज होता है। यही नहीं इंसान की बस्तियों में अब कोई इंसान भी नहीं रहता। सामने दिख रहा चेहरा या तो भाजपाई होगा या कांग्रेसी। समाजवादी होगा या बसपाई। परिचय के क्रम में पहले नाम नहीं पूछा जाता। यह पूछा जाता है कि आपके यहाँ से कौन सी पार्टी जीत रही है? बड़े अजीब खौफनाक माहौल में जी रहे हैं हम। जहाँ भरोसा किताबी, रिश्ते हिसाबी, जीवन शैली नवाबी और बाल खिजाबी होकर रह गए हैं।मौसम भी अब बारिश का नहीं होता, पतझड़ का नहीं होता, बस चुनाव का होता है। जहाँ देखिए तनाव, द्वेष, जीत-हार, हिंदू-मुसलमान, जाति-संप्रदाय के ही चर्चे। अखबार से लेकर टीवी तक, फेसबुक से लेकर चाय के चौपाल तक बस एक ही मुद्दा - पार्टी चुनाव। 

दोष किसी और का नहीं है, हमारी आँखों का है। हमारी आँखों को वही दिखाई दे रहा है जो सियासत हमें दिखा रही है। हमारे कानों को सुनाई भी वही देता है, जो राजनीति के माहिर खिलाड़ी हमें सुनाना चाहते हैं। चलिए! जब चारों ओर वादों, इरादों, नारों, विकास से लेकर कब्रिस्तान - श्मशान, गदहे-घोड़ों तक की चर्चा हो ही रही है,तो हम भी बता ही दें कि इसी चुनावी माहौल में हमारा भी एक प्रत्याशी मैदान में है। हर विधानसभा क्षेत्र में गया भी है लेकिन अफसोस कहीं भी किसी ईवीएम मशीन में उसका कोई नाम नहीं, कोई चिह्न नहीं। लेकिन लड़ रहा है वो, अपने पूरे शवाब और जोश-ओ-ख़रोश के साथ।

जी हाँ! पेड़ों पर नई निकलने वाली कोंपलों के 'पोस्टर्स' लेकर आया है वो, और सरसों के खेत में फैली पियरी रंगत उसी के तो हैं।सुबह की पहली किरन में आलस भर देने वाला निगोड़ा वही है। वही है, जो शराब नहीं बाँटता लेकिन जीवन में मादकता भर देता है। पायल नहीं बाँटता लेकिन अपनी खनक से वो नई दुलहिन को भी लजा देता है। चिड़ियों की चहचहाहट उसके नारे हैं, और जीवन में खुशियाँ लाना उसके वादे।

बसंत ही नाम है उसका। ढूंढिए! आपके दिल के विधानसभा क्षेत्र में 'बसंत' भी आया है प्रत्याशी बन कर। बसंत राजनीति का प्रत्याशी नहीं है वो 'जीवन का प्रत्याशी' है। वही हमारा प्रत्याशी है। और हम उसी के लिए वोट माँग रहे हैं। बसंत को चुनना व्यक्ति या समाज के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए जरूरी है। क्योंकि बसंत का अर्थ मौसम नहीं प्रकृति होता है। और आज हम प्रकृति से इतने दूर हो गए हैं जितना आज के पहले कभी नहीं थे।
सोचिए! कितने दिन हुए जब आपने सूरज की पहली किरन की ओर मुस्कुरा के देखा था?
याद कीजिए कब डूबते हुए सूरज को देखकर आप अपने जीवन के दुख-दर्द पर आखिरी बार उदास हुए थे?
सोचिए! कोयल आज भी कूकती है लेकिन कितने साल बीत गए किसी विरहन कोयल की कूक पर आपने कूऽऽ कूऽऽ बोल कर उसे चिढ़ाया नहीं! 

