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Thursday, March 23, 2017

#20# साप्ताहिक विशिष्ट चयन: हमारे बच्चे अंग्रेज़ी पढ़ते ,बोलते हैं / 'मार्टिन जॉन '

मार्टिन जॉन
आदि का पता नहीं और पता नहीं अंत का, पर समय बाँध कलायीं पर लोग बेतहाशा दौड़े जा रहे. एक रेस है, सरपट भागे जा रहे लोग. इस, समय सापेक्ष दौड़ को जाने-अनजाने बच्चों के डी.एन.ए. में रोप दिया है, हमने. बच्चे बचपन में ही बोलने लगे हैं-शट अप, आयम इन टेंशन. उस वक्त हमें उनका टेंशन नहीं, दबाव से उपजा उनका प्लास्टिक आत्मविश्वास और गिटपिट इंग्लिश दिखाई पड़ती है और हम मुस्कुराकर अपनी रेस में आ जुटते हैं. 

साप्ताहिक कविता चयन का यह लगातार बीसवां हफ्ता है, तो यह प्रविष्टि विशिष्ट है और टिप्पणीकार भी विशिष्ट. आदरणीय मार्टिन जॉन रेलवे में अधिकारी रहेआप समकालीन समय के एक संजीदा कवि है. कलम सधी हुई और कलाम मकबूल. कविताओं में गहरी पसरी दैनंदिन समस्याओं पर मुखर साफगोई होती है जिसे कवि करीने से कह जाते हैं.आपकी कविता पर सहज टिप्पणी का योग किया है आदरणीया विमलेश शर्मा जी ने. आप बेहद सजग आब्जर्वर और सक्रिय लेखिका हैं, जो कभी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अन्यतम कविताओं में तो कभी विभिन्न अखबार के आलेखों में और बहुधा आपके कैमरे के उतारे छायाचित्रों में परिलक्षित होता रहता है. आपके फेसबुक के स्टेटस भी संजीदगी और जिंदादिली से भरपूर तो होते ही हैं, उनमें एक प्रेरणास्पद जिजीविषा लिपटी होती है.                                                                                                                                       
                                                                                                                                               (डॉ. श्रीश)

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हमारे बच्चे अंग्रेज़ी पढ़ते , बोलते हैं 

हम ख़ुश हैं कि हमारे बच्चे अंग्रेज़ी पढ़ते , बोलते हैं 
ख़ुशख़बरी बांटना चाहते हैं यह बताते हुए कि 
यह जो ख़ुशी है 
उन तमाम दुखों को धो पोछने की काबिलियत रखती है 
जिन्हें हमने 
हिंदी नामक भाषा रस पीकर झेले थे 
भाषा रस अपने घर का 
यहीं के मिटटी-पानी और हवा से बना 
पीकर हम हृष्ट पुष्ट हुए 
लेकिन ‘रेस’ के मैदान में फिसड्डी ही रहें 
घर का खाया पीया  आदमी 
घर के आस पास ही रह गया |

सुनते हैं एक मुक़ाबले में कछुए की जीत हुई थी 
हमें गर्व है हमारे बच्चे कछुए नहीं बने 
क्योंकि वे अंग्रेज़ी पढ़ते , बोलते हैं |


अंकल चिप्स कुतरते हैं 
डिज़नी के अंकल क्रूज , मिकी माउस , डोनाल्ड डक से 
बतियाते हंसते हैं 
फैंटम और डब्ल्यू डब्ल्यू एफ से 
पहलवानी सीखते हैं 
विस्मिल्लाह खान की शहनाई पर 
झुंझलाते हुए ऊंघने लगते हैं 
जगाने के लिए यो यो हनी सिंह को बुलाना पड़ता है |

इस बात के लिए कतई अफ़सोस नहीं कि
उनके जनरल नॉलेज के दरवाजे पर 
प्रेमचंद , दिनकर अभी भी ‘क्यू’ में हैं 
जबकि सलमान रुश्दी , विक्रम सेठ , चेतन भगत और 
झुम्पा लाहिड़ी  ‘खिडकियों’ से 
बहुत पहले अन्दर समा चुके हैं 
शकुंतला पुत्र भरत और भारत को अपनी ज़ुबान से 
कोसों दूर रखते हैं 
क्योंकि भारत नामक मरियल घोड़े पर इंडिया की सवारी 
उनके दिलो-दिमाग को सुकून पहुँचाने लगी है |
म्यूजिक लवर्स की सर्किल में अग्रणी रहने के लिए 
ब्रिटनी स्पीयर्स , जेनेट जैक्सन , जस्टिन को 
अपने स्पेनिश गिटार में उतार चुके हैं |
चुकि वे अंग्रेज़ी बोलते हैं, 

रोनाल्ड , रोज़र मूर , जेनिफर लापेज , एंजिलीना , निकोल किडमेन की 
तस्वीरें उनकी क़िताबों के साथ चलतीं हैं 
हंसती हैं , मुस्कराती हैं |

