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Friday, March 31, 2017

"सदा आनन्द रहै एही द्वारे"- (3) डॉ. जयकृष्ण मिश्र 'अमन '

सदा आनन्द रहै एहि द्वारे

(तीसरी किश्त: आखिरी भाग) 

हर घर के दुआर पर जा-जा कर "सदा आनन्द" गाया जाता। भीतर से औरतें ख़ूब रंग फेंकतीं। हर घर से अपनी क्षमता के मुताबिक मिठाई, गुझिया जो बन पड़े, खिलाया जाता। पर होरियारों को कुछ खास घरों का इंतज़ार रहता। उन घरों का जहाँ कोई नौकी भौजाई आई हो, वहाँ तो रुक के ख़ूब चिल्ल-पों होती। उन घरों का कि जहाँ भांग वाले पेड़े मिलते। दो-तीन और घरों का, कि जहाँ से ख़ूब गरियाया जाएगा और जहाँ रात को हंड़िया फेंकनी है। होरियारों की भीड़ में छुपे अंतर्राष्ट्रीय देवर लोग धीरे से घरों में घुस के भौजाइंयों को रंग मल आते।

रामऔतार, जोगी, माताबदल जैसे अस्सीसाला बाबा लोग बड़े करीने से उज्जर धोती पहिन के, उसका कोन्ना हाथ में पकड़े इस्टाइल से चल रहे होते। लोग-बाग भी उनको बस अबीर का चन्नन लगा के गोड़ लग लेते (पैर छूना), पर एतने में कहाँ गुरू...। सतेन्दर भइया गजबै खेलवाड़ी। धरमिन्दरवा, सोगनवा, रमौधा..... सब एक से बढ़ि के एक लुहेड़ा। सतेन्दर भइया के लुहकारते ही मिनट भर में ऊ कुल बुढ़ऊ बाबा लोगन को संन्यासी से जामवन्त बना देते। झकझोर के हुड़दंग होता।

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        हुरियारे घर लौट रहे होते तो लड़कियाँ और लड़के अपनी अलग-अलग टोली बना के निकलते, गाँव की भौजाइयों की टोह लेते। फुलकुमारी, जयन्तिरा, कनक, सुभौती गोल बना के माँ और चाची के साथ रंग खेलने आतीं। दबा के पटकी-पटका, आ मुँहलूथेरई..... ई चली रहा होता तब तक दूसरा चीख-पुकार। किसी के नाक का नथुनी गिरा तो किसी के कान का कनफूल। मिलेगा कहाँ...? बाल्टी-बाल्टी भर के रंग खेली हौ, त सब गया ओही पानी के साथ पड़ोहा (नाली) में।

        दादी हम बच्चों को लेकर भौजाइयों से होली खेलवाने सतिन्दर भइया के घर ले जातीं। होली के दिन वो घर कारगिल से कम नहीं लगता, कसम से...। उस घर में कितनी भौजाइयाँ थीं, ये आज तक नहीं समझ पाया। उहाँ गजबै धुरकण्डो चल रहा होता। दू राउण्ड होली होता वहाँ। पहिले राउण्ड में सतिन्दर भइया एक-एक भौजाई को खोज-खोज के लाके झम्म से पड़ोहा में... कोई आटा सना हाथ लिए रसोई में थी, तो कोई कपड़हवा साबुन का झाग पोते अंगना में। पूरा ओसारा कनइया उठता। पर असली मज़ा तो दूसरे राउण्ड में आता। जब सज्जी भौजाइयाँ जुट के सतिन्दर भइया को गीले घूर (जहाँ गोबर और कूड़ा फेंका जाता) पर पटक के गोबरिया देतीं। नित्या भइया उनके पीछे लिहो-लिहो कर रहे होते, तो ओनहूँ का जंघिया फाड़ के कनई में...। सचिता भइया वहीं से चिल्लाते- "अरे अइया, लइकन के ओहरी रखे। इहाँ महाभारत मचा है।" और हम बच्चे दादी का हाथ छुड़ा, घर भाग आते।

         तीसरे पहर नहा-धो के फिर जनता जुटती। तिरपाल बिछाया जाता। भाई, होली बाद नया साल जो शुरू हो रहा है। सबके बीच पाँड़े बाबा बैठते, नैका पत्रा खोल के। नया बरिस कैसा होगा.... पानी-बुन्नी, हर्जा-खर्चा, फसल, राशिफल... सब सुनाते। गाँव भर उनको सीधा-पैसा चढ़ाता और सबको पैलग्गी कर के सब घर वापस।

       बरसों बीते, बाबा को गए आठ बरिस हो गए। मोती, सहती, पड़ोही और डण्डो काका भी चले गए। हमेशा हल्ला, दंगा और किबिल्ली करने वाले सतिन्दर भइया और जयपरकास भी बिना कुछ कहे, भरी जवानी में एक दिन चुपचाप निकल लिए। आज सुना की बिनोद चाचा भी अस्पताल में अब-तब हैं। पूरा गाँव जैसे सुन्न हो गया है। ढोल, झाल और सदानन्द सुने जमाना हो गया। आज होली के दिन दोपहर में अकेले दीवान पर लेटे हुए, मद्धिम आवाज़ में चाचा कुछ गुनगुना रहे थे। बड़े जतन से कान लगाया तो सुन पड़ा-


"सदा आनन्द रहै एहि द्वारे

मोहन खेलें फ़ाग रे.........!!!

पहली किश्त 

दुसरी किश्त 




जय कृष्ण मिश्र 'अमन'

Thursday, March 30, 2017

#21# साप्ताहिक चयन: भगवान के भी भगवान / *प्रज्ञा सिंह '

प्रज्ञा सिंह
जनता नेता में नायक तलाशती है, तो वह उम्मीद नाहक नहीं, पर नेता सेवा भी मैनेज कर लेता है. जोर-शोर से गाड़ियाँ गुजरती हैं, बहुधा उन स्मूद पहियों तले रौंदे जाते हैं जाने कितने घरौंदे. जुड़ी हथेलियों के भीतर भी अनगिन आह दबी होती है, जब माननीय अपनी मुस्कान के साथ उतरते हैं वाहन से और बढ़ते हैं मंच की तरफ. 

मंच से विकास के पतंग की डोर हुमक हुमक कर उड़ाई जाती है और आखिर में अधनंगे बच्चे उधड़े मालाओं के फूलों से उछल उछल नहाते हैं. 
लोकतंत्र में जब जनता परिभाग नहीं करती, सवाल नहीं करती, हिसाब नहीं रखती, केवल जब उम्मीद करती है तो वह मदारी से कब बंदरिया बन जाती है, पता ही नहीं चलता. 

नवोत्पल साप्ताहिक चयन में आज चयनित कविता है आदरणीय कवयित्री प्रज्ञा सिंह जी की. आप एक सजग लेखिका हैं, कवितायें आपका मुख्य स्पंदन हैं. गंभीर बातें अपनी कविताओं में चुटीले अंदाज में कह जाना आपकी खासियत है. आपकी कविता पर सहज टीप की है, आदरणीया गुंजन श्रीवास्तव जी ने. आप सहृदय पाठिका और शब्दसाधिका हैं. 
कविता पर आपकी टिप्पणी संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित है.  

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डरिये नहीं
डरवाइये नहीं
आइये आइये इधर आइये
इस जहर का तोड़ बताइये
आइये दो कदम बढकर आइये
जल्दी नहीं अच्छा थोड़ा ठहरकर आइये
पर बताइये बताइये जरूर बताइये
कि कुल्फी वाले के पास जैसे होते हैं
वैसे सांचे में कैसे फिट कर लेते हैं आदमी को आप
आदमी में से कैसे छांट लेते हैं काम का आदमी
बताइये कि आदमी का कैसे काट है आदमी
बताइये कि किस हुनर से खड़े कर देते हैं आप
आदमी के खिलाफ आदमी

साभार:करेंट क्राइम 



मेरे हुजूर मेरे आका
बताइये मुझे जरूर बताइये
कि आपकी तमाम बातों में
आदमी के हक की एक भी बात क्यों नहीं
मेरे मसीहा बताइये मुझे
बेघर हों दोनों
आदमी और भगवान
तो पहले किसका घर बनवायेंगे
वही तर्क कि जिस तर्क से
भगवान के भी भगवान हैं आप

बना है आप का भौकाल
रोज नया बवाल
चौं चौं चौं चौं चिल्ल पों
ये बेलबूटे ये कशीदेकारी
ये भाषणबाजी फितने बाजी
नये पैंतरे तीरंदाजी
आपके लिये नहीं तो किसके लिये
पूछ रहा है एक सवाली
बताइये बताइये हुजूरे आली

(प्रज्ञा सिंह )
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प्रज्ञा सिंह जी की कवितायें पढ़ती रहती हूँ।