बताइए बरगद के पत्तों को गोल कर के आखिरी बार सीटीयाँ कब बजाईं थीं आपके होठों ने?
याद कीजिए बरगद के पत्तों के बैल कब बनाए थे और पीपल की पत्तियों के ताले कब बनाए थे!
सोचिए! सब्जियों के खेत में एक डंडे पर टांगी गई हांडी, उसे जबरदस्ती पहनाए गए बड़े से कुर्ते और उसकी दोनों फैली हुई बाँहें! अब बताइए बिजूके को भूत समझ कर डरे हुए कितने साल बीत गए?
सोचिए! महुवई गंध, आम के मोजरों की महक या बत्तखों का पानी में शोर करते हुए आपस में धक्का मुक्की करते कब महसूस किया था? 

सोचिए! बसंत ऋतु की पियरी साड़ी में से कुछ पीले सरसों के फूल तोड़ कर कब आपने अपने कानों में गहने की तरह पहना था?
सोचिए! कितने साल यूँ ही गुजर गए और आपने अपने कानों के पास गेंदे के फूल लगाकर आइने में खुद को नहीं देखा।
सच बताइए तब खुद से मुहब्बत नहीं हुई जाती थी? सच बताइए दिल मचलने की बेपनाह जिद नहीं किया करता था?
सूनी सी दोपहरी में जब सारा जहाँ सोता था, तब आपने घर के भीतरी आलमारी में से चुरा कर अपने गालों पर पाउडर लगाए थे, कानों में नीम के फलियों के टाप्स पहने थे और पुराने से दुपट्टे की साड़ी पहनी थी। दूल्हा-दुल्हन के खेलों से लेकर रूठना, मनाना, नाचना, गाना सब जैसे न जाने कहाँ चला गया! 

सोचिए! मधुमक्खियों के टंगे हुए छत्तों की ओर एक कंकर फेंकने का मन किए कितना अरसा बीत गया!
बंदरों को किसिम किसिम से मुँह बनाकर चिढ़ाए कितने युग बीते हैं!
हो सकता है आप कहें कि असित भाई अब हम बड़े हो गए हैं न! जानते हैं यह बड़े होने का अभिशाप हमें हमारी जड़ से काट देता है। हमें वास्तविक नहीं रहते देता,आभासी बना देता है। हमें भौतिक और वैज्ञानिक बना कर हमारे भीतर के जीवन और रस को चूस लेता है। 

नहीं! हम सूर्य चंद्र हिमालय और धरती से बड़े नहीं।अपने आगोश में इन्होंने न जाने कितने मानव वंश का उदय और पतन देखा होगा। हम बहुत छोटे हैं आज भी एकदम बच्चे से...
बताइए! हम होली के रंगों में खुलकर डूब नहीं सकते।भर मुट्ठी अबीर से किसी को नहला कर ठहाके नहीं लगा सकते। पलाश के ललके फूलों को हाथों में रगड़ कर हाथ कट जाने का बहाना नहीं कर सकते। खुशी के क्षण में चिल्ला चिल्ला कर आसमान सर पर नहीं उठा सकते। दुख के अनचाहे मौसम में किसी के कंधों पर सर टिका कर रो नहीं सकते... इसे आप 'बड़ा होना' कहते हैं और मैं इसे 'संकुचित होना' कहता हूँ।

बसंत को जरा भी फर्क नहीं पड़ता कि आपकी अवस्था क्या है! आप अब भी कहीं खेतों की क्यारियों में लगाए धनिये की पत्तियों के ऊपर खिले फूलों को कानों में पहन सकती हैं। आप अब भी दूर तक फैली हुई सरसों की पियरी चुनरी के बीच लाल साड़ी में खड़ी होकर घूँघट की आड़ में शरमा सकती हैं। आप अब भी तितलियों के लिए भर दोपहर दौड़ते भागते रह सकते हैं। आप अब भी पीपल की पत्तियों पर डाॅट पेन से 'उसकी' यादों वाली शायरी लिखकर अपने दीवानगी पर ठहाके लगा सकते हैं...। मत सोचिए कि कोई क्या सोचेगा! जिसने गली के मोड़ पर पतझड़ की दुकान खोल ली हो वो क्या जानेगा कि 'बसंत' क्या है? 