अंग्रेज़ियत के ‘फीलगुड’ के लिए 
‘स्पाइडर मैन’, ‘आयरन मैन’, ‘टर्मिनेटर’,’स्पेक्टर’ और 
‘इंटरनल अफेयर्स’ को दर्जनों बार 
आंखों के रास्ते भीतर उतार चुके हैं |
हमारी भी भरसक यही कोशिश रहती है कि
अंग्रेज़ी पढने , बोलने वाले हमारे बच्चे 
मीरा , तुलसी , कबीर के ‘वायरस’ से दूर ही रहे 
ताकि इस हक़ीक़त से रु-ब-रु न होना पड़े कि
हिंदी पढने , खाने ,पहनने , बिछाने वालों को 
साल में एक ही बार हिंदी-पर्व मनाने का अवसर मिलता है |
हम खुश हैं कि हमारे बच्चे अंग्रेज़ी पढ़ते , बोलते हैं 
हर रोज़ हम उन्हें ग़ालिब के तर्ज पर समझाते आ रहें हैं –
“...हमें मालूम है हुकूमत की हक़ीकत मगर 
दिल बहलाने के लिए हिंदी का ख्याल अच्छा है |” 


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विमलेश शर्मा
‘हमारे बच्चे अंग्रेजी पढ़ते, बोलते हैं’ कविता पर बात करने से पहले यह बात कहनी होगी कि कवि का रचाव उम्दा है, यही कारण है कि किसी एक कविता का चयन करना खासा मुश्किल काम रहा है।

कविता में शब्दों के गहरे अर्थ होते हैं। ये अर्थ किसी न किसी रूप में बाह्य यथार्थ के अनुभवों से संबंध रखते हैं। कविता में लिखा हर शब्द एक कचोट है, एक टीस की पौध है या फिर उजास की कौंध है। वह दरअसल हर काल खण्ड में समय के किसी रक्तिम टुकड़े की उपज है। हम संक्रमित समय में जी रहे हैं। मान्यताओं, आस्थाओं, धारणाओं और खंडित होते विश्वास के दौर में हम अक्रिय हो गए हैं। हमारी परम्परा के उच्च जो प्रायः साधारण जन द्वारा सतत , सहजभाव से संपोषित होते रहे हैं, वर्तमान में मध्यवर्ग द्वारा तोड़े जा रहे हैं। तीस पर पाश्चात्य संस्कृति का सम्मोहन इतना मारक है कि हम अपनी जबान तक बिसरा चुके हैं और जब कोई इस बात को कहता है तो फिर उस पर ठेठ हिन्दीवादी या पिछड़ा होने का ठप्पा लगा हम मखौल उड़ाने से भी नहीं चूकते हैं । यही बिन्दू कविता के केन्द्रीय भाव को रेखांकित करते हैं । एक कवि  मन यह सब शिद्दत से महसूस करता है औऱ उसकी यह टीस ज़ाहिर होती है, ‘हमारे बच्चे अंग्रेज़ी पढ़ते, बोलते हैं’ कविता में। 

कवि इस कविता के ब्याज से  ना सिर्फ़ अपने बचपन, हिंदी की स्थिति,  मोहभंग, आधुनिक समाज का दोमुँहापन औऱ उसकी मान्यताओं पर करारा व्यंग्य कसता है, वरन् उस कविधर्म का भी निर्वहन करता है जिसकी बात प्रेमचंद या गुप्त करते हैं। इस कविता के प्रिय होने का कारण कविता का विषय और उसकी सहज प्रस्तुति  है। यह कविता बेहद संजीदगी से आत्मालोचन करने पर मजबूर करती है। हम अंग्रेजीदां हैं औऱ खुश होते हैं, जब हमारे बच्चे तुतलाती जबान में भी उस अंग्रेजी को ठीक-ठीक बोलते हैं, जिसने हमारे दिलोदिमाग पर कब्जा कर लिया है। आज के बच्चों की चिंता हिन्दी के वे हिज्जे हैं जिन्हें वे बहुत अभ्यास के बाद भी ठीक से नहीं लगा पाते। कवि इस बात को अतीत के आलोक में देखता है और सोचता है कि आखिर ऐसा क्यों है, इसका दोष वह स्वयं पर मढ़ता है, कि वह स्वयं अपनी ग्रंथियों को अंग्रेजी की आड़ में मुक्त होने का कुछ स्थान देना चाहता है। कवि की टीस के पीछे वह धारणा है कि हिन्दी रोजगार के बेहतर अवसर औऱ विशेष सामाजिक प्रस्थिति प्रदान करने में असफल है ।  प्रतिस्पर्धा के इस युग में, दौड़ में फिसड्डी रहने के कारण ही कवि कहता है कि, “घर का खाया-पीया आदमी घर के आस-पास ही रह गया।”