ये एक कविता है। न न ये कविता से कुछ ज्यादा है। दुखी और कमज़ोर वर्ग की व्यथा है। आदमी को मनचाहे साँचे में फ़िट करने की ताक़त और आम आदमी की उस साँचे में रहने की मजबूरी। राजनीति सत्ता पक्ष की और बेबस जनता द्वारा सहन करने की मजबूरियाँ। क्योकि हर असहमति को देशद्रोह का नाम दिया जाता है। शासक ऐसे ही होते हैं। इनका हर फ़रमान ब्रह्म वाक्य बन जाता है।

बताइये मुझे जरूर बताइये
कि आपकी तमाम बातों में
आदमी के हक की एक भी बात क्यों नहीं
जवाब देना तो बनता है क्योंकि इसके अलावा और क्या चाहेगी आम जनता आपसे ?
ये बेलबूटे ये कशीदेकारी
ये भाषणबाजी फितने बाजी
नये पैंतरे तीरंदाजी

ये वादे जो आप बिना सोचे कर देते हैं , जब पूरे नहीं कर पाते। तो ख़ुद सोचिये कितने छोटे हो जाते हैं आप उनकी नज़र में जिनसे आपने वादे किये थे l  प्रज्ञा जी के द्वारा इस्तेमाल किये उदाहरण कोई कोरी कल्पना नहीं बल्कि हमारे इर्द गिर्द कसते हुए शिकंजे की वास्तविकता है। प्रज्ञा जी अपने उद्गार ज़ाहिर करने में सफल रही हैं पर कविता की पुकार बड़ी निरीह सी लगती है। विरोध के स्वर ज़रा मजबूत होने चाहियॆ। जान पड़ता है इस आवाज़ को मजबूत सहारे की ज़रुरत है।

"बताइये बताइये हुजूरे आली " ख़ुद को कमतर आँकने वाले शब्द लगते हैं। कवयित्री ने व्यंगात्मक शैली का उद्बोधन दिया है, क्योंकि सिद्धांततः  वो जन सेवक हैं जिन्हें  जनता ने ख़ुद चुना है l इसप्रकार विरोध की सुगबुगाहट भी कविता में परिलक्षित होती  है। हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।

आख़िर में ये कहूँगी कि कविता में उन्होंने सहन करते जाने की बजाय अन्याय के विरोध में स्वर दिए जो कि इक बड़ी बात है। कभी तो सूरज निकले और अन्धेरा ख़त्म हो। मूलतः ये कविता वर्तमान परिवेश में जो त्रासदी सब भुगत रहे हैं उसे बिना किसी लाग लपेट के बड़ी मासूमियत से किया गया शिक़वा है, जो दूर तलक दर्ज होता है l



(गुंजन श्रीवास्तव)




Wednesday, March 29, 2017

#3# नोटबंदी में आशिक़ी : हिमाद्री बरुआ

भाग-l
भाग-2

भाग-3 
(आख़िरी भाग)



तो बात कुछ ऐसी हुई के लाईन में उसने मुझे अपने आगे बड़े रौब से खड़ा कर लिया और मेरे दिल में कबूतर फिर से फड़फड़ाने लगे. मेरा हाल 13 साल की उस लड़की की तरह था जो अपनी क्लास में जिस लड़के को सबसे ज्यादा पसंद करती थी उसी से बात नहीं करती थी, अजीब सी हिचकिचाहट. दिल में एक हूक यह थी कि हाय मेरे ज़ालिम कबूतर तू ही कुछ बात कर. मैंने बड़ी मेहनत करी थी यहाँ तक पहुंचने के लिए और मेरा इंतज़ार भी कम न था!
हालांकि मुझे दढ़ियल लौंडे पसंद नहीं आते लेकिन इसमें कुछ बात थी, और मुझे फ़वाद ख़ान तो कतई पसंद नहीं है.. शायद इसकी वो भारी आवाज़! देखो! ऐसे वक़्त में एक लड़की के दिल और दिमाग में कई सारी जलेबियाँ तल रही होती हैं.. एक तो सामाजिक परिधियों का डर दूसरा इतनी सारी जनता! यह ठीक वैसा ही संकोच था जैसा किसी भी लड़के को होता है जब उसे कोई लड़की पसंद आती है, वह सिर्फ उसे जानना चाहता है, वो कौन है.. लेकिन लड़कों की सोशल रेपुटेशन तो ऐसी है मानो उसने आगे बढ़ कर "hi!" क्या बोला लड़की उसको मौकापरस्त रेपिस्ट समझ लेती है.

मैं मौकापरस्त रेपिस्ट नहीं लगना चाहती थी!
हाँ वो मुझे पसंद आया.
तो जनाब, बात वहीं की वहीं आ गई.
टप्पा मार के नाला तो कूद लिया आगे कहाँ जाए. अब तक मैंने ही बात शुरू की, आगे बढ़ी, और इतने सिग्नल दिए, मंदबुद्धि बालक तो नहीं कुछ समझ ही नहीं रहा! 
मेरी अंतरआत्मा वाली बेस्ट फ्रेंड ने फिर झपड़िया दिया मुझे "देखो बाबू, ई लौंडा इंट्रस्टीड ना हौ, चौपसी नै कराओ और चुप खड़ी रहो"

तो हमने सोच लिया जब तक अब यह नहीं कुछ बोलेगा, हम नहीं बोलेंगे. स्त्री स्वाभिमान और वर्चस्व का पर्दा मुझपर हावी होने लगा. तभी पीछे से धक्का लगा और वो थोड़ा सट सा गया. हाय!!! मेरा स्त्री स्वाभिमान मेरे दांतो के बीच होंठ बन कर दब गया और मेरे गालों पर गड्ढ़े बन गए.

उसने हलके से कहा.. "सॉरी"
मैंने भी मुस्कुरा कर कहा दिया "इट्स ओके"
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मेरा पहल न करने का डिसीजन मेरे गालों के गड्ढो में डूबता सा जा रहा था और पेट की तितलियाँ गले तक आ कर गेम ऑफ़ थ्रोन के ड्रैगन बन चुकी थी! सब्र टूटा और मैं तपाक बोल पड़ी.. "आप एग्ज़क्टली कहाँ रहते हैं"
"214, सेकंड फ्लोर" "ओह!.. लेकिन आप कभी दिखे नहीं.. व्हाट डू यू डू?"
"गुड़गांव के आईटी फर्म में हूँ.. और तुम?"
हाय!! आप से तुम.. कितना सुन्दर तुम था यह.
मैं स्कॉलर हूँ.. रिसर्च कर रही हूँ! मैंने कहा.

अच्छा! किस कंपनी में? उसने पूछा..
मैं ऐसे प्रश्न से थोड़ा झेंप गई लेकिन फिर खुद को समझाते हुए मैंने कहा.." पीएचडी रिसर्च स्कॉलर"
ओह! पढ़ाकू टाइप्स हो!! नाइस नाइस.
तो करती क्या हो?
मैं समझ चुकी थी अबोध बालक को इस बारे में कुछ ज्ञात नहीं है! कोई बात नहीं.

"कुछ नहीं.. वेल्ली हूँ" हाहा.. कह कर मैंने बात टाल दी.
"हाहाहा.. काश मैं भी वेल्ला होता.."
मैंने सिर्फ मुस्कुरा दिया.
होता है, होता है!! बेहद मामूली बात है.
अब अगर मैं किसी नैनोबायोटेक्नोलॉजी इंजीनियर से बात करूँगी तो वो भी मुझे वैसाखिनन्दन समझेगा.

"तुम कहाँ रहती हो?"
"आपने वो चौहान हलवाई देखा है?"
"हाँ"
"बस उसकी अगली गली में"
मेरे दिल में अभी भी यह सवाल कौंध रहा था, कही यह शादीशुदा तो नहीं!!
"तो आप अकेले रहते हैं यहाँ पर?"

लीजये, छोड़ दिया मैंने तीर! आर या पार.. 10 सेकंड के अंदर मैंने उसके "हाँ" के लिए मन्नतें मांग ली, 33 करोड़ देवी देवता को याद कर लिया और एक टक लगाए उसकी आँखों में जवाब देखती रही..
हाँ.. फ़िलहाल!
ये फ़िलहाल क्या होता है? मतलब क्या बनता है यह हाँ के साथ फ़िलहाल जोड़ने का.. मतलब क्या बाल विवाह हुआ था और अब घर ढूढ़ लिए शहर में तो बहुरिया का गौना करवा के लाओगे? मन ही मन में खीज गई!

फ़िलहाल? मतलब आपकी वाइफ अभी हैं नहीं यहाँ..?
मैंने झुंझुलाहट में सीधी तलवार खींच दी!
"हाहा.. नहीं, मेरी शादी नहीं हुई है अब तक.."
देखो और समझो ये वाली फीलिंग.
'गवर्नमेंट एग्जाम क्लियर हो गया'
मेरे चेहरे पर मुस्कराहट आ गई और आवाज़ में वोही चहक वापस.
"ओह! ओके.. फिर, भाई या पेरेंट्स?"