बसंत तो चिर युवा है, छलिया है, रूप ग्राही है उसे आपकी उम्र से क्या मतलब!
बसंत को चुनना प्रकृति को चुनना है, उमंग, उत्सव, हरियाली और मादकता को चुनना है।बसंत को चुनना मतलब जीवन की सहजता को चुनना है। बसंत को चुनना मतलब जीवन में 'वास्तविक जीवन' को चुनना है। लेकिन यह ईवीएम के बटन दबाने जैसा आसान नहीं है। यह विधायक और सांसद चुनने जैसा आसान नहीं है।

क्योंकि जैसे ही आपने बसंत को चुना आपको कोयल की कूक सुनने के लिए पेड़ लगाने होंगे। क्योंकि पेड़ ही वो जगह होती है जहाँ बसंत अपने पोस्टर्स लगा कर अपने आगमन की सूचना देता है। आपने जैसे ही सरसों के फूल चुने आपको गाँवों को संरक्षित करने की जरूरत पड़ेगी। जैसे ही आपने बत्तख का तैरना चुना आपको तालाब संरक्षित करने पड़ेंगे। जैसे ही आपने सूर्योदय देखना चाहा वैसे ही आपको ब्रह्म मुहूर्त में उठना होगा। सैकड़ों हजारों और भी छोटी छोटी बातों से जीवन में बसंत चुना जा सकता है। चुनाव के इस शोर में बसंत का आगमन भी हुआ है। जिस पर किसी की नज़र नहीं। हर चेहरा अपने राजनैतिक प्रत्याशियों के लिए परेशान है और इधर बसंत हतोत्साहित उदास आता है और चला जाता है। नहीं! इतना भी मुश्किल नहीं है बसंत को चुनना। थोड़ी सी इसकी भी चर्चा कीजिए। एक बार बसंत के बारे में भी सोचिए। फिर कह रहा हूँ बसंत को वोट दीजिए! मेरे प्रत्याशी को वोट दीजिए...
असित कुमार मिश्र
बलिया

धीमी मौत...ई. एस. डी. ओझा


Er S D Ojha
3 hrs



आप एक धीमी मौत मरने लगते हैं.
पाकिस्तान में गुजराती भाषा धीमी मौत मरने लगी है. बोलने वाले लोग तो कम हो हीं रहे हैं ,उससे ज्यादा लिखने वाले विलुप्त हो रहे हैं. पूरे विश्व में 50 मिलियन लोगों की भाषा आज पाकिस्तान में दम तोड़ने के कगार पर है . कभी कायदे आजम की मातृभाषा रही गुजराती मातृभाषा कॉलम से हटा दी गयी है.पाक की डाटाबेस व पंजीकरण प्राधिकरण के आवेदन पत्रों से गुजराती अपना वजूद खो चुकी है . पूरे विश्व में ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में गुजराती 26 वें पायदान पर है,पर पाकिस्तान की नई पीढ़ी इसे बोलने व लिखने से गुरेज करने लगी है . पाक सरकार ने भी गुजराती को धीमी मौत मरने के लिए अपने हाल पर छोड़ रखा है .

धीमी मौत की सजा कभी मलयेशिया में अक्सर दी जाती थी. इस मौत की सजा पाए अपराधी को एक संदूक में भरकर किसी निर्जन इलाके में छोड़ दिया जाता था.उस संदूक में मात्र एक छेद होता था ,जिससे सजायाफ्ता व्यक्ति आते जाते लोगों से भोजन पानी ग्रहण करता था . फ्रांस के धनाढ्य व्यापारी व प्रसिद्ध फोटोग्राफर अलबर्ट कान्ह सन् 1913 में आस्ट्रेलिया गये थे . उन्होंने वहां एक औरत को इस तरह की सजा पाते हुए देखा था . चाहकर भी उस महिला की वे कोई मदद नहीं कर पाये . उन पर मलयेशिया का कानून तोड़ने का आरोप लग जाता .

अल्बर्ट कान्ह ने महिला की फोटो ली और फ्रांस लौट आये .जब इस महिला की फोटो अखबार व पत्रिकाओं में छपी तो पूरे विश्व को पता चला कि इस तरह की अमानवीय व क्रूर सजा दी भी दी जा सकती है . तिल तिल मरने की सजा . वह महिला उस तंग संदूक में रहकर अकेलेपन व अन्य शारीरिक तकलीफों का दंश झेलते हुए मरी होगी . यह क्रूरता की चरम प्रकाष्ठा थी .