संस्कृति ने वैश्विकता के एक मिथक को रचा है और जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं वह केवल छवियों का संसार है। यह दरअसल आभासी की यथार्थ में घुसपैठ है। हाइपर रिअल्टी के इस समय में विचारों की आवाजाही परिवेश तय करता है, और परिवेश  केवल वही सब परोसता है जो बाज़ार चाहता है। नन्हीं फसल हाईटैक है,इस रंगबिरंगे बाज़ार में एक से बढ़कर एक कार्टून चरित्र उनके आदर्श हैं औऱ यही कारण है कि हनुमान, भीम जैसे देशज और स्वतंत्रता के रणबांकुरों जैसे उदात्त किरदार उनकी स्मृतियों से दूर हैं। वे अपनी उस तमाम संस्कृति से महरूम है जो टैगोर के शब्दों में अलसाती है, सूर,तुलसी, मीरा की गोद में हुलसती है और प्रेमचंद की जबान में गोदान का होरी रचती है । इस कविता की चिंता है कि अब कोई हामिद, चिमटे के लिए ईदगाह नहीं जा पाएगा क्योंकि उसकी कल्पना शक्ति का रिमोट बाज़ार और उसके प्रस्तोता टी.वी के हाथ में है। आज के पीढ़ी के आदर्श  सलमान रश्दी, विक्रम सेठ औऱ चेतन भगत सरीखे रचनाकार है। वह उन लेखकों से अनजान है जो ठेठ हिंदी के ठाठ रहे हैं। कवि का दर्द, तंज के साथ इन पंक्तियों में साफ झलकता है-“शंकुतला पुत्र भरत  औऱ भारत को अपनी जुबान से/ कोसो दूर रखते हैं/क्योंकि भारत नामक मरियल घोड़े पर इंडिया की सवारी/ उनके दिलो दिमाग को सुकून पहुँचाने लगी है।”

व्यंग्य परोसता कवि अनेक संदर्भों से पश्चिम की उस  मानसिकता के अनेक उदाहरण दे देता है जिसमें नयी पीढ़ी औऱ बचपन आकंठ डूबा है। उनके नायक , महानायक विदेशी हैं , औऱ इस प्रकार दबे पाँव , देश के भीतर ही जाने कब दूसरे देश और संस्कृति की घुसपैठ हो चुकी है, हम जान ही नहीं पाए। यह संस्कृति अभिज्ञान शांकुतलम् और आषाढ़े प्रथमे दिवसे के उस जादू से दूर है जो अपनी प्रखर काव्य भाषा औऱ जीवनासक्ति के प्रति अदम्य जिजीविषा रखते हुए जीवन का हार्दिक उत्सव मनाती हैं। प्रकृति और उसकी सात्विकता से दूर हो ,यांत्रिक बन रही नयी पीढ़ी कवि की चिंता का विषय है , जो कविता को वृहत्तर कैनवास प्रदान करती है। वैसे तो शीर्षक पर बात करना बेमानी है , पर जब कविता का शीर्षक देने की भारतीय परम्परा है ही तो , मेरा मानना है कि कविता का शीर्षक कुछ औऱ रोचक लिखा जा सकता था, यही बात कवि की अन्य कविताओं के लिए भी कहना चाहूँगी।

कलाओं को संस्कृति की सौंधी खुशबू बचाने के लिए शब्दचित्रों के माध्यम से ऐसे ही सेतु बनाने होंगे जो नयी पीढ़ी की संवेदनाओं तक पहुँचने का जरिया हो। इस कविता के माध्यम से कवि का प्रयास उस भाषा औऱ संस्कृति को बचाने का है जिससे नयी पौध में  जीवन औऱ कविता में रस बचा रहे। यह कविता उस समय और भी ज़रूरी हो जाती है, जब शैक्षिक संस्थानो में हिन्दी केवल आयोजनों का स्मारक बनने जा रही हो।  ‘हमारे बच्चे अंग्रेजी पढ़ते, बोलते हैं’  कविता के माध्यम से अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय पर बात करने का अवसर देने के लिए कवि को पुनः बधाई। कविता की सहजता, व्यंग्य के छीटें औऱ सपाटबयानी इस कविता का वैशिष्ट्य हैं।



Tuesday, March 21, 2017

मेरे प्रिय कवि /विमल चन्द्र पाण्डेय/ की कविता- प्रशांत पाण्डेय


"Poetry is a window onto the breath-taking diversity of humanity." — Irina Bokova, UNESCO Director-General

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प्रशांत पाण्डेय*
वर्ल्ड पोएट्री डे पर वैसे तो कोई बाध्यता नहीं थी कि कोई कविता साझा करूं लेकिन खुद को रोक इसलिए नहीं पाया क्योंकि मेरी कविता पढ़ने और समझने की शुरुआत जिस कवि की कविताओं से हुई वो विमल चंद्र पाण्डेय हैं l उनसे पहले स्कूल के कोर्स में शामिल बहुत से कवियों की जटिल व्याखायाएं मास्टरों से समझ नहीं पाया l 