अब मुझे फील हुआ मैंने ज्यादा पर्सनल क्वेश्चन पूछ लिए,थोड़ा इस ज़ुबान को लगाम देदेनी चाहिए..
"मेरा पार्टनर" वो बोला..
अरे तेरी! इसको भी कहीं स्टार्टअप का भूत तो नहीं?
कहीं यह उन लौंडों की तरह तो नहीं जो फेसबुक पर लिख के रखते हैं "works at I'm my own boss" या "Ceo and MD at my own business"

आज कल औंतरप्रीनियोर का मतलब होता है आपके भेजे में एक धाँसू बिज़नस या मोबाइल एप्प का आईडिया है लेकिन उसको भुनाने के लिए अभी तक कोई बकरा नहीं फसा है!!
"Okayyy" कह कर मैंने भी "हाँ मैं समझ गई " वाली टोन दे दी.
"so what do you do in your free time? Hobby? Gaming? Gym?" उसने बात बढ़ाई.

लड़के ने इंटरेस्ट ले लिया भाई! अब भाव खाने का टाइम आ चुका है.. आ जाओ अपने लड़की अवतार में।
देखो और समझो. हम लड़कियां बड़ी स्मार्ट होती हैं, देखने में चाहे कैसी भी हो.. जैसे ही पता चलता है कि पतंग हवा में पहुँच चुकी है बस डोर खींच ली. और इस बात में कोई दो राय नहीं की इस नखरे में मज़ा बहुत आता है.
"Yeah.. many!!" मैंने आँखे ततेरते हुए कहा.. और मन में सोचने लगी "पके हुए घीये के बीज.. तुझे किस षष्टिकोन से मैं जिम जाने वाली महिला लगती हूँ!

खैर.. इन्ही छोटी छोटी बातों, मोबाइल टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक मनी,केजरीवाल और मोदी के कारनामे.. ममता दीदी और अखिलेश यादव के ड्रामे.. सोनम गुप्ता की बेवफाई और काले धन के ताने बाने में मेरा नंबर आ चुका था.. मैंने हज़ार का नोट चेंज करवाया तो काउंटर पे बैठा बैंक वाला भी मेरी शकल देखने लगा..
देखो! मेरी सच्ची मुहोब्बत, धैर्य, लालसा, और कर्मठ होने का प्रतीक है यह 1000 का नोट!!
और मेरे बाद उसने भी करवा लिया.
मैंने उसका वेट किया.. (मुझे प्यार हो गया है शायद.)

वो मुस्कुराता हुआ सामने से चला आ रहा था..और मेरे सर के चारो तरफ हाथो में तीर लिए लंगोट पहने छोटे बच्चे उड़ रहे थे.
"My partner is coming in couple of days, if you wish we can go for morning walks.."
उसने सामने खड़े होकर कहा.. और मैं गर्दन उठाए उसे मुस्कुरा कर देख रही थी..
"that means, you're gonna wake me up daily in the morning?"
इसको कहते हैं ट्रम्प कार्ड खेलना.. अब या तो वो मेरी अलार्म क्लॉक बनने के लिए फ़ोन नंबर मांगेगा या मैं खुद ही उसको दे दूँगी.
"haha.. yeah? why not ma'am!.. should I come down your place and ring your bell daily 5am?"
(अबे बौरा गया है क्या, पापा बाँध के बैठा देंगे और कुत्ता छोड़ देंगे तेरे ऊपर)
"haha.. nope.. a phone call would do!!" मैंने डायरेक्ट लाइन देते हुए कहा..
हम साथ साथ चल पड़े.. क्योंकि घर एक ही जगह था और अब तो "पड़ोसी प्रेम" निभाना था!
हालांकि इस दौरान वो काफी बार अपने पार्टनर की बात कर चुका था तो इस बात ने मेरे अंदर क्यूरियोसिटी बढ़ा दी..
..एंड क्यूरियोसिटी किल्स दी कैट! मैंने क्यों पुछा.
"so.. what does your partner do?"
"oh.. he's a business man.. actually we are flying to Ohio next month, he got a job there.." उसने ख़ुशी जाहिर करते हुए कहा.

घर पहुँचने में अभी वक़्त था और मैंने जानबूझ कर अपने कदम धीमे किए हुए थे..अब तक एक एक पल कितना सुहाना लग रहा था.. न ट्रैफिक की चिल पोँ.. न भिखारियों के छूने से चिढ.. कुछ सुनाई नहीं से रहा था बस दिल में हार्ट शेप बबल ऐसे फुट रहे थे मानो फेसबुक मैसेंजर पर किसी ने लव स्टीकर भेज दिया हो.. पट पट..पट..पट..
और उसकी इस बात ने जैसे मेरे हार्ट शेप गुब्बारे में नुकीली पेन्सिल चुभा दी हो!

what? you're leaving India? मैंने चिढ कर कहा.. your friend is getting job there.. you have your life here, I guess" मैंने बड़ा प्रैक्टिकल और मैच्योर बनते हुए कहा..
(काहे ही मैच्योरिटी बे! कैसे जा सकता है ये.. मतलब अब क्या मुझे सिंगल ही रहना पड़ेगा! कुछ भी कर के इसको रोको भाई...)

देखो! प्यार तो प्यार होता है.. 4 साल का होंय 4 दिन का.. और इसके लिए तो इतनी मेहनत भी की है, अपने संकुचित कन्या वाले अवतार से कूद कर, सामाजिक परिधियों को लांघ कर, और खिसियाई हुई नोटबंदी की लाइन को धोखा दे कर साथ चल रही हूँ. मैं क्रन्तिकारी भावनाओं से अभिभूत थी.."प्रेम क्रांतिकारी.. बहुत ही क्रांतिकारी"

और इसी क्रांतिकारी हथकंडो को अपनाते हुए मैंने नंबर एक्सचेंज कर लिया था.. यह मेरे प्रेम की फ़तेह थी!! मैं तारिक़ फ़तेह महसूस कर रही थी.. और दिल में इसको रोकने का षडयंत्र बुन रही थी.
मेरा दिमाग चाचा चौधरी हो चला था क्योंकि मुझे यह 6 फुटिया साबू चाहिए था.

घर पास आने वाला था..वो बोला" yes, actually.. we don't have a life in India"

देखो! प्यार एक तरफ है और राष्ट्रवाद एक तरफ! मैं देख के लिए लाइन में खड़ी हो सकती हूँ.. इतना तो मैं जियो सिम के लिए नहीं खड़ी हुई.. लेकिन इंडिया को कुछ बोला तो अभी शब्दभेदी बाण चालू होंगे और मैं नमस्ते लन्दन की अक्षय कुमार बन जाऊँगी.

"what do you mean?" मैं वहीँ मेडिकल स्टोर के सामने रुक गई, एक आइब्रो उठा कर आवाज़ में थोड़ी सख्ती लाते हुए पूछा.. (गन लोडिड थी, की अगर यह एंटी नेशनल निकला तो मैं अपने प्यार का गला घोंट दूँगी और साले को अभी कच्चा धारी नाग बना कर शपथ दिलवाऊंगी)
"actually.. we are planning to get married in February in Ohio, society doesn't accept us here"
wait! what! मैंने जो सुना वो मुझे समझ नहीं आया और मेरी शक्ल पके हुए पिलपिले खरबूजे सी बन गई (भाई अंतर्जातीय विवाह कर रहा क्या और खाप पंचायत पीछे आ रही?)
प्यार में चोट लग चुकी थी, पल्ले कुछ न पढ़ा और सिर्फ "getting married" समझ आया..
"We are gay and it's not legal in India" उसने आगे कहा.

यह वो वाली फीलिंग थी 'जनरल कोटे के लास्ट चांस में भी प्रिलिमिनरी क्लियर नहीं हुआ, बाकी चीज़ों के लिए उम्र निकल चुकी है, सिर्फ BA pass डिग्री हाथ में है और कोई प्रोफेशनल एक्सपीरियंस नहीं है'

oh!! (और क्या कहती मैं.. इस ओह में आह थी.. आह.. दिल टूटने की आवाज़ नहीं होती)
"that's great.. in that case you must fly.. I'm happy for you.. yeah.. we live in the socity of hypocrites " मैंने अपनी भाव भंगिमा सुधार कर मीठे स्वर में कहा..
I have many gay friends, and they're happily settled in delhi only.. give a second thought.. our society isn't that bad.
यह मेरी रेस्पोंसिब्लिटी बन गई थी की मैं उसको कम्फ़र्टेबल फील करवाऊँ, कहीं वो यह न सोचें कि मैं उसे जज कर रही हूँ.

उसने मुस्कुरा दिया.. अब यह मेडिकल स्टोर सीमा थी उसके एक तरफ वो और कुछ दूर मैं रहती थी..
अलविदा कहने का टाइम था.. "चलो see you again then.." मैंने कहा.

"तुम और नोट एक्सचेंज करवाने जाओगी? साथ चलेंगे.. I'll call?" उसने पूछा
"nope! I am left with nothing now.."दो तरफ़ा बात कहते हुए मैं मुस्कुरा कर आगे चल दी.
आज सुबह 5 बजे की मिस्ड कॉल थी किसी unknown number से.

मेरा KLPD हो चुका था, "खड़ी लाइन पर धोखा.." मैं किसी की सौतन नहीं बनना चाहती थी..
और एक तरफ़ा प्यार बड़ा दर्द देता है, मैं शाहरुख़ नहीं जो डायलॉग मार कर निकल जाऊँ.
बाय द वे.. वैसाखिनन्दन संस्कृत में गधे को कहते हैं.