दुनियां में अकेला रहना भी धीमी मौत मरना है .अकेले रहना उतना हीं खतरनाक है ,जितना कि मोटापा और धूम्रपान है. अकेलेपन से आपको हार्ट अटैक का खतरा तीन गुना ज्यादा हो जाता है . ब्लड प्रेशर ,शूगर व अन्यान्य बिमारियां घर कर लेती हैं . आदमी जितना हीं एडवांस और नाना प्रकार की सुविधाओं से युक्त होता चला जाता है .उतना हीं वह अकेला होता चला जाता है. भले हीं आप फेसबुक पर घंटों काम करते रहें ,दोस्तों से चैट करते रहें ; पर परिवार में विखराव है ,भावनात्मक तादात्मय नहीं है ,परिवार से सम्वाद न के बराबर है तो आप अकेलेपन के शिकार हैं . हम फुटपाथ पर रहने वालों की केवल गरीबी देखते हैं ,हम उनके चेहरों की हंसी नहीं देख पाते हैं . हमें उनके मुस्कुराते चेहरों पर परिवार के एकात्मकता की छाप नजर नहीं आती है। 

Friday, February 24, 2017

खुशियाँ.....विमलेश शर्मा


#StatusOfStatus







खुशियाँ खोजनी हों तो शिकायतों को तह करके रख दीजिए। 
नीम कड़वे समय में बचे रहिए प्रभाविकता के नियम से देरतलक। रिसते दर्द में भी सहेजनी होगी भीतर की नमी ताकि बचा रहे आँख का पानी सदियों तक। 

मूर्त भी कहाँ सच हुआ करता है। बहुत है छलावे इस सतरंगी दुनिया में पर अगर बिछलता जादू देखना हो तो किसी निश्छल मुस्कराहट में देख लिजिए। किसी की खुशी का हेतु बन जाइए पर मज़ा तभी है जब यह बिन बताए हो। ऐसे ही तो जादू घटा करते हैं हमारे इर्द-गिर्द। कोई आकर सुनहले ख्वाबों को आँख दे जाता है तो कोई दे जाता है उन ख्वाबों को पूरा करने की दृष्टि। ये सब ही तो बन जाते हैं एक रहस्य, जादू या करिश्मा सभी के लिए!


ख्वाबों के जंगल में
कोई गिलहरी आंखों से
अधबुने जुगनू सरीखे पल
चुप से रख जाता है
रेतीले कोरों पर
मौन गहराई में
अकस्मात् हुई किसी
पदचाप की धमक से
कोई पा लेता है
 आब-ए- मुक़द्दस*
तो कहीं
कैलाशी शिव को
अपनी ही चौहद्दी में
जानते हो! कौतूहल!
मौन से टूटा शब्द है
माथे पर एकाएक उग आया तिलक है
वो अव्यक्त होकर भी ज़ाहिर है
किसी दरवेश के भीतर का शायर है
और कुछ नहीं
बस्स! किसी
अजानी चेतना को झकझोर कर
मोती सी सीपियों में यकायक
शफ़्फाक चमक पैदा होने का नाम है आश्चर्य!
और यूं मूर्त से अमूर्त हो जाने को
हम कह देते हैं अक्सर
नेमत!
जादू!
रहस्य!
या कि कोई पहेली अबूझ!
*आब-ए-मुक़द्दस=पवित्र जल
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Thursday, February 23, 2017

#16# साप्ताहिक चयन: 'जिद करती बोलती स्त्रियाँ '/ 'अर्चना कुमारी '

वैसे तो; समझने की कशिश हो, तो एक पुरुष भी समझ सकता है 'स्त्री' की सिलगते सीलन को, यों; 

"और गहरी उदासियों का धुंआ है इर्द गिर्द...
मिट्टी के चूल्हे में
गीली लकड़ियाँ हैं दुःख
ये भी अजीब बात है कि
कई बार मैं लड़कियाँ बोल जाता हूँ
मैं जानता हूँ
अंदर तक भीगे रहने का अनुभव
जो काफ़ी देर तक बचाये रखता है
धू-धू कर जलने से
रात भर रोते रहने का आनन्द...
मैं जानता हूँ लड़कियों!"