विमल की कविता 'हम जो एकांत में होते हैं' से सबसे पहला वास्ता हुआ l 
उन दिनों मैं नौकरी छोड़ अपने आपको समय देने में लगा था l जिन्दगी में सबकुछ रोक देना चाहता था और तभी इस कविता ने मुझे जकड़ लिया l विमल की ये कविता किसी प्रवाह का राह नहीं देखती और शायद यही वजह है कि इसमें कहने की वो सरल ताकत है जिसका असर आप पर बढ़ता है l आपको याद आते हैं वो दिन जब आप अपने अस्तित्व के भ्रम में थे, आप ढो रहे थे उस छवि को जो आपके बढ़ने के बाद समाज ने हर दिन लादी थी आप पर और इस बोझे को ये कविता मानो हाथ लगाकर नीचे रख देती है l 

ये कविता नये बिम्ब में आपका प्रवेश कराती है l जब वो बात महान ( जिन्हे हमने एक खांचे में रख लिया है) शख्सियतों की करते हैं और कहते हैं कि शायद उनका अकेलापन भी हमसे अलग न होगा l उनका असुरक्षित भाव हमारी बेसब्रियों जैसा होगा l उनकी कविताओं का गुस्सा एक रहस्यमय आकर्षण लिये चलता है, जिसमें नकारात्मकता की जगह नया दृष्टिकोण उपजता है l 

ये विद्रोही कविताएं नहीं है, उतनी मुखर भी नहीं है, वो तो बस जस का तस वही कह रहे हैं जो है भले ही वो जैसा भी हो l 
निष्कर्षतया कहा जा सकता है कि जिज्ञासाओं की कोई जगह नहीं इन कविताओं में l इनका अधूरापन इनका सम्मोहन है। मैं झूठ नहीं बोलूंगा, ठीक उनकी कविताओं की तरह मैं बार बार विमल की कविताओं पर लौटता हूं...!
अपनी बात कहने के लिए..अपना गुस्सा..अपना प्यार ..अपना नगण्य सा विरोध जताने के लिए। 


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हम जो एकांत में होते हैं, वही हैं 


रात के दो बजे अचानक चाय की तलाश में टहलने निकले
विमल चन्द्र पाण्डेय

सड़कें, गलियाँ, रात, सब सुनसान
हमेशा भीड़ भरे उस संगमरमरी फर्श को सुनसान पाकर थूका था तुमने
उस हीरोइन के पोस्टर में जाकर तुमने दबाए थे उसके स्तन
और नोच कर फेंक दिए थे नेताओं के हाथ जोड़ते विज्ञापन

जब हमें कोई नहीं देख रहा होता है
हमारा असली किरदार बाहर आकर चिल्लाता है गहरी उत्तेजना से

किसी के बारे में हमारे असली विचार वही हैं
जो हम उसकी पीठ पीछे बिखेरते हैं और उड़ा देते हैं धज्जियाँ

मैं तुम्हें औरतों की इज्जत करने वाला समझता था दोस्त !
जब तक शराब पीकर टेरेस पर उस दिन तुमने नहीं दी थीं
दुनिया की सारी औरतों को गंदी गालियाँ
मैं कोई स्त्रीवादी नहीं हूँ लेकिन मेरी माँ एक औरत है
इसलिए तुम्हें वहाँ से धकेल देने से बचने के लिए जरूरी था एक तमाचा
बड़े हादसे टालने के लिए कई बार जरूरी होती है त्वरित प्रतिक्रिया

सिगरेट में कहाँ छिपी होती है मौत
शराब में कहाँ घुली होती हैं गालियाँ
हथेलियों को जोड़ने में कैसे घुसता है उनके बीच आदरभाव
कैसे निकालेंगे एक दूसरे में घुली-मिली छिपी चीजें
तुम्हारी हँसी की यादों में किधर छिपी है मेरी असाध्य बीमारी
मेरे जीवन के रिसते जाने का राज

अकेलेपन को लेकर ही सबसे ज्यादा सवाल रहे हैं मन में
फिल्मी कलाकार क्या सोचते होंगे एकांत में
क्या वे भी याद करते होंगे अपने बचपन के दोस्त का उधार
उसे चुकाने के बारे में
क्या सोचते होंगे प्रधानमंत्री अगर अकेले हुए कभी
उन्हें अपने खाली बिना दबाव के पुराने दिन बुलाते होंगे क्या
क्या सोचा होगा अपने आखिरी एकांत में भगत सिंह ने
हत्था खींचे जाने के ठीक पहले
उन्हें अंदाजा होगा कि उनके जाने के बाद कागजों पर ही होंगी ज्यादातर क्रांतियाँ
क्या सोचा होगा गांधी ने गोली खाने के बाद
सिर्फ नोट पर रह जाने जैसी भयानक बात का उन्हें अंदाजा होगा क्या
सलीब पर ठोके जाने के बाद ईशु क्या सोच रहे होंगे अपने भीतर के एकांत में
अपने हत्यारों के लिए किस मन से की होगी उन्होंने माफ किए जाने की प्रार्थना

