नवोत्पल में आपका स्वागत है...!

हम

मै हमेशा सोचता हूँ कि ब्लॉग से लोगों की डायरियों के भीतर रचा जा रहा साहित्य बाहर निकला है. साहित्य यदि समाज का दर्पण है तो इसे रचने-गढ़ने और पढ़ने में समाज का हर व्यक्ति शामिल होना चाहिये. ब्लाग के माध्यम से यह संभव हो सका है. अब कोई स्थापना टिप्पणियों से निर्भय नहीं रह सकती. इसप्रकार लेखन का एक प्रकार का लोकतंत्रीकरण संभव हुआ है. इस स्पेस का लाभ उठाते हुए इस ब्लॉग की प्रस्तावना है. इस ब्लॉग में नवोदित कवियों की रचनाएँ होंगी, समय-समय पर साहित्यिक चर्चाएँ होंगी, सामाजिक मुद्दों पर सहज विमर्श बनेंगे, राजनीति के ऊंच-नीच पर बात होगी।

नवोत्पल के अंतर्जालिक संस्करण की मूलभूत प्रेरणा के दो महत्वपूर्ण आयाम हैं: पहले तो 'सहजता ' और दूसरे 'सरोकार ' !
बोध का स्तर ज्ञान की विशिष्टता को सहज रूप में संप्रेषित कर पाने की क्षमता से निर्धारित होना ही चाहिए।

सहजता, आयामों और शैलियों से इतर तथ्य पर मन जमाये रहती है। तथ्य ऑब्जेक्टिव और सब्जेक्टिव दोनों ही सामान महत्त्व के हैं। नवोत्पल 'सहजता ' के लक्ष्य के वशीभूत हो अपने उपक्रम को अन्यान्य विचारों का समावेशी मंच बना सके, यही शुभाशा है। दूजे इस शुभाशा में सरोकार भी सधें यही अपेक्षा है। इसमें हम मिलकर ही आगे बढ़ सके सकते हैं।

भाषा, सेतु है; लेखक और पाठक का सम्बन्ध इंटरचेंजेबल व पारस्परिक बना रहे।

पूर्वपीठिका :


दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्विद्यालय, गोरखपुर में हम कुछ लोगों ने इस प्रस्थापना के साथ कि "..प्रतिभाएं भी मंच की मोहताज होती हैं..' एक साहित्यिक मंच का सञ्चालन प्रारंभ किया था. विनय मिश्र जी ने इसका विचार किया था, अभिषेक शुक्ल 'निश्छल' ने इसका नामकरण "नवोत्पल साहित्यिक मंच" किया था. चेतना पाण्डेय, प्रेम शंकर मिश्र, अनुपमा त्रिपाठी, खुशबू, रोशन, अंशुमाली, राजेश सिंह, अमित श्रीवास्तव, जयकृष्ण मिश्र 'अमन', गौरव कबीर आदि ढेरों लोगों ने इसे अपने श्रम-स्वेद से सींचकर इसे सफल बनाया था. विश्विद्यालय में साहित्यिक गतिविधियों की बहार छा गयी थी. कविता जिसे एक बोर चीज समझा जाता था, नवोत्पल के कार्यक्रमों में आती भीड़ ने ये साबित कर दिया कि दरअसल कवितायेँ तो जीवंत होती हैं, थोड़ा माहौल होना चाहिए उसके अनुशीलन के लिए. सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि ये रही थी नवोत्पल की कि इसने विश्विद्यालय और बहुधा विश्वविध्यालय के इतर भी यह सन्देश जमा दिया था कि कविता सिर्फ साहित्यकारों की चीज नहीं है, एक आम इन्सान भी अपने रोजमर्रा जीवन की आपा-धापी लिख सकता है और वह लेखन भी कविता का शक्ल ले सकता है. निश्चित ही हम लघु स्तर पर प्रयास कर रहे थे, पर हमारी उस सामयिक सफलता ने हम सभी में टीम-स्पिरिट और हमारी सामाजिक जिम्मेदारी का एहसास भी क्रमशः करवाया था. यह ब्लॉग उसी नवोत्पल साहित्यिक मंच, गोरखपुर की स्मृति में निर्मित है।

इसमे आप अपनी रचनाएँ, अपने विचार, अपने किसी विशिष्ट सामाजिक, राजनीतिक एवं साहित्यिक अनुभव को नवोत्पल के साथ बाँट सकते हैं !


आप सभी सुधीजनों का सुस्वागत है...श्रीश पाठक 'प्रखर'

1 comment:

  1. वाह ! एक-एक शब्द चिंतन के मानसरोवर को प्रिबिम्बित करता हुआ..मुझे गर्व है कि मुझे भी इस सरोवर से आचमन करने का अवसर मिलता रहता है ..बहुत बहुत धन्यवाद !

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