...पर आइये देखते हैं, 'स्त्री ' पर लिखी एक उम्दा कविता जो एक संवेदनशील स्त्री ने लिखी हो और एक सजग स्त्री उस पर टिप्पणी कर रही हो तो क्या सिम्पैथी और इम्पैथी का फर्क रह जाता है..फिर भी...! 

इस बार नवोत्पल की चयनित कविता प्रविष्टी है अर्चना कुमारी जी की और उसपर अपनी सहज टीप दी है राखी सिंह जी ने। 

अर्चना कुमारी ने कुछ ही वर्षों में हिंदी कविता में अपना स्थान अपनी समर्थ रचनाओं से बनाया है। अभी ही उनका पहला संग्रह 'पत्थर के देश में देवता नहीं होते' बोधि प्रकाशन से दीपक अरोरा स्मृति पांडुलिपि प्रतियोगिता में पांच विजेताओं में से एक के अंतर्गत प्रकाशित हुआ है। स्त्री जीवन को अपने तात्कालिक समाज और अपनी अलग दृष्टि से देखती कविताओं की रचईता हैं अर्चना कुमारी। अक्सर ही स्त्री जीवन के तमाम प्रश्नों को उठाती हैं। आशा करती हूं जल्द ही उनकी कविताओं में हमें उत्तर भी मिलने लगेंगे। 

राखी सिंह एक reluctant और बेहतरीन कवि हैं और उनकी कविताओं की समझ उतनी ही प्रभावित करती है। 
आप दोनों को मेरी शुभकामनाएं! 


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जिद करती बोलती स्त्रियाँ

(बाएं से ) राखी सिंह जी एवं अर्चना कुमारी जी: फोटो साभार-शशांक मुकुट शेखर

एक से होते होंगे दुःख

हर देश काल के

होती होंगी एक जैसी स्त्रियाँ

युगों के अन्तराल में भी

झुकने की कला में निष्णात करते हुए


कम हो जाता है आवश्यक तनाव

रीढ़ की हड्डियों का

आदी हो जाते हैं कन्धे

पीड़ाओं के बोझ के लिए

अधिकार माँगती

जिद करती

बोलती स्त्रियाँ

पाँव का काँटा होती है

चुभी रहती हैं सीने में

पाँव में जूतियों की तरह

उन्हें पहनने की अदम्य लालसा

मानवता को मार देती है चुपके से

सत्ता को गुलाम चाहिए

आदमी नहीं

हर दुत्कार पर

दुम हिलाते कुत्ते की तरह

डटी रहे देहरी पर

चोट से किंकियाते हुए भी

इतनी समानता अपेक्षित रही है सदियों से

स्त्री और पालतू कुत्ते में ।।



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परिवार भी एक सत्ता ही है। जैसे परिवार में पाले जाते हैं कुत्ते, सत्ता में होते हैं ग़ुलाम।और वैसे ही सदियों से घर ने सुरक्षित रखी है स्त्री की छवि।जिसे जो मिल जाए खा के चुपचाप कोने पड़ा घर की रखवाली करता रहे।जब मन चाहे उसे पुचकार लिया जाये जब मन हो दुत्कार लिया जाए।उसका भौंकना घर की शांति को भंग करता है।महंगे सुंदर आज्ञाकारी नस्ल के वफ़ादार कुत्ते शोभा बढ़ाते हैं घर की।

गुलाम सत्ता की जयजयकार करता रहे,स्त्री घर की धुरी बनी रहे।सत्ता को ज़रूरी हैं ग़ुलाम घर को ज़रूरी हैं स्त्रियां। बोलती ललकारती विरोध करती स्त्री सीलन होती है घर की।उनकी अपने पक्ष में उठी हल्की सी भी आवाज़ से दरक सकती है नीवं घर की।वो बागी बेहया बाज़ारू करार दी जाती हैं।उसे घर में रहने देना घर के संस्कारों के लिए हो सकता है हानिकारक ।