रात में कितने अपने लगते हैं खाली पार्क
दिन में ट्रैफिक जाम से जूझती सड़कें, सन्नाटे में अश्लील सी
अपने होने का अर्थ पूछती
तुम्हें पेशाब लगी और सामने नाली होने के बावजूद
हँसते हुए चले गए तुम दस कदम आगे रसूल मियाँ के घर के दरवाजे पर

हम जो एकांत में होते हैं
वहीं हैं दरअसल पूरी तरह
अच्छे, बुरे, गलत, सही
लेकिन वही, बिल्कुल वही


*प्रशांत पाण्डेय लोकप्रिय टीवी एंकर हैं, सम्प्रति ईटीवी में कार्यरत 

Monday, March 20, 2017

#१# दिल की डायरी: मन्नत अरोड़ा

दिल की डायरी:साभार-गूगल 

यूँ ही तो मिले थे हम...!

हादसे हो जाते हैं जिंदगी में, अब सब कुछ अपनी मर्ज़ी या फ़ितरत से हो यह भी तो जरूरी नहीं। मेरे लिए वो एक सिरफिरा या मनचला लड़का ही तो था जो कि मुझे अक्सर नापसंद थे। हैरान थी मैं खुद पे, कि आज मुझे यह क्या हो गया।मैं उसी को ही क्यों देखे जा रही हूँ। दिमाग खराब हो गया लगा मुझे अपना। खुद को गालियां भी दिए जा रही थी कि यह पसंद है तेरी और मुस्कुरा भी रही थी और उसको उसकी शरारतों के साथ देखे भी जा रही थी।
वैसे कई बार टोटली मेमोरी लॉस जैसा हादसा होना भी काफी डेंजरस होता है सेहत के लिए।

उम्र कोई उन्नीस-बीस।अब कुछ उन्नीस-बीस हो भी यह भी जरूरी था क्या??
ग्रेजुएशन लास्ट इयर।रोज़ की मम्मी-पापा की नए- नए शादी के प्रस्तावों की झिक-झिक कि पढ़ के करना क्या है?? लड़कियों को तो बस खाना बनाना ही आना चाहिए। (पंजाबी लड़का भी कोई कहाँ मिलेगा ज्यादा पढ़ा-लिखा। ज्यादातर दसवीं पास और फैमिली बिज़नस में हैं! ) वैसे तो इक्का-दुक्का पे ही अपनी राय देनी पड़ती क्योंकि ज्यादातर तो पापा ही नामंजूर कर देते थे। बाकियों को मैं। फिर मम्मी का रोज़ बुड़-बड़ाना कि फलां की शादी  साल पहले ही हो गई,ताड़ जितनी लम्बी हो गई है वगैरा। पापा का समझाना कि लम्बी हाइट होना कोई बुरी बात भी नहीं है।अब अपने माँ-बाप पे ही तो जायेगी न।अब इस से शादी थोड़े न कर दूं। मुझे भी सबसे ज्यादा ख़ुशी रिश्ता कैंसिल करके ही मिलती थी।

अब कुछ इसी बेकार की और भी अपनी ही तरह की कुछ और टेंशन्स के साथ मुझे एक पारिवारिक पार्टी में जाना था। मूड बिलकुल भी नहीं था। सब लोग जा चुके थे। एक छोटा सा get-together था जिसमें कुछ करीबी दोस्त या रिश्तेदार गिने-चुने ही invited थे। मैंने भी अपनी trousers चुनी और एक वाइट टॉप के साथ पहन ली कि मेरे को वहां किसने देखना है। बड़ी ही कांफिडेंटली उतरी और सीढ़ियों से होते हुए एक रूम जो होटल में पार्टी के लिए बुक था पहुंची।

कमरे का दरवाज़ा अधखुला सा था। मैंने जैसे ही खोला जल्दी से, सामने से वो भी बाहर आने की जल्दी में मेरे एक-दम सामने। लगभग टकराते हुए ही बची थी। जानती तो थी दूर- दूर से।पर कभी कोई बात हुई ही नहीं थी। मेरे पैर लड़खड़ाये,किसी तरह बैलेंस किया मैंने भी और उसने भी और मैं उलटे-पैर फिर वापिस भाग ली नीचे सीढ़ियों की ओर कि अब वापिस ही नहीं आउंगी। इसी दौरान आँखें भी मिली और मुस्कुराहटें खिली।
पर यह भी क्या बात हुई_दरवाज़े पे ही दोस्तों के साथ खड़े हो लो। कोई जा भी न पाये।आवारा सब के सब। बीच में चाहे मेरे cousins भी थे। पर चूँकि पंजाबी लड़के हों या आदमी, सबने दो दो पेग लगाये ही होते हैं हर छोटी से छोटी पार्टी में;तो होश में कौन-कितना, ख़बर कहाँ। परेशानी भी कि सब लोग पूछेंगे कि कहाँ थी तो क्या जवाब दूँगी। दो-चार सीढ़ियां रहते ही कुछ और रिश्तेदार दिख गए ऊपर आते हुए। इतनी तेज़ धड़कनों के साथ कुछ तो होंसला हुआ कि इनके साथ एंट्री करती हूँ।अब जाना तो पड़ना ही था। 