(समाप्त)

हिमाद्री बरुआ

Tuesday, March 28, 2017

लव इन द टाइम ऑफ़ इलेक्शन: आलोक झा

आलोक झा लोकप्रिय युवा कथाकार हैं l विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से इनकी जीवंत उपस्थिति दिखती है l बेहद सक्रिय बिंदास अल्हड़ व्यक्तित्व, ज़िंदगी का रेशा रेशा महसूसने में यकीन सम्प्रति केरल में शिक्षा के अनगिन प्रयोग कर रहे हैं l पढ़िए इनकी ताज़ातरीन कहानी :

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आलोक झा 
किसी के पास उसकी दस दिन पहले वाली तस्वीर हो तो उसे दिखाये कि वह कितना खुश था ! उसके लब -ओ- लहज़े से लेकर चाल तक गज़ब मचल रही थी !

तो आज उसे क्या हो गया ? यह सवाल उसे देखने वालों को उतना परेशान नहीं कर पा रहा था जितना कि उसे ! बार बार उसे दोस्त का भेजा हुआ राहत इंदौरी का शेर याद आ रहा था । वह बार बार व्हात्सेप खोल कर पढ़ रहा था 

लगेगी आग तो आएँगे कई घर ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है  !

यह शेर दरअसल उसकी उस बात के जवाब में आया था जिसमें उसने अपनी पार्टी के जीतने की खुशखबरी के साथ यह बात भी नत्थी कर दी थी कि अब आएगा मज़ा ! अब दिखाएंगे कटुओं को । दोस्त ने जवाब में कुछ कहने के बजाय यही शेर भेज दिया । उसने भी दोस्त की तरफ जोश जोश में एक जुमला फेंक दिया – ‘तुंहु साले कटुवै बन जाव मुँह फाड़कर हँसते हुए चेहरों के साथ !

जितनी खुशी हुई थी अपनी निज़ामत के आ जाने की सब काफ़ूर हुई जा रही थी । अपनी इसलिए कि उसने इस निज़ामत के लिए दिन रात एक कर काम किया । हर संभव काम ! बाइक पर पार्टी का झण्डा टाँग रैलियों में फिरने से लेकर फ़ेसबुक , व्हात्सेप पर ट्रोलिंग तक । जो लोग उसकी पार्टी के नहीं वे दुश्मन बराबर ! यहाँ तक कि चमकी जिसे प्यार से वह छमकी कहता है उससे मिलने का वक़्त नहीं मिलता था । बस कभी-कताल इनबॉक्स में बात हो गयी तो हो गयी । बात भी क्या बस हाय हेलो !

वह कतई यह नहीं कहता कि ऐसा केवल उसी ने किया । इस तरह का काम वोलेंटियरों ने हर विधान सभा में किए होंगे । और तो और स्वयं उसकी विधान सभा में ऐसे सैकड़ों लड़के थे पेट-भात पर हुआं-हुआं करने वाले (सॉरी, हाँ-हाँ  करने वाले ) ! और ऐसे हुआं  हुआं करने वाले न होते तो पार्टी जीतती क्या ! नोट  उट बंद करके कैसा नरक कर रखा था इन सबने !
अब जब छमकी आ गयी है तो मूल किस्सा हो जाये 

छमकी नाराज़ थी कि अपने छैला लाल पिछले तीन महीने से उसके साथ ठीक से बैठे नहीं हैं बतियाना तो दूर की बात ! लेकिन चुनाव खत्म होने बाद सुकून से बातें होनी शुरू हो गयी । नाराजगी ज्यादा थी लिहाज़ा मान-मनौव्वल का दौर भी घंटों तक चला होगा (यह केवल अनुमान है) । ऐसी ही बातचीत में तय हुआ कि गिनती  के बाद बाहर चलेंगे । बहुत बाहर नहीं तो कम से कम दिल्ली के आनंद विहार से सटे इडीएम या पेसिफिक मॉल तक तो जा ही सकते हैं । साहब ने यह दिन दो लिहाज से चुना था । एक तो इन्हें डर था कि जीतेंगे नहीं और न जीते तो ग़म को भुलाने का इतना बढ़िया इंतज़ाम हो नहीं सकता दूसरे अगर जीत गए तो उसका आनंद छमकी के साथ उठाया जाएगा ! हो सका तो इंडिया गेट चलकर शाम की लाइटिंग देख लेंगे (हालांकि छमकी के माँ बाप 7 बजते ही फोन करने लगते हैं फिर भी छमकी कोई न कोई झूठ बोल ही लेगी ) !

गिनती के दिन तो कमाल ही हो गया ! छैला लाल को क्या उनकी पार्टी के बड़े बड़ों को उम्मीद नहीं थी कि यह चमत्कार हो जाएगा । उम्मीद से भी ज्यादा ! इस पर कौन खुश नहीं होगा ! छैला गज़ब धमाल मचाये रहा दिन भर , गर्दा किए रहा ! एक बार छमकी का फोन भी आया लेकिन उस धूम-धड़क्के में कहाँ आवाज़ सुनाई देती है । वह फिर से उस शोर में घुल गया ! सब निपटाते निपटाते रात हो गयी तो वह घर लौटा । थका इतना था कि छमकी क्या उसे अपनी खबर भी नहीं थी ऊपर से शराब का नशा ! पार्टी की जीत में पार्टी ! ज़ाम आफ्टर ज़ाम वाला मामला था आज तो !

सुबह उठा तो याद आया कि छमकी की जिस नाराजगी को मिटाने के लिए उसने मिलने का प्लान बनाया था वह और बढ़ गयी है क्योंकि मिलना तो दूर वापस फोन तक नहीं कर पाया ! प्रेमी जानते होंगे कि कैसी होती है इस तरह की नाराजगी और अनाड़ियों के लिए लिखने का कोई मतलब भी नहीं है ।

साहब प्रेम तो प्रेम है नाराजगी कब तक रुकेगी ! होते-हवाते दो चार दिनों के भीतर बातें होनी शुरू हो गयी और सप्ताह पूरा होने पर घूमने वाला कार्यक्रम भी बन गया ! सरकार बन गयी थी सो पार्टी का झण्डा बाइक में खोंसकर चलना अब स्टेटस सिंबल ठहरा ! बाइक निकली आगे छैला  पीछे छमकी और सबसे आगे पार्टी का झण्डा लहराता हुआ, मन भीतर से प्रफुल्लित ! छैला सोच रहा था इसी सुख के लिए तो उसने दिन रात एक कर दिया था !

दिन गज़ब रहा । खूब घूमा फिरी के साथ साथ भरपूर और तरह तरह का खाना साथ में ढेरों सेल्फी ! वो छमकी के पिताजी कॉल पर कॉल नहीं करते तो इंडिया गेट की पीली रोशनी में बैठ कर छमकी की फोटो ली जाती , छमकी साबुन के पानी के बुलबुले उड़ाती वह देखता , वे इंडिया गेट पर स्केच बनाने वाले बैठते हैं न उनसे छमकी का स्केच भी बनवाता । सब धरा रह गया छमकी के बाप के चक्कर में ! इसके बाद भी जितना मजा आया न वह बहुत था । कहिए कि दिन बन गया ! दिन बन जाने से बाइक भी धीरे धीरे मगर लय में चल रही थी !

बाइक अभी हाइवे से विजयनगर के लिए मुड़ने ही वाली थी कि कुछ लोगों ने उसे रोक लिया । बिना पूछ ताछ में समय गँवाए छैला को दो चार डंडे धरा दिए । उनके साथ जो लेडी थी लगी छमकी के मुँह में लिपटा हुआ दुपट्टा उतारने । प्रेमी के साथ बाइक पर सवार लड़की को देखने के लिए और प्रेमी पर दो चार हाथ जमा देने की ख़्वाहिश रखने वाले लोग भी आ गए दो चार ! जिन लोगों ने इन्हें रोका था उनमे से एक को फिर से ताव आ गया उसने  छैला को गिन गिन के चार और छमकी को दो डंडे मारे और केवल एक गाली दी – ‘साले रोमियो जूलियट’ ! बहुत सी माफी और माँ बाप के नंबर देने पर दोनों को छोड़ दिया गया । छैला में इतनी हिम्मत नहीं थी कि दर्द , दुख और गुस्से से फुनकती छमकी से घर कैसे जाओगी भी पूछे वह भी उन लोगों के सामने !

पिटे हुए रोमियो को दो दिनों के बाद जूलियट का फोन आया । पिटी हुई तो वह भी थी लेकिन उससे ज्यादा बड़ी और बुरी खबर थी उसके पास । उसने छैला को बताया कि माँ और बाप दोनों के फोन पर उनका एमएमएस पहुँच गया और आगे से उससे मिलने की कोशिश वह न ही करे , फोन भी न करे । साथ में प्लीज़ भी लगाया था । इसकी हालत और खराब हो गयी लगा गर्मी बढ़ रही है चारों ओर से और वह जल रहा है !