घर को हृदय में संजोये बड़ी हुई स्त्रियां ख़ुद टूट कर भी बचाये रखना चाहती हैं घर को टूटने से।सत्ता को बचाये रखने की भूख ग़ुलाम को बनाये रखती है ग़ुलाम। भविष्य को बेहतर बनाने के लिए स्त्रियां स्वयं को बना लेती हैं यज्ञ कुंड और वर्तमान को करती हैं उसमे स्वाहा।

अर्चना कुमारी युवा कविता की सशक्त हस्ताक्षर हैं।उनकी कविताओं में सहमी सिमटी स्त्रियों के व्यथा की गूंज स्पष्ट सुनी जा सकती है।इस कविता में भी अर्चना अपनी बात कहने में पूरी सफल रही हैं।उनके द्वार प्रयोग किये गए बिम्ब कहीं से भी कृत्रिम नही लगते,बल्कि कविता के कहन को सहज और सरल बनाने में मदद करते हैं।
कहीं कहीं अर्चना की कविता निजी लगने लगती है।सहनशील स्त्री की छवि उकेरती अर्चना की कविता स्त्रियों के दब्बू होने की परिचायक लगती है।इस कविता में स्त्री के विरोध का स्वर क्षणभंगुर है।

Wednesday, February 22, 2017

मिथक और इतिहास: निर्मल वर्मा

उर्वशी-पुरुरवा: राजा रवि वर्मा (विकिपीडिया)


"मिथक और इतिहास के बीच जो अन्तर है, एक तरह से वह पश्चिमी संस्कृति और भारतीय परम्परा के बीच भी परिलक्षित होता है। इतिहास अपने चौखटों के भीतर काल की अन्धी, अन्तहीन गतिमयता को बाँधने का प्रयास है ताकि उसे किसी प्रकार की क्रमशीलता, सोद्देश्यता, अर्थवत्ता प्रदान की जा सके-- अपने ज्ञान के मापदण्ड से वह उसकी अनन्तता को भेद कर कहता है, यह आरम्भ है, यह अन्त और इस तरह उसे एक मानवोनुकूल, anthropomorphic, दिशा देने का प्रयत्न करता है, उस 'अन्त' की ओर मोड़ता हुआ जहाँ उसका कोई अर्थ, कोई पैटर्न, कोई संगति निकल सके-- और उसके अनुरूप मनुष्य अपनी 'नियति' (destiny), निर्धारित कर सके। इसी अर्थ में उसे messiahanic time कहा जाता है-- जहाँ किसी मसीहा की दृष्टि ही मानव नियति का प्रतीक बन जाती है। इसके विपरीत मिथक एक उलटी दिशा निर्देशित करता है-- वह मनुष्य को अपनी 'मानवीकृत' सीमाओं से उठाकर एक ऐसे सनातन बोध की ओर ले जाता है, जहाँ मनुष्य अपने 'होने' की अर्थवत्ता काल को खण्डित करके नहीं, उसे अतीत और भविष्य में विभाजित करके नहीं, बल्कि स्वयं उसकी अनन्त प्रवाहमयता के भीतर संलग्नता (connectedness) खोजने में निहित रहती है। संलग्नता के इस भाव में मनुष्य अपने भीतर जिस ईश्वर से सम्पर्क करता है, वह, वह ईश्वर नहीं है, जिसका कोई रूप निर्धारित किया जाये।" 


*'निर्मल वर्मा'











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भारत सबसे महत्वपूर्ण देश: ई.पी.थामसन



साभार:गूगल इमेज



"भारत सिर्फ महत्त्वपूर्ण नहीं, दुनिया का शायद सबसे महत्त्वपूर्ण देश है, जिस पर सारी दुनिया का भविष्य निर्भर करता है। भारतीय समाज में दुनिया के विभिन्न दिशाओं से आते प्रभाव एक-दूसरे के साथ मिलते हैं..... पूर्व या पश्चिम का ऐसा कोई विचार नहीं, जो भारतीय मनीषा में क्रियाशील न हो। "




*ई. पी. थामसन (अंग्रेजी मार्क्सवादी इतिहासकार)








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तब चुप ही बोलता है...: अपर्णा अनेकवर्णा