(क्रमशः )
मन्नत अरोड़ा 


Sunday, March 19, 2017

प्रिय सांसद मनोज तिवारी जी...अभिनव मिश्र


प्रिय सांसद मनोज तिवारी जी,
बराक ओबामा, बिल क्लिंटन, व्लादिमीर पुतिन, ह्यूगो शावेज से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक ने लोगो के आग्रह पर मंच पर गाना गाया है। मोदी जी तो पूर्वोत्तर में ड्रम भी बजा चुके हैं।
"एक सांसद से कह रही है गाना गाइये, इनको मंच से उतारिए, इन पर कारवाई किया जाए ।"
एक शिक्षिका के छोटे से आग्रह पर आपने अभद्रता की जो मिसाल पेश की है उससे न सिर्फ आपके संसदीय क्षेत्र बल्कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय की गरिमा को भी ठेस पहुंचा है। कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के वरदान के मूल्य को भी आप नहीं समझ पाए ?
मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की वो शिक्षिका आपसे ज्यादा संघर्ष करके अपना रास्ता तय की होंगी, मंच पर आपको इस तरह से कभी बात नहीं करना चाहिए था, आप सिंगर टर्न्ड पॉलिटिशियन हैं ये कौन नहीं जानता है, ऐसे आग्रह तो आते रहेंगे। अब जनता को क्या पता की सांसद बन जाने से कलाकार अपनी कला को भूल जाता है।
खैर अब आप सांसद हैं, बड़े लोग हैं। आगे से किसी भी उद्घाटन में आपसे कोई ऐसा आग्रह नहीं करेगा। हाँ वो एक आग्रह मेरा भी है शाहरुख़ भाई की 'फैन' मूवी में उछल उछल के जो भोजपुरी गाना सांसद होते हुए आप गाए हैं 'दिलवा तोहरे जबर्दस्त फैन हो गइल' उसको भी हटवा लीजिये।
-आपका पूर्व प्रशंसक

जब आप कुछ लिखते रहते हैं....अभिषेक आर्जव



Abhishek K. Arjav

जब आप कुछ लिखते रहते हैं.... कुछ भी... कविता कहानी क्रांति निबन्ध अचरा कचरा या कुछ भी... तब आप एक अलग तरह के आत्मविश्वास से लबरेज होते हैं। 


वह आत्मविश्वास संजीवनी जैसा होता है| इससे दो अच्छी चीजें होती है। पहली ये कि तमाम दुनियावी झंझावातों के बीच अपने आप को बनाए रखने की कोशिश आसान हो जाती है। दूसरे ये कि अपने गिरेबान में झांक कर अपने नग्न व तुच्छ यथार्थ के प्रति अपनी जबावदेही को भुला देने का एक रास्ता निकल जाता है। इस प्रकार लेखक होने का नशा अफीम से भी तगड़ा है।

P. S. लेखन या सृजन वही वास्तविक है जिसमें मानवीय ज्ञान या संवेदना के किसी नये फलक का आविष्कार हुआ हो। और यह आविष्कार पूर्व ज्ञान वृत्तों व भाव बिम्बों के परिष्करण का परिणाम हो। इसके अलावा बाकी सब कउवा उड़ तोता उड़।

Saturday, March 18, 2017

एवरी वोट मैटर्स EVM : डॉ. गौरव कबीर

लगातार अंतराल पर होते शांतिपूर्ण निष्पक्ष चुनाव सही मायनों में लोकतंत्र की प्राणवायु की भांति होते हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव भाजपा के प्रचंड बहुमत पाने के बाद विपक्षी दलों ने मतदान में प्रयुक्त ईवीएम पर ही निशाना साधना शुरू किया है।  मायावती जी तो कोर्ट में भी पहुँच गयी हैं।  किसी भी संभावना से इनकार करना तो ठीक नहीं पर फिर भी इसपर विचार करना जरूर प्रासंगिक है कि क्या वाकई इन मशीनों से छेड़छाड़ इस बड़े पैमाने पर संभव है। चुनाव आयोग ने उठे २९ प्रश्नों के जवाब दिए हैं। बीबीसी हिंदी ने भी इसकी पड़ताल की।  डॉ. गौरव कबीर सम्प्रति गोवा में कार्यरत हैं और पिछले एक दशक से अधिक समय में चुनाव निष्पादन में विभिन्न स्तरों पर जुड़े रहे हैं। 
प्रस्तुत है इस विषय पर उनका*आलेख