किसी तरह हिम्मत कर के छैला ने अपने उसी राहत इंदौरी का शेर भेजने वाले दोस्त को सारा किस्सा साझा कर दिया ! दोस्त भी था जल्लाद ! हँसते हुए बड़े बड़े चेहरे बना कर भेजे । लेकिन जब दया आई तो फिर से राहत साहब की उसी ग़ज़ल का एक शेर  भेज दिया जिसका शेर पहले भेज चुका था । शेर कुछ यूं रहा 

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किरायेदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है  !

छैला को शेर पढ़ते ही भयंकर गुस्सा आ गया । इतना गुस्सा कि दोस्त को ब्लॉक ही कर कर दिया वह भी इस टिप्पणी के साथ  - साले ज़ाती मकान तो नहीं है पर पाँच साल तक ऐसे ही रहेंगे बे इसे झेलते हुए ! दोस्त तो ब्लॉक था कैसे कहता  किए भी तुम्ही हो !


Monday, March 27, 2017

#2# नोटबंदी में आशिक़ी : हिमाद्री बरुआ

नोटबंदी में आशिक़ी

भाग- 2 



तो आप लोगों की दुआ कुछ ऐसी रंग लाई की तीन दिन बाद वो दिख गया.

लेकिन आज कतार में वो इतनी आगे खड़ा था कि मुड़ कर देखे तो भी नज़र ना आऊँ, हाँ.. मैं लेट हो गई, करीब एक-डेढ़ घंटा लगा लीजिए. सुबह सब्ज़ी को लेकर पिताजी के नखरों से चिक चिक करती माँ, कढ़ी में हींग का तड़का लगाने-ना लगाने की संसदीय बैठक और कर्नाटक के मिनिस्टर रेड्डी का अपनी बेटी की में 500 करोड़ का खरचा इसी सब मे मैं फस गई थी. सच कहूं तो मैंने हिम्मत नहीं हारी थी और आखिरी  ट्राय मारने मैं आज फिर चली गई नोटबंदी की कतार में.. ( कल रात तो लंबू का सपना भी देख डाला: (धत्त वैसा वाला नही ) 

बिना नहाए, एक आँख में फैला हुआ काजल, पाजामा डाले, चप्पल पहन और हाथ में एक कलम पकड़ कर यूँ ही चल दी. दिल्लगी का आलम तो देखिए, मात्र 1000 रूपए बदलवाने चली, जो की आसानी से जल बोर्ड के दफ्तर में जमा हो जाते.. लेकिन दिल के कबूतर की गुटरगूँ तो आपने भी सुनी होगी. पहुंची तो इतनी लंबी कतार देख कर मानो अपनी किस्मत को ही सौतन मानने का मन किया.. अंदर वीर ज़ारा के गाने बजने लगे की इन 20 लोगो की झाड़ियों को लांघ कर कैसे उस गन्ने तक पहुँचूँ.. मीठा, रसीला गन्ना आज हाफ पैंट में था और मेरी नज़र उसकी टांगों की तरफ.

मेरी हालात उस आदमी के जैसी हो रही थी जिसने लड़की को इम्प्रेस करने के चक्कर में 4 बोतलें बियर की चढ़ा ली हो और रेस्टोरेंट में यूनिसेक्स बाथरूम हो और आगे 5 लड़कियाँ खड़ी हो. बस मैं कुछ ऐसे ही मचल रही थी और अपने हाव भाव छुपाने की कोशिश भी कर रही थी. 1 घंटा 12 मिनट.. मैं खड़ी रही और वो खुबानी के बीज का कड़वा बादाम एक बार भी पीछे नहीं मुड़ा. जब मुझे यह पक्का हो गया ये हाफ पैंट पीछे मुड़ेगा नहीं.. मुझे ही कुछ तिकड़म लगाना पड़ेगा और फ़ोन कॉल सबसे मस्त होता है.

फ़ोन उठा कर फ़र्ज़ी कॉल लगाते हुए कहा "हाँ मम्मी.. लाइन में खड़ी हूँ.. हेल्लो.. हाँ मम्मी.. "
आगे खड़े लड़के से कहा, भईया आपके पीछे खड़ी एक मिनट में आई कह कर आगे चली गई कि उसकी नज़र में तो आऊँ. फिर कान में खाली फ़ोन लगाए आगे निकल गई.. कनखियों से उसको देखा, और आगे जा कर बाल खोल लिए.. मन ही मन सोचने लगी.. हाय!! नहा लेना चाहिए था.... चुड़ैल तो नही लग रही.. फिर कोने में जा कर फ्रंट कैमरा ऑन किया और आँखों के नीचे का फैला हुआ काजल साफ़ किया. बालों को तो सेट किया और मटकती हुई बिना उसकी तरफ देखे वापस आने लगी की उसकी नज़र मुझ पर पड़ जाए.

लेकिन कहाँ जनाब 2000 के नए नोट की तरह थे और  मैं "पैसे हैं लेकिन पैसे नहीं हैं" वाली हालात में थी.
यहाँ थोड़ी बेशरमी की जरूरत थी और मैंने ही उसके पास जा कर बोल दिया "Oh hi ! You again !"
हाय.. वो मुस्कराहट.. वो बोला "hello, you got your change?"
"Oh no, not yet.. I'm standing way behind you.. guess, would be taking more than 2 hours after you.."

ये मारा मैंने टिपिकल लौंडियों वाला इमोशनल कार्ड और वैसा वाला मुँह. बस गन्दी वाली झंड होती अगर वो "ओके" बोल कर बात ख़त्म कर देता.

"Oh.. okay" वो बोला.. बस फुस.

मन ही मन सोचा लो अब क्या करोगी.. कंटीन्यू दी कन्वर्सेशन बेबी!

"Yeah! And I'm badly getting late for an interview.. it's scheduled for 2 PM.. guess I have to miss it!!"
अजी काहे का इंटरव्यू..! जो आया दिमाग में फिट कर दिया बस.
"Oh! That's bad.. you wanna come ahead me? If it help?"

देखो!! वैसे तो मैं बहुत शांत और संभली हुई कन्या हूँ लेकिन उस वक़्त मानो मेरी मन की मुराद बुधवार वाले भगवान ने सुन ली.. मेरा दिल उस कुत्ते की तरह ख़ुशी से लोट रहा था जिसका मालिक सारे दिन भर के बाद ऑफिस से घर आया हो.
"That would be a great help!  But umm.. " मैंने एक्सेंट झाड़ते हुए बोला और वो समझ गया मैं लोगो की बात कर रही हूँ!

किसी को बीच में घुसा लो तो जनता खाप पंचायत सी भड़कती है जैसे मैं दूसरी जाती की लड़की हूँ और दूजे जाती के लड़के से प्यार कर बैठी!

"It's okay.. just come!"  बस.. उसका यह कहना और मेरा छोटे से बच्चे की तरह बीच में घुस जाना..
और शुरू हो गया हल्ला!! मैंने होंठ दबा लिए की बेज्जती करवा कर पीछे जाना पड़ेगा और उसके सामने भी इम्प्रैशन की मट्टी पलीत होगी.. तभी वो भारी सी आवाज में बोला "क्या दिक्कत है? एक घर के हैं फैमिली है!!"
उसका यह कहना था और बस मैं तो सर से पांव तक ब्याह करने के लिए तैयार हो गई थी.
मुझे उसमे सारे अच्छे गुण दिखने लगे.. और "फॅमिली है" हाय.. शादी ऐसे होगी और बच्चे ऐसे होंगे और हनीमून यहाँ और लॉन्ग ड्राइव वहां. मतलब मेरे गाल फूल कर भटूरा बन गए थे और दिल ऐसे बच्चे की तरह उछल रहा था "मिल गया.. मिल गया..मिल गया.. ये !!!"

देखो!! वैसे तो मैं बेहद शर्मीली कन्या हूँ लेकिन कभी कभी बेशर्म होना पड़ता था!!
एक मेरी अंतर आत्मा उस बेस्ट फ्रेंड की तरह है जो हमेशा नेगेटिव ही कहेगी उस लड़के के लिए जिसको भी मैं डेट करुँगी और ज़िन्दगी भर आपको "डिज़रविंग मैन" के लिए सिंगल रखेगी और साथ में यह डायलॉग जरूर चिपकायेगी "देख मैं तेरी बेस्ट फ्रेंड हूँ और तुझे मुझसे अच्छा कोई नहीं जानता.. दैट गाए इस नॉट गुड फ़ॉर यू.. यू डिज़र्व बेटर" (लड़कियों वाली बात है, वो समझ जाएँगी)
तो मेरी उसी अंतर आत्मा ने थप्पड़ मारा और सोचने पर मजबूर किया "अबे बहन बनाने की तो नहीं सोच रहा.. फ़ेमिली बोल रहा है"

खैर..चिक चिक करते लोग चुप हो चुके थे "अब सिर्फ वो और मैं और ये नोटबंदी की कतार"
हम 2 घंटे लाइन में खड़े रहे.. जनाब का नाम कबीर है..
देखो! मैं बड़ी शांत किस्म की कन्या हूँ, लेकिन कभी कभी शैतानी करनी पड़ती है..
अब 6 फुट लंबा इंसान पीछे खड़ा हो तो बातों में कुछ अजब की लचक आ जाती है..
दो घंटों में मैंने बहुत कुछ किया है, जल्द ही बताती हूँ पहले रात के खाने वाली चिक चिक से ज़रा निपट लूँ..
तब तक आप मुझे बताइये, इन जनाब को पटाने के नुस्खे.