#StatusOfStatus



हमारी परदादी कैथी लिख लेती थीं। हम नहीं पढ़ सकते। 
मीज़ो के सभी अख़बार रोमन में छपते हैं। उनकी लिपि चमड़े पर लिखी थी। कुत्ता चबा गया।
हम जब अख़बार पढ़ते तो मुंह से नई ध्वनि झरती जिसका कोई आकार नहीं बनता।
पुराने पत्र/कागज़ात फ़ारसी/उर्दु में हैं। हमें आती नहीं।
घर में जो बहु जहां से आई कुछ टुकड़े बोलियों के लेती आई.. दादी की अवधी अम्मा की बिहार वाली भोजपुरी बाकी गोरखपुर की भोजपुरी.. मुझसे तो सब मिक्स हो जाती हैं।
पापा कलकत्ते से मेडिसन के साथ प बंगाल और बांग्लादेश में बोली जाने वाली दोनों बोलियाँ पढ़ आए। बोल समझ लेते हैं।
हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब में हिंदवी बोली के तमाम पुल बंधे हैं अब भी।
अंग्रेज़ी मुझे अति प्रिय है। उर्दु बांग्ला में हाथ पांव मारती रहती हूँ।
डेरेवाल सब कुछ छोड़ आए सिंधु के उस पार। बस जान, भाषा और एक बिरवा बरगद का ला पाए। सब उग रहे हैं पश्चिमी दिल्ली की शरर्णार्थी कौलोनियों में। मैं 'हिंदुस्तानी' बहू सुनती हूँ किस्से एक पठान शहर के।
बड़ी बहन का कहना है फ्रेंच में दुनिया वाकई ज़हीन हो उठती है।
नेरुदा और मार्क्वेज़ स्पैनिश में पढ़ना ही अनुवाद में खो जाने से बच जाना है।
विक्रम सेठ मैंड्रिन में कविताएं लिखते हैं, सोचती हूं कैसे।
ओरहान पामुक ने बताया आइसलैंडिक भाषा में बर्फ़ के सौ से ऊपर नाम हैं।
कितने ही फूल हैं जिनके नाम उनको पुकारने वाले कबीलों के साथ मर गए। कितनों के नाम कभी रखे ही नहीं गए।
अंडमान की बो जनजाति की इकलौती फ़र्द बोआ सर २०१० में मर गई और साथ ले गई ६५,००० वर्ष पुरानी बो भाषा। कहते हैं उसके इकलौते होते ही भाषा चुप हो गई थी।
हम सब के पूर्वज तो अफ़्रीका से आए थे। द ग्रेट एक्सैडस। मुझे स्वाहिली, ज़ुलू या क्लिक वाली भाषा भी नहीं आती।
अक्सर बहुत बोल लेने के बाद ख़ाली हो जाती हूँ। तब चुप ही बोलता है। अपनी बोली, भाषा में।
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अनेकवर्णा
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ज़िंदगी के ज़ायके: अमिता नीरव


Amita Neerav feeling blessed.
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साँस लेने या फिर पलकें झपकाने की तरह ही हम जिंदगी भी जिए जा रहे हैं.... आदतन। शायद इसीलिए हमारे दुख-सुख स्थूल है... जीवन की बारीकियाँ, सूक्ष्म दुख-सुख हमें व्यापते भी नहीं, दिखाई भी नहीं देते और हम खाने में नमक तेज और मिर्च कम जैसे स्टेटमेंट से अपनी जिंदगी के प्रति जजमेंटल हो जाया करते हैं.... जबकि जिंदगी तो इलायची-केसर की खुश्बू, हींग-जीरे का तड़का और काली मिर्च के जायके जैसे बारीक-बारीक स्वादों का खज़ाना है, जिसे हम नमक-शकर और मिर्च जैसे मोटे-मोटे स्वादों में खो रहे हैं...:-( पहली बारिश से उठती मिट्टी की खुश्बू, किसी फूल पर पड़ी ओस की बूंद, किसी पेड़ की कोटर में चिड़िया का घोंसला, वसंत में चटका पलाश या तेज़ गर्मी में खिला गुलमोहर-अमलतास.... बच्चे का मासूम सवाल और कोई सौंधी सी भावना.... ये हैं जिंदगी के असली ज़ायके... :-)
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