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आजकल EVM के बहुत चर्चे हैं , और चर्चे तो इसमें गड़बड़ी करने के भी हैं सोचता हूँ मैं भी इस मौके पर अपनी थोड़ी बहुत जानकारी आप सब से शेयर करूँ जहाँ तक हो सके मैंने तथ्य ही प्रस्तुत किये हैं और ये बताना चाहा है कि आखिरकार EVM से सम्बंधित प्रक्रिया और इसकी कार्यशैली क्या है। आप भी अपनी जानकारी साझा कर के लोकतंत्र के इस औज़ार को संबल प्रदान कर सकते हैं या आप यह भी बता सकते हैं कि यह सुरक्षित कैसे नहीं है, इस सन्दर्भ आपके प्रश्नों का स्वागत है।  

1- बेसिक तौर पर ईवीएम में दो मशीन होती है, बैलट यूनिट और कंट्रोल यूनिट। वर्तमान में इसमें एक तीसरी यूनिट  Voter-Verified Paper Audit Trail ( VVPAT )  भी जोड़ दिया गया है, जो सात सेकंड के लिए मतदाता को एक पर्ची दिखाता है जिसमें ये उल्लेखित रहता है कि मतदाता ने अपना वोट किस अभ्यर्थी को दिया है।  ऐसे में मतदाता बूथ पर ही आश्वस्त हो सकता है कि उसका वोट सही पड़ा है कि नहीं।




चित्र साभार:गूगल इमेज 



2- चुनाव से पूर्व राज्य में उपस्थित और दूसरे राज्यों  से मंगाई गयी सभी EVM की जाँच का प्रावधान है यह एक गहन जाँच प्रक्रिया है जिसमे हर एक EVM को सूक्ष्मता से जांच जाता है कई बार EVM मशीन में खराबी  हो सकती है, पर ऐसी ख़राब मशीन को ECIL के इंजीनियर के द्वारा  ठीक कर दिया जाता है और ठीक हो सकने की स्थिति में ख़राब  मशीन को चुनाव प्रक्रिया से हटा कर ECIL के कारखाने  में रिपेयर के लिए भेजा जाता है प्रथम चरण की इस जाँच  प्रक्रिया को FLC  (First Level of Checking) कहते हैं  FLC की यह प्रक्रिया कलेक्टर एवं डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन अफसर के सामने ही होती है , यदि किसी कारण वह उपस्थित नहीं है तो कम से कम एडिशनल कलेक्टर रैंक का अधिकारी FLC में मौजूद रहता है

3 - इसके बाद सभी मशीनें पहले रैंडमआइज़ेसन हेतु तैयार हो जाती है ,इस प्रक्रिया में विधानसभावार EVM का चयन होता है तथा इन  में से ही ट्रेनिंग और Demonstration के लिए भी मशीन चुनी जाती है
सब से महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि किस विधानसभा में कौन सा EVM ( CU + BU) जाना तय हुआ है इसकी सूचि राजनैतिक दलों को भी अनिवार्य  रूप से प्रदान की जाती है  (यह दोनो प्रक्रियाएं  राजनितिक दलों के प्रतिनिधियों के सामने होती हैं , जिस हेतु उन्हें विधिवत आमंत्रित किया जाता है )

4- पर्चा वापसी के बाद ही  दूसरा रैंडमआइज़ेसन होता है जिसमे पोलिंग बूथ के अनुसार EVM का आवंटन होता है इसके बाद प्रत्याशियों की उपस्थिति में ही  EVM मशीन की कमीशनिंग होती है इस प्रक्रिया में CU और BU का पेयर लगाया जाता है तथा EVM की पुनः जाँच होती है इस दौरान ही BU में बैलट पेपर लगाया जाता है। तत्पश्चात EVM मशीनें सील की जाती है जिस से कोई छेड़खानी होने पाए  (यह प्रक्रिया अनिवार्य रूप से ECI आब्जर्वर और प्रत्याशियों या उनके प्रतिनिधियों के सामने की जाती है। )

5- कौन सी EVM मशीन किस बूथ पर जानी है इसका पता पोलिंग पार्टी को एक दिन पहले डिस्पैचिंग के समय ही पता चल पाता है कि उसके पास किस सीरिज का ईवीएम आया है ऐसे में अंतिम समय तक पोलिंग पार्टी के सदस्यों  को पता नहीं रहता कि उनके हाथ में कौन सा EVM  सेट आने वाला है।