(क्रमशः)















Sunday, March 26, 2017

#२# दिल की डायरी: मन्नत अरोड़ा


फिर हिम्मत बटोर कर ऊपर गयी बाकी सब पीछे ही थे।
पर जितना परेशान थी वैसा अब कुछ भी नहीं था।दरवाजा पूरा का पूरा खुला मिला।
अंदर जाते ही समझ में आया कि लड़कों का मेला आखिर दरवाज़े पे क्यों था?
होटल वालों ने पीने और नाचने का इंतज़ाम सारा दरवाज़े की एक ओर करवा रखा था।
दूसरी और लड़का-लड़की के रोके की रस्म चल रही थी।
एक चोर नज़र लड़के पे--अब वोही सब और लड़कों और पीने की टेबल कुछ साइड पे करवा रहा था।
चलो कुछ तो समझ है।
बाकी सब से मिलके मैंने अपने लिए एक कोना ढूंढ लिया।
जाने क्यों बार-2 ध्यान मेरा उसी की ओर बार-2 जा रहा था।
काफी समय के बाद देखा था।कुछ-2 sincere भी लग रहा था।यूँ तो पहले अजीब-2 मुंह बनाते हुए ही दिखता था।
अरे! height भी निकल आई है।  ;)
ओह! तो बड़े हो गए हैं जनाब जी।चलो शुक्र है थोड़ी-बहुत अक्कल भी आ गयी लगती है।
 यही सोच के खुद ही मुस्कुरा दी।
तभी ध्यान गया वो भी मुस्कुरा रहा है।
अब यह तो सही नहीं है।पता नहीं क्या समझ रहा है।
हद है।
मुझे ही अपना ध्यान हटाना पड़ेगा।वर्ना हम पंजाबियों में यह कहावत तो है ही _लड़की हंसी और पटी।
बेकार का ड्रामा बढ़ जाएगा।
किसी तरह वक़्त बिताया।खाना खाया और घर जाने का वक़्त भी आ गया।
नीचे की ओर जाने लगे सभी।
घर के बड़े आदमियों ने इन्ही वानरों की सेना को सबको घर पहुँचाने का जिम्मा सौंप दिया था।
मैं आगे बढ़ ही नहीं पा रही थी।आगे यह खड़ा था।
इतने में गाड़ी में बैठने को पीछे से कोई ज़ोर से मेरा नाम लेकर पुकारा।
चलो!नाम भी पता चल गया।
शायद उसको यह भी समझ आ गया था कि मैं आगे क्यों नहीं आ रही।
पीछे हटा वो तो जल्दी से कार में बैठी मैं।
मालूम हुआ कि वो कार भी वोही ड्राइव करने वाला है।अब घर भी पता चल जाएगा।कुछ तो थोड़ा-बहुत शक़ था कि मैं कौन हूँ और कहाँ रहती हूँ वो भी दूर हो जायेगा।
(हम काफ़ी रिश्तेदार एक ही गली के मोहल्ले में रहते थे और मैं चूँकि घर से बहुत कम निकलती थी तो बहुत कम लोग जानते थे मुझे)
एक-दो बच्चे भी मेरे ऊपर बैठा दिए गए।साथ में बहुत सी मेरी auntiyan।आगे कौन-2 था– कुछ दिखा नहीं और कुछ मैंने शुक्र भी किया कि न मुझे वो देख पाएगा और न मैं उसे।
जैसे ही घर की गली के बाहर गाड़ी रुकी और मैं उतरी।सीधी गली में तेज़ी से चलती-चले गयी कि अगर ज़रा सा भी थमी या रुकी या पलट के भी देखा तो कोई भूत पकड़ लेगा।
ऐसा लग रहा था कि कोई भूत मेरा पीछा कर रहा था।
जैसे ही घर पहुँची।दरवाज़ा और खुद को अपने कमरे में किया बंद ।
रात काफी हो चुकी थी।
पर नींद कब आई पता नहीं।कितनी देर तक उसकी आवाज़ और कहकहे अपने दोस्तों से ,मेरे दिल और दिमाग में गूंजते रहे।
आज यूँ ही नहीं हुआ इतने साल पीछे ख्यालों का मुझे ले जाना।
कुछ तो ब्लॉक कर रखा था।जो बरबस फिर से उभर आया,नेट से भी जिंदगी जैसे हारते हुए अपनी हर आइडेंटिटी डीएक्टिवेट करते।
फ्रेंड लिस्ट पे एक unknown सी रिक्वेस्ट बिना किसी पिक के।
नाम पढ़ते ही सारा प्रोफाइल छान लिया।
कोई सपना है या मेरा ही कोई ख़्याल वजूद हो आया है ?
यह कैसे हो गया?उसको मालूम भी है कि वो रिक्वेस्ट किसे भेज रहा है?
पिक चाहे कोई नहीं है पर details उसी की ओर इशारा कर रही हैं।
मेरा भी कोई पिक नहीं था।नाम भी फेक ही था।यूँ ही टाइम पास id थी जो कभी ही खोलती थी।
इतने सारे सवाल और एक परेशानी भी।हाथ डीएक्टिवेट का बटन नहीं दबा पाए।
सोचें परेशां कि accept करूँ यां नहीं–यां फिर से ब्लॉक कर दूँ इसे जिंदगी की तरह।
ख्यालों का भी अपना ही एक वजूद होता है।कब उभर आएं,किस मोड़ पे रु-ब-रु हो जाएं कह नहीं सकते।सच खुद को मनवा ही लेता है।जब तक नहीं मानते हक़ीक़त तोड़ती रहती है।
आखिर उसके लिए अभी मैं unknown ही तो थी तो यही सोच के request accept कर ली कि अपनी identity देना तो आखिर मेरे हाथ में ही है।सो जो होगा देखा जाएगा।
उसकी प्रोफाइल से यही लगता था कि बस games के लिए खोली है।
अगले दिन फ्री होकर जैसे ही नेट खोला तो थैंक यू 4 accepting the request का उड़ता हुआ एक message मिला।ऐसा लगा जैसे मैं अपने दिल को खुद ही thanx कह रही हूँ।
अचानक ही मेरा हाथ लैप टॉप की स्क्रीन पे चला गया जैसे छू कर परख रही थी कि कहीं मेरी आँखों का धोखा तो नहीं।
कितनी देर मैसेज को यूँ ही देखती रही।फिर से उसकी प्रोफाइल खोल ली थी।अभी कुछ सोच ही रही थी।
तभी एक दम से ध्यान onl9 लाइट पे चला गया।
जल्दी से सब बंद करना शुरू कर दिया।
पर तब तक chat box खुल गया।और दूसरी तरफ से मैसेज शुरू हो गए।
Hi
How r u?
इधर बिना कुछ सोचे मेरी उँगलियों ने भी जवाब टाइप शुरू कर दिए।
जो पूछा जा रहा था बस उसका कुछ मुनासिब सा जवाब दे कर वोही पलट के मैं भी सवाल किए जा रही थी।
बस इतना ध्यान था कि उसके ख़्याल में भी मेरा नाम न आ जाए कहीं।

(क्रमशः)

मन्नत अरोड़ा 















#१# दिल की डायरी: मन्नत अरोड़ा 

Saturday, March 25, 2017

#1# नोटबंदी में आशिक़ी : हिमाद्री बरुआ

हिमाद्री बरुआ 
आदरणीया हिमाद्री बरुआ बेहद सक्रिय लेखिका हैं. गहरे अकादमिक ट्रेनिंग से आने के बावजूद भाषा में इनकी रवानगी देखते ही बनती है. लगभग सभी लोकप्रिय विधाओं में आपकी लेखनी के रंग की खुशबू बिखरी हुई है. एक सघन व्यक्तित्व जिसमे एक समाज सेविका भी है, उन्मुक्त लेखिका भी है, निर्देशिका भी है, स्त्री अधिकारों की पैरोकार भी है और भी जाने कितना कुछ समाया है इस व्यक्तित्व में. नोटबंदी के अब भी कितने ही मायनों पर बातें होनी हैं...पर बहुधा जो कई नहीं कह पाते, वह व्यंग विधा खिलखिलाते हुए कह जाती है. आइये आस्वादन लें इस विषय पर लेखिका के व्यंगमाला का जिसे नवोत्पल तक पहुँचाया है अपने गौरव कबीर जी ने.                                                                                                             
                                                                                                                              (डॉ. श्रीश)

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 भाग – 1



नोट बंदी में आशिकी 

नोटबंदी ने उन लौंडो को भी दिन भर लाइन में खड़ा कर दिया है जो सिर्फ रात को जिम में बॉडी पंप करके सीधा नाईट क्लब जाते थे. मुझे पता नहीं था मेरी कॉलोनी में इतने गबरू भी हैं जो अब नोटबंदी के स्प्रे से कोने कोने में छुपे कॉकरोचों की तरह बाहर  निकल रहे हैं. परसो स्टेट बैंक की लाइन में लगी थी, दो आदमी छोड़ कर एक 6 फुट का दढ़ियल खड़ा था। कभी देखा नहीं था उसको आते जाते, या दूध की डेरी पर, केमिस्ट में, किराने की दूकान पर. दिल में कबूतर से फड़फड़ा गए उसको देख कर और दूसरी बार पलट कर आँखों में आँखे डाल दी मैंने. लंबा तो था ही, सीधा एंगल बन रहा था नैनमटक्का करने के लिए.

अब दो विकल्प थे मेरे पास, या तो उसको अपने आगे बुला लूँ या अपने पीछे खड़ी दोनों अम्माओं को आगे बढ़ा कर खुद उसके आगे लग जाऊँ. उसको आगे करती तो जनता मुझपर ऐसा पथराव करती मानो गाँव में किसी औरत को चुड़ैल घोषित कर दिया हो जमींदार के छोरो ने. और दिल में बड़े सारे सवाल थे भाई साहब!!
इतना "हॉट" लड़का है, सिंगल तो कतई न होगा. उम्र में छोटा हुआ तो माँ वाली फीलिंग तुरंत से पहले आ जायेगी मेरे अंदर.

बात शुरू कैसे करूँ.. आस पास का है क्या.. दिखा क्यों नहीं अब तक..
कहाँ इन घसियारों की फ़ौज में एक गन्ना उग गया..
और मैं डेस्परेट नहीं लगना चाहती थी.. पैसा जरूरी है..
इसी कश्मकश में मैं एक बार फिर पीछे मुड़ कर उसको देखने लगी.. 'कुछ तो बोल'
फिर मैंने दिल मसोस कर सोचा चलो जाने दो.. मैरीड भी हो सकता है.. बहुत बार कटा है ये "बाद में शादीशुदा निकला" केस में मेरा. बाकी जनता कुछ गालियाँ दे रही थी, कुछ बुद्धिजीवी बनने की कोशिश कर रही थी, कुछ मोबाइल पे केंडी क्रश खेल रही थी और मेरा दिल यहाँ छोले भटूरे हुआ जा रहा था.

कोई "पंच लाइन" भी नहीं सूझ रही थी, सच कह रही हूँ दिमाग की फैक्ट्री में one liners  बनने बन्द से हो गए, कोई आइडिया नहीं आ रहा की कैसे एक बार पीछे मुड़ जाऊँ और बात शुरू हो जाए. हाय, वो सिल्की सिल्की से बालों में उसका हाथ फेरना.. फिर मोबाइल निकाल कर टाइम चेक करना.. फिर टीशर्ट खेंच कर सीधा करना.. चप्पल में भी कितना क्यूट लग रहा था. हिम्मत कर के मैं फिर पीछे मुड़ी और उसको देखा.. कम्बख़त मोबाइल में लगा हुआ था.

करीब 40 मिनट मेरे दिल के जुझारू मुर्गे यूँ ही भिड़ते रहे और मैं उस ख़यालों में चिकन निहारी बनाती रही..
जब रहा नहीं गया, तो पीछे वाली अम्मा को बोला, "अम्मा आपके आगे खड़ी हूँ, एक मिनट में आई" और फ़ोन करने का बहाना करके एक चक्कर काट आई. वापस आते वक्त उसके साथ खड़ी हुई.. और एक स्माइल दे दी..
फिर जा के अपनी जगह खड़ी हो गई. दबंग तो हम बचपन से हैं और अम्मा दोनों बहुओ की बुराई में लगी हैं.. बस फिर पीछे मुड़ कर तुक्के में इतना पूछ लिया "You live somewhere near .... or something? I guess I have seen you somewhere.."

एक मुस्कराहट के साथ उसने भारी आवाज़ में अपना ब्लॉक नंबर बताया.. "Yes, just nearby, next to medical store" और बस.. अब तो मैं शाम तक खड़ी हो सकती थी.
फिर मैंने और कुछ नहीं पूछा.. दो दिन हो गए, अभी तक दोबारा दिखा नहीं है.. अब की मिला तो बस.

(क्रमशः)

Thursday, March 23, 2017

#20# साप्ताहिक विशिष्ट चयन: हमारे बच्चे अंग्रेज़ी पढ़ते ,बोलते हैं / 'मार्टिन जॉन '

मार्टिन जॉन
आदि का पता नहीं और पता नहीं अंत का, पर समय बाँध कलायीं पर लोग बेतहाशा दौड़े जा रहे. एक रेस है, सरपट भागे जा रहे लोग. इस, समय सापेक्ष दौड़ को जाने-अनजाने बच्चों के डी.एन.ए. में रोप दिया है, हमने. बच्चे बचपन में ही बोलने लगे हैं-शट अप, आयम इन टेंशन. उस वक्त हमें उनका टेंशन नहीं, दबाव से उपजा उनका प्लास्टिक आत्मविश्वास और गिटपिट इंग्लिश दिखाई पड़ती है और हम मुस्कुराकर अपनी रेस में आ जुटते हैं. 

साप्ताहिक कविता चयन का यह लगातार बीसवां हफ्ता है, तो यह प्रविष्टि विशिष्ट है और टिप्पणीकार भी विशिष्ट. आदरणीय मार्टिन जॉन रेलवे में अधिकारी रहेआप समकालीन समय के एक संजीदा कवि है. कलम सधी हुई और कलाम मकबूल. कविताओं में गहरी पसरी दैनंदिन समस्याओं पर मुखर साफगोई होती है जिसे कवि करीने से कह जाते हैं.आपकी कविता पर सहज टिप्पणी का योग किया है आदरणीया विमलेश शर्मा जी ने. आप बेहद सजग आब्जर्वर और सक्रिय लेखिका हैं, जो कभी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अन्यतम कविताओं में तो कभी विभिन्न अखबार के आलेखों में और बहुधा आपके कैमरे के उतारे छायाचित्रों में परिलक्षित होता रहता है. आपके फेसबुक के स्टेटस भी संजीदगी और जिंदादिली से भरपूर तो होते ही हैं, उनमें एक प्रेरणास्पद जिजीविषा लिपटी होती है.                                                                                                                                       
                                                                                                                                               (डॉ. श्रीश)

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हमारे बच्चे अंग्रेज़ी पढ़ते , बोलते हैं 

हम ख़ुश हैं कि हमारे बच्चे अंग्रेज़ी पढ़ते , बोलते हैं 
ख़ुशख़बरी बांटना चाहते हैं यह बताते हुए कि 
यह जो ख़ुशी है 
उन तमाम दुखों को धो पोछने की काबिलियत रखती है 
जिन्हें हमने 
हिंदी नामक भाषा रस पीकर झेले थे 
भाषा रस अपने घर का 
यहीं के मिटटी-पानी और हवा से बना 
पीकर हम हृष्ट पुष्ट हुए 
लेकिन ‘रेस’ के मैदान में फिसड्डी ही रहें 
घर का खाया पीया  आदमी 
घर के आस पास ही रह गया |

सुनते हैं एक मुक़ाबले में कछुए की जीत हुई थी 
हमें गर्व है हमारे बच्चे कछुए नहीं बने 
क्योंकि वे अंग्रेज़ी पढ़ते , बोलते हैं |


अंकल चिप्स कुतरते हैं 
डिज़नी के अंकल क्रूज , मिकी माउस , डोनाल्ड डक से 
बतियाते हंसते हैं 
फैंटम और डब्ल्यू डब्ल्यू एफ से 
पहलवानी सीखते हैं 
विस्मिल्लाह खान की शहनाई पर 
झुंझलाते हुए ऊंघने लगते हैं 
जगाने के लिए यो यो हनी सिंह को बुलाना पड़ता है |

इस बात के लिए कतई अफ़सोस नहीं कि
उनके जनरल नॉलेज के दरवाजे पर 
प्रेमचंद , दिनकर अभी भी ‘क्यू’ में हैं 
जबकि सलमान रुश्दी , विक्रम सेठ , चेतन भगत और 
झुम्पा लाहिड़ी  ‘खिडकियों’ से 
बहुत पहले अन्दर समा चुके हैं 
शकुंतला पुत्र भरत और भारत को अपनी ज़ुबान से 
कोसों दूर रखते हैं 
क्योंकि भारत नामक मरियल घोड़े पर इंडिया की सवारी 
उनके दिलो-दिमाग को सुकून पहुँचाने लगी है |
म्यूजिक लवर्स की सर्किल में अग्रणी रहने के लिए 
ब्रिटनी स्पीयर्स , जेनेट जैक्सन , जस्टिन को 
अपने स्पेनिश गिटार में उतार चुके हैं |
चुकि वे अंग्रेज़ी बोलते हैं, 

रोनाल्ड , रोज़र मूर , जेनिफर लापेज , एंजिलीना , निकोल किडमेन की 
तस्वीरें उनकी क़िताबों के साथ चलतीं हैं 
हंसती हैं , मुस्कराती हैं |

अंग्रेज़ियत के ‘फीलगुड’ के लिए 
‘स्पाइडर मैन’, ‘आयरन मैन’, ‘टर्मिनेटर’,’स्पेक्टर’ और 
‘इंटरनल अफेयर्स’ को दर्जनों बार 
आंखों के रास्ते भीतर उतार चुके हैं |
हमारी भी भरसक यही कोशिश रहती है कि
अंग्रेज़ी पढने , बोलने वाले हमारे बच्चे 
मीरा , तुलसी , कबीर के ‘वायरस’ से दूर ही रहे 
ताकि इस हक़ीक़त से रु-ब-रु न होना पड़े कि
हिंदी पढने , खाने ,पहनने , बिछाने वालों को 
साल में एक ही बार हिंदी-पर्व मनाने का अवसर मिलता है |
हम खुश हैं कि हमारे बच्चे अंग्रेज़ी पढ़ते , बोलते हैं 
हर रोज़ हम उन्हें ग़ालिब के तर्ज पर समझाते आ रहें हैं –
“...हमें मालूम है हुकूमत की हक़ीकत मगर 
दिल बहलाने के लिए हिंदी का ख्याल अच्छा है |” 


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विमलेश शर्मा
‘हमारे बच्चे अंग्रेजी पढ़ते, बोलते हैं’ कविता पर बात करने से पहले यह बात कहनी होगी कि कवि का रचाव उम्दा है, यही कारण है कि किसी एक कविता का चयन करना खासा मुश्किल काम रहा है।

कविता में शब्दों के गहरे अर्थ होते हैं। ये अर्थ किसी न किसी रूप में बाह्य यथार्थ के अनुभवों से संबंध रखते हैं। कविता में लिखा हर शब्द एक कचोट है, एक टीस की पौध है या फिर उजास की कौंध है। वह दरअसल हर काल खण्ड में समय के किसी रक्तिम टुकड़े की उपज है। हम संक्रमित समय में जी रहे हैं। मान्यताओं, आस्थाओं, धारणाओं और खंडित होते विश्वास के दौर में हम अक्रिय हो गए हैं। हमारी परम्परा के उच्च जो प्रायः साधारण जन द्वारा सतत , सहजभाव से संपोषित होते रहे हैं, वर्तमान में मध्यवर्ग द्वारा तोड़े जा रहे हैं। तीस पर पाश्चात्य संस्कृति का सम्मोहन इतना मारक है कि हम अपनी जबान तक बिसरा चुके हैं और जब कोई इस बात को कहता है तो फिर उस पर ठेठ हिन्दीवादी या पिछड़ा होने का ठप्पा लगा हम मखौल उड़ाने से भी नहीं चूकते हैं । यही बिन्दू कविता के केन्द्रीय भाव को रेखांकित करते हैं । एक कवि  मन यह सब शिद्दत से महसूस करता है औऱ उसकी यह टीस ज़ाहिर होती है, ‘हमारे बच्चे अंग्रेज़ी पढ़ते, बोलते हैं’ कविता में। 

कवि इस कविता के ब्याज से  ना सिर्फ़ अपने बचपन, हिंदी की स्थिति,  मोहभंग, आधुनिक समाज का दोमुँहापन औऱ उसकी मान्यताओं पर करारा व्यंग्य कसता है, वरन् उस कविधर्म का भी निर्वहन करता है जिसकी बात प्रेमचंद या गुप्त करते हैं। इस कविता के प्रिय होने का कारण कविता का विषय और उसकी सहज प्रस्तुति  है। यह कविता बेहद संजीदगी से आत्मालोचन करने पर मजबूर करती है। हम अंग्रेजीदां हैं औऱ खुश होते हैं, जब हमारे बच्चे तुतलाती जबान में भी उस अंग्रेजी को ठीक-ठीक बोलते हैं, जिसने हमारे दिलोदिमाग पर कब्जा कर लिया है। आज के बच्चों की चिंता हिन्दी के वे हिज्जे हैं जिन्हें वे बहुत अभ्यास के बाद भी ठीक से नहीं लगा पाते। कवि इस बात को अतीत के आलोक में देखता है और सोचता है कि आखिर ऐसा क्यों है, इसका दोष वह स्वयं पर मढ़ता है, कि वह स्वयं अपनी ग्रंथियों को अंग्रेजी की आड़ में मुक्त होने का कुछ स्थान देना चाहता है। कवि की टीस के पीछे वह धारणा है कि हिन्दी रोजगार के बेहतर अवसर औऱ विशेष सामाजिक प्रस्थिति प्रदान करने में असफल है ।  प्रतिस्पर्धा के इस युग में, दौड़ में फिसड्डी रहने के कारण ही कवि कहता है कि, “घर का खाया-पीया आदमी घर के आस-पास ही रह गया।”

संस्कृति ने वैश्विकता के एक मिथक को रचा है और जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं वह केवल छवियों का संसार है। यह दरअसल आभासी की यथार्थ में घुसपैठ है। हाइपर रिअल्टी के इस समय में विचारों की आवाजाही परिवेश तय करता है, और परिवेश  केवल वही सब परोसता है जो बाज़ार चाहता है। नन्हीं फसल हाईटैक है,इस रंगबिरंगे बाज़ार में एक से बढ़कर एक कार्टून चरित्र उनके आदर्श हैं औऱ यही कारण है कि हनुमान, भीम जैसे देशज और स्वतंत्रता के रणबांकुरों जैसे उदात्त किरदार उनकी स्मृतियों से दूर हैं। वे अपनी उस तमाम संस्कृति से महरूम है जो टैगोर के शब्दों में अलसाती है, सूर,तुलसी, मीरा की गोद में हुलसती है और प्रेमचंद की जबान में गोदान का होरी रचती है । इस कविता की चिंता है कि अब कोई हामिद, चिमटे के लिए ईदगाह नहीं जा पाएगा क्योंकि उसकी कल्पना शक्ति का रिमोट बाज़ार और उसके प्रस्तोता टी.वी के हाथ में है। आज के पीढ़ी के आदर्श  सलमान रश्दी, विक्रम सेठ औऱ चेतन भगत सरीखे रचनाकार है। वह उन लेखकों से अनजान है जो ठेठ हिंदी के ठाठ रहे हैं। कवि का दर्द, तंज के साथ इन पंक्तियों में साफ झलकता है-“शंकुतला पुत्र भरत  औऱ भारत को अपनी जुबान से/ कोसो दूर रखते हैं/क्योंकि भारत नामक मरियल घोड़े पर इंडिया की सवारी/ उनके दिलो दिमाग को सुकून पहुँचाने लगी है।”

व्यंग्य परोसता कवि अनेक संदर्भों से पश्चिम की उस  मानसिकता के अनेक उदाहरण दे देता है जिसमें नयी पीढ़ी औऱ बचपन आकंठ डूबा है। उनके नायक , महानायक विदेशी हैं , औऱ इस प्रकार दबे पाँव , देश के भीतर ही जाने कब दूसरे देश और संस्कृति की घुसपैठ हो चुकी है, हम जान ही नहीं पाए। यह संस्कृति अभिज्ञान शांकुतलम् और आषाढ़े प्रथमे दिवसे के उस जादू से दूर है जो अपनी प्रखर काव्य भाषा औऱ जीवनासक्ति के प्रति अदम्य जिजीविषा रखते हुए जीवन का हार्दिक उत्सव मनाती हैं। प्रकृति और उसकी सात्विकता से दूर हो ,यांत्रिक बन रही नयी पीढ़ी कवि की चिंता का विषय है , जो कविता को वृहत्तर कैनवास प्रदान करती है। वैसे तो शीर्षक पर बात करना बेमानी है , पर जब कविता का शीर्षक देने की भारतीय परम्परा है ही तो , मेरा मानना है कि कविता का शीर्षक कुछ औऱ रोचक लिखा जा सकता था, यही बात कवि की अन्य कविताओं के लिए भी कहना चाहूँगी।

कलाओं को संस्कृति की सौंधी खुशबू बचाने के लिए शब्दचित्रों के माध्यम से ऐसे ही सेतु बनाने होंगे जो नयी पीढ़ी की संवेदनाओं तक पहुँचने का जरिया हो। इस कविता के माध्यम से कवि का प्रयास उस भाषा औऱ संस्कृति को बचाने का है जिससे नयी पौध में  जीवन औऱ कविता में रस बचा रहे। यह कविता उस समय और भी ज़रूरी हो जाती है, जब शैक्षिक संस्थानो में हिन्दी केवल आयोजनों का स्मारक बनने जा रही हो।  ‘हमारे बच्चे अंग्रेजी पढ़ते, बोलते हैं’  कविता के माध्यम से अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय पर बात करने का अवसर देने के लिए कवि को पुनः बधाई। कविता की सहजता, व्यंग्य के छीटें औऱ सपाटबयानी इस कविता का वैशिष्ट्य हैं।