6- फिर पोलिंग बूथ पर मतदान के पूर्व एक मॉक पोल होता है जिसमे कम से 50 मत डाल कर यह जाँच की जाती है कि EVM सही कार्य कर रही है या ख़राब है इस प्रक्रिया में अगर 5 प्रत्याशी हैं तो 5 प्रत्याशियों और एक NOTA को बराबर-बराबर  वोट डाल कर  ( इस केस में प्रत्येक को  9 वोटरिजल्ट की जाँच की जाती है कि यह EVM सही कार्य कर रहा है या नहीं तथा इसका रिकॉर्ड भी रखा जाता है   यह प्रक्रिया उपस्थित पोलिंग एजेंट के सामने ही होती  है तथा पोलिंग एजेंट का  संतुष्टिपत्र पर हस्ताक्षर भी लेते है  उसके बाद ही मतदान शुरू होता है

7- हर मतदान केन्द्र में एक रजिस्टर बनाया जाता है, इस रजिस्टर में मतदान करने वाले मतदाताओं की डिटेल अंकित रहती है और रजिस्टर में जितने मतदाता की डिटेल अंकित होती है, उतने ही मतदाताओं की संख्या EVM में भी होती है।  मतगणना वाले दिन इनका आपस मे मिलान  पीठासीन अधिकारी (Presiding officer) की रिपोर्ट ( 17C ) के आधार पर होता है। मतदान समाप्ति के बाद 17प्रारूप पर उपस्थित सभी पोलिंग एजेंट्स का  हस्ताक्षर लेकर यह प्रारूप उनको भी  दिया जाता है जिस के बाद ही  EVM सब की उपस्थिति में सील किया जाता है

चित्र साभार:गूगल इमेज 


8-  इसके बाद EVM को एक पहले से तय किये गए स्ट्रांग रूम में स्टोर करते है जिसकी लॉक पर सभी प्रत्याशी अपना ताला भी लगा सकते है यह स्ट्रांग रूम भी पहले से ही सभी प्रत्याशियों को दिखा दिया जाता है , जिस से वह स्वयं को संतुष्ट कर सकें  कहते है कि सब से नाजुक लॉक ही सब से विश्वसनीय होता है इसलिए  दरवाजे पर पेपर सील भी लगाई जाती है जिस पर उपस्थित प्रत्याशीECI आब्जर्वर तथा अन्य व्यक्ति  हस्ताक्षर भी करते है  स्ट्रांग रूम लॉक करने के बाद जिलाधिकारी या रिटर्निंग अफसर इसकी जिम्मेदारी केंद्रीय सुरक्षा बल को सौंप देते हैं    स्ट्रांग रूम  की सुरक्षा केंद्रीय सुरक्षा बल तथा राज्य पुलिस दोनों मिल कर करते है यहाँ त्रिस्तरीय सुरक्षा की व्यवस्था होती है , जिसमे बाहर के दो स्तरो   पर राज्य की हथियारबंद पुलिस होती है जबकि सबसे अंदर के घेरे पर केंद्रीय सुरक्षा बल के जवान मुस्तैद रहते हैं यहाँ प्रत्येक आने जाने वाले का ब्यौरा दर्ज किया जाता है तथा 24 घंटे बिजली की व्यवस्था भी की जाती है

9- जिस बिल्डिंग में यह EVM लॉक किये जाते है वह हर तरफ से CCTV का इंतज़ाम होता है जिसे राजनैतिक दलों के लोग कंप्यूटर पर देख सकते है स्ट्रांग रूम के बाहर राजनैतिक दलों और प्रत्याशियों के लिए बैठ कर EVM की निगरानी करने देने के लिए इंतज़ाम भी किये जाते है इस स्ट्रांग रूम का लॉक और पेपर सील  कोई भी प्रत्याशी कितनी बार भी देख सकता है

10- फिर मतगणना के दिन  यह स्ट्रांग रूम प्रत्याशियों और ECI  आब्जर्वर के सामने ही खोला जाता है स्ट्रांग रूम से  मतगणना कक्ष तक EVM केंद्रीय सुरक्षा बल (CAPF) की निगरानी  में ही  ले जाया जाता है मतगणना के समय प्रत्याशी के एजेंट वही 17फॉर्म लेकर आते है जो उनको मतदान के दिन दिया जाता है , जिस से वह EVM क्रम संख्या और उसमें रजिस्टर हुए वोट की संख्या का मिलान भी करते है उसके बाद ही वोट की गिनती होती है

 उपरोक्त सभी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी होती है जो उचित शुल्क देकर प्राप्त किया जा सकता है

इसप्रकार मशीन के साथ गड़बड़ी के अवसर लगभग नगण्य ही हैं, ध्यातव्य यह भी है कि किसी भी मामले में ईवीएम में टैंपरिंग सिद्व नहीं हो पाई है।  स्वयं चुनाव आयोग आम लोगों को आंमत्रित करता है कि वे लोग आयोग जाकर ईवीएम की तकनीक को गलत सिद्व करने हेतु अपने दावे प्रस्तुत करें। लेकिन आज तक कोई भी दावा सही सिद्व नहीं हुआ है।

महत्वपूर्ण कड़ियाँ:


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पूर्णतया लेखक के निजी